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भूतनी की शादी में जब शामिल हुए ढोल-शहनाई बजाने वाले

Publish Date: March 25 2018 02:00:48pm

देहरादून (उत्तम हिन्दू न्यूज) : एक आदमी ने भूतनी से शादी की। यह जानकर जरूर आपके रेंगटे खड़े हो गए होंगे लेकिन यह सत्य है। यह घटना गढ़वाल की है। आजकल गढ़वाल, कुमाऊ, जैनसार-बाबर और मैदानी क्षेत्रों को आपस में मिलाकर उत्तराखंड नामक राज्य बनाया गया है। तो आईए आपको इसकी मुकम्मल जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। भारत के अन्य राज्यों की तरह गढ़वाल के हरिजनों में भी कई जातियां हैं जैसे लुहार, टम्टा, औज़ी, रूड्डिया आदि। इनमें आपस में रोटी-बेटी के रिश्ते नहीं होते। लुहार-टम्टा पीतल-तांबे आदि के बर्तन बनाकर तथा कृषि औजारों जैसे कुल्हाड़ी, कुदाल, गैंती, दरांती, सब्बल आदि की मरम्मत कर जीविकोपार्जन करते हैं तो रूड्डिया बांस, रिंगाल, कड़वे से डलिया, ढक्कन, सूप आदि बनाकर बेचते हैं जबकि औजी हर वर्ष के शादी-विवाह, सगाई, मुंडन व अन्य हंसी-खुशी के मौकों पर ढोल-दमाऊ-मशक जैसे परम्परागत वाद्य यंत्र बजाते हैं। 

इससे उन्हें अच्छी आय हो जाती है। इसके अलावा नये कपड़े सिलना व पुरानों की मरम्मत के लिए भी हर कोई 'औजियोंÓ पर निभर है। 'औजीÓ तंत्र-मंत्र के भी अच्छे जानकार होते हैं, इस कारण हर वर्ण के लोग उन्हें अपने इष्ट-देवताओं को खुश करने के लिए 'ढोल-दमाऊÓ बजाने को भी बराबर आमंत्रित करते हैं। वर्षों पुरानी बात है। बिरमतु जो जाति से 'औजीÓ था, दूर के एक गांव में अपने साथियों के साथ ढोल-दमाऊ-मशक बजाने को कन्या पक्ष की ओर से आमंत्रित था। महीना नवम्बर का था।

तब दिन वैसे भी छोटे होते हैं। नजदीकी गांव होने के कारण बारात जानबूझकर विलंब से विदा हुई। बिरमतु साथियों समेत जब बारात को विदा कराकर कन्या के पिता के घर वापस आया तो सूर्यास्त हुए काफी समय हो गया था तथा रात घिर आने को उतावली थी। बिरमतु को दूसरे दिन अपने ही गांव में एक अन्य बारात में ढोल-दमाऊ बजाना था। वापस गांव लौटना जरूरी था। हालांकि दूरी सात-आठ मील थी परन्तु रास्ता जंगल से होकर गुजरता था व ऊबड़-खाबड़ तथा चढ़ाई उतराई भी अधिक थी। मजबूरी थी अत: सब कुछ जानते हुए व समय न होते भी बिरमतु ने साथियों समेत कन्या के मां-पिता से विदा ले ली और तीनों ढोल-दमाऊ-मशक बजाते हुए गांव की ओर चल पड़े। 

चांदनी रात होने के कारण रास्ता साफ साफ नजर आ रहा था। वाद्य यंत्रों की आवाज के कारण जंगली जानवरों के पास फटकने का भी भय नहीं था अत: तीनों निश्चित होकर रास्ता मापते रहे। थकान महसूस होती तो थोड़ा रूककर सुस्ता लेते। रास्ते में पडऩे वाले दो गांव पार कर जब बिरमतु साथियों समेत आगे बढ़ा तो रात काफी ढल चुकी थी। आगे चूंकि श्मशान था, तीनों ने जोरों से ढोल-दमाऊ-मशक बजाने आरंभ कर दिये। काफी थक चुके थे अत: धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे थे। अकस्मात तीनों ने नजर उठाकर सामने देखा तो श्मशान से लगी बंजर भूमि पर आकृतियां नाचती दिखायी दीं। इससे पूर्व कि दोनों साथी कोई सवाल जवाब करते, बिरमतु ने हंसते हुए कहा-लगता है ये भी हमारी तरह कहीं बारात से ही आ रहे हैं और हमारे ढोल-दमाऊ की थाप पर नाच रहे हैं।

इतनी रात में आ रहे हैं ये बारात से, मुझे तो ये इंसान ही नहीं लगते? खाने पीने के चक्कर में ये लोग उधर चले गए। तब टीम के सरदार ने कहा कि तुम दोनों घबराना नहीं अन्यथा कोई नहीं बचेगा। बिरमतु की हिम्मत से दोनों के भी हौंसले-बुलंद हो गये और वे अपने-अपने बाद्य बजाते हुए श्मशान के एकदम निकट पहुंच गये। देखा तो नाचने वाले भूत-प्रेत ही थे। सभी के पांव के पंजे पीछे की ओर थे। फिर सब आगे बढऩे लगे। आगे देखा की श्मशान में बारात आई हुई है। लोग नाच-गा रहे हैं। लोग मिठाइयां भी खा रहे हैं और बाकायदा एक विवाह समारोह का आयोजन हो रहा है। 

ये लोग बाकायदा उस समारोह में शामिल हुए और जमकर विवाह आयोजन का लुफ्त उठाया लेकिन यह क्या खा-पीकर जैसे ही वे लोग वहां से चलने लगे तो स्थितियां बदलने लगी। कुछ ही दूर चले होंगे और पीछे मुड़कर देखा वहां कुछ भी नहीं था। खैर जैसे-तैसे लोग अपने घर आए और जब लोगों को यह बात बताई तो लोगों ने कहा कि वह भूत-भूतनी की शादी रही होगी। अकसरहां चांदनी रातों में भू-भूतनी की शादी होगी है। यह केवल पहाड़ में ही नहीं बिहार और अन्य प्रदेशों में भी इस प्रकार की मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन प्रेतों की शादी होती है। इसलिए चांदनी रात में गांव के लोग कम ही बाहर निकलना चाहते हैं। 


 

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