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उद्यमों में बढ़ रही है महिलाओं की भागीदारी

Publish Date: March 12 2018 12:30:51pm

हमारे देश में सदा से महिलाओं ने उद्यमिता के क्षेत्र में अपना योगदान दिया है। बदलते समय के साथ महिला उद्यमियों की भूमिका भी बढ़ रही है। स्टार्ट अप के साथ महिलाएं अब परंपरागत उद्योगों से आगे अपने लिए मुकाम खोज रही हैं। सरकारी योजनाओं के साथ-साथ समाज का नजरिया भी व्यापक हो रहा है। मूल मंत्र यह है कि लगन और परिश्रम से उद्यम हो तो महिलाएं सक्षम हो रही हैं। यह सही है कि अभी और भी बहुत किया जाना शेष है तो आशा जगती है कि अंजाम भी बेहतर होगा। 
ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट की मानें तो यदि भारत विकास और लिंग समानता समर्थक नीतियां अपनाता है तो उसकी अर्थव्यवस्था की वार्षिक दर में 2.4 प्रतिशत तक इजाफा हो सकता है। आश्चर्यजनक है कि जब महिलाओं में आर्थिक विकास और सम्पन्नता की अपार क्षमताएं हैं, फिर भी विकासशील और विकसित दोनों देशों में उन्हें अपना उद्यम खड़ा करने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे कारण हैं, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और आर्थिक नीतियां।
उद्यमिता के लिए आत्मविश्वास के साथ-साथ जोखिम उठाने और पूंजी की भी आवश्यकता होती है। हमारे समाज की मानसिकता ऐसी है कि वह लड़कों के लिए तो जोखिम उठाने और पूंजी लगाने को तैयार हो जाते हैं पर लड़कियों के मामले में नजरिया बदल जाता है। उन्हें लगता है कि लड़कियों को उद्यमी बनाने की बजाए विवाह करके अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर लेना चाहिए। अभी जो महिलाएं उद्यमी बन रही हैं उनमें से ज्यादातर संपन्न परिवारों की महिलाएं हैं। सामान्य परिवारों से आने वाली कुछ महिलाएं ही उद्यमी बन पा रही हैं। सामाजिक पृष्ठभूमि का प्रश्न है, विश्व भर में महिलाओं की प्रतिभा को सशंकित दृष्टि से ही देखा जाता है और इसका उदाहरण 2010 से लेकर 2015 तक चले केलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का सर्वेक्षण है जिसमें 18000 से अधिक उद्यमियों को शामिल किया गया। इसमें स्पष्ट रूप से महिला उद्यमियों के साथ भेदभाव की बातें उभर कर सामने आईं। इनमें सबसे प्रमुख न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व में पुरूष आधिपत्य वाले कॉरपोरेर्ट परिदृश्य का परंपरागत विचारधारा का होना है। 
संपन्न परिवारों का मानना है कि यहां पर शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी नहीं है इसलिए वे अपने बच्चों को पढऩे के लिए विदेश भेज देते हैं और वे वहां पर अच्छी शिक्षा ग्रहण करके वहीं रह जाते हैं या फिर देश में आकर व्यापार करते हैं। इसलिए महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहली आवश्यकता है। दूसरी आवश्यकता समाज की मानसिकता में बदलाव की है। समाज में यह मानसिकता विकसित करनी होगी कि लड़कियां भी अच्छी उद्यमी बन सकती हैं और उनके लिए भी जोखिम उठाकर पूंजी का निवेश किया जा सकता है। 
भारत में अगर सामाजिक पृष्ठभूमि के लिहाज से देखा जाए तो स्टार्टअप में हाशिए से बाहर के समुदाय की महिला उद्यमियों की संख्या काफी है। महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे कारोबार के 6० प्रतिशत अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। आर्थिक सहायता के संबंध में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रलय की सकारात्मक सोच के बावजूद अनेक अड़चनें हैं। कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रलय के दिशानिर्देश में पापड़ बनाने और सिलाई केंद्र जैसे छोटे कामों के लिए भी अधिक संसाधनों और अधिक जगह जैसी पात्रता की शर्तें हैं जिन्हें पूरा कर पाना सहज नहीं कहा जा सकता इसलिए आवश्यकता है, व्यावहारिक कमियों को दूर करने की।  महिला उद्यमी देश में कदम से कदम बढ़ा रही हैं लेकिन आसान शर्तों पर कर्ज पाने के लिए उन्हें आज भी संघर्ष करना पड़ता है। कई बार देखने में आया है कि शुरूआती पूंजी के लिए महिला उद्यमियों के पास पर्याप्त पैसे नहीं होते। कुछ महिलाओं के पास उद्यम की समुचित जानकारी भी नहीं होती है, विशेषकर जिन महिला उद्यमियों का बिजनेस बैकग्राउंड नहीं होता। यदि महिला उद्यमी व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं लेती हैं तो भी उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार को कई तरह के प्रयास करने होंगे। बैंकों से व्यापार के लिए दिए जाने वाले ऋण का एक निश्चित हिस्सा महिलाओं को मिले, इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। सरकार की ओर से कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। केंद्र सरकार की ओर से कई ऐसी योजनाओं का संचालन किया जा रहा है जिससे  महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन मिल रहा है। महिला उद्यमियों के ट्रेनिंग और रोजगार से स्थिति में सुधार हो रहा है। सामाजिक संगठनों की ओर से भी प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2020 तक भारत में महिला उद्यमियों की संख्या में और इजाफा होगा क्योंकि वर्तमान समय में महिलाओं में उद्यम के प्रति और भी जागरूकता आ रही है। 
उद्यमिता की जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर लेने वाली महिलाओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है। वैसे इनकी संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि होने के बावजूद भारत में महिला उद्यमिता को अभी काफी लंबा रास्ता तय करना है। आवश्यकता है अधिक से अधिक महिलाओं को नया उद्यम आरंभ करने एवं संचालन कर सकने संबंधी उनकी क्षमताओं के प्रति उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करने की। दक्षिण एशिया में 3० फीसदी औरतें कामकाजी हैं। इसके बावजूद वहां महिलाएं उद्यमिता में आगे बढ़ रही हैं। महिलाएं स्थापित उद्यमों के अलावा स्टार्टअप्स में भविष्य आजमा रही हैं। इससे उनकी कामयाबी की संभावनाएं बेहतर हुई हैं। एक सर्वे के अनुसार देश में 2०2० तक महिला उद्यमियों की संख्या में 2० फीसदी तक की वृद्धि की संभावना है। सरकारी कार्यक्रम इसमें सहायक साबित होंगे। 

(अदिति) नरेन्द्र देवांगन लेखक 

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