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न गोलक न बनता है लंगर, फिर भी कोई यहां से भूखा नहीं जाता

Publish Date: April 16 2018 02:03:35pm

चंडीगढ़ (उत्तम हिन्दू न्यूज) : आपने कई अजब-गजब बातें सुनी होगी। कुछ देखा भी होगा लेकिन आज जो मैं आपको बताने जा रहा हूं उसे जानकर आपको आश्चर्य होगा। साथ ही आप उसे एक बार जरूर देखना चाहेंगे। यह आश्चर्य कहीं और नहीं चंडीगढ, संघ शासित राज्य में है। यहां एक गुरुद्वारा ऐसा है, जहां पर न तो लंगर बनता है और न ही गोलक है। फिर भी यहां से कोई भूखा नहीं जाता। इस गुरुद्वारे की रोचक जानकारी जानकर आपाको सुखद आश्चर्य होगा। 

हम बात कर रहे हैं चंडीगढ़ के सेक्टर-28 स्थित गुरुद्वारा नानकसर की। यहां पर न तो लंगर बनता है और न ही गोलक है। दरअसल, गुरुद्वारे में संगत अपने घर से बना लंगर लेकर आती है। यहां देशी घी के परांठे, मक्खन, कई प्रकार की सब्जियां और दाल, मिठाइयां और फल संगत के लिए रहता है। यही नहीं संगत के लंगर छकने के बाद जो बच जाता है उसे सेक्टर-16 और 32 के अस्पताल के अलावा पीजीआई में भेज दिया जाता है, ताकि वहां पर भी लोग प्रसाद ग्रहण कर सकें। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है।

इस गुरुद्वारे में और कई प्रकार की गतिविधि संचालित की जाती है। गुरुद्वारा नानकसर का निर्माण दिवाली के दिन हुआ था। चंडीगढ़ स्थित नानकसर गुरुद्वारे के प्रमुख बाबा गुरदेव सिंह बताते हैं कि 50 वर्ष से भी अधिक इस गुरुद्वारे के निर्माण के हो गए हैं। पौने दो एकड़ क्षेत्र में फैले इस गुरुद्वारे में लाइब्रेरी भी है और यहां दातों का फ्री इलाज होता है। यहां एक लैब भी है। हर वर्ष मार्च में वार्षिक उत्सव होता है। यह वार्षिकोत्सव सात दिनों का होता है। बड़ी संख्या में देश-विदेश से संगत इसमें शामिल होने आती है। इस दौरान एक विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन होता है।

गोलक के लिए झगड़ा न हो, इसलिए यहां पर गोलक नहीं है। यहां मांगने का काम नहीं है, जिसे सेवा करनी हो वह आए। इसका हेडक्वार्टर नानकसर कलेरां है, जो लुधियाना के पास है। वर्ष में दो वार अमृतपान कराया जाता है। गुरुद्वारा नानकसर में 30 से 35 लोग, जिसमें रागी पाठी और सेवादार हैं। चंडीगढ़ हरियाणा, देहरादून के अलावा विदेश जिसमें अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड में एक सौ से भी अधिक नानकसर गुरुद्वारे हैं।

बाबा गुरदेव सिंह का कहना है कि संगत सेवा के लिए अपनी बारी का इंतजार करती है। गुरुद्वारे में तीनों वक्त लंगर लगता है। लोग अपने घरों से लंगर बनाकर लाते हैं। किसी को लंगर लगाना हो तो उन्हें कम से कम दो महीने का इंतजार करना होता है। किसी ने सुबह तो किसी ने दोपहर का तो कोई रात के लंगर की सेवा करता है। हर वक्त अखंड पाठ चलता रहता है। सुबह सात बजे से नौ बजे तक और शाम पांच से रात नौ बजे तक कीर्तन का हर दिन आयोजन होता है। हर महीने अमावस्या के दिन दीवान लगता है।

यह गुरुद्वारा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अंदर नहीं आता है। इसका प्रबंधन एकदम अलग तरीके से होता है। यह सिख का ही एक पंथ है लेकिन इसे अलग से संचालित करने का अधिकार मिला हुआ है। हालांकि यह गुरुद्वारा भी अपने गुरुद्वारे में श्री गुरुग्रथ साहिब जी का प्रकाश करते हैं लेकिन यहां की व्यवस्था अलग है। यहां संगत के आने और जाने की व्यवस्था भी अलग है। इस पंथ के मानने वाले बड़े प्रभावशाली तरीके से अपने चिंतन को दुनिया भर में फैला रहे हैं। बेहद सामान्य से दिखने वाले इस मत के संत अपने आप का दिखावे से अलग रखते हैं। जितना आता है उतने में ही अपना काम चलाते हैं। 


 

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