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सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला, इच्छा मृत्यु को मिली कानूनी मान्यता

Publish Date: March 09 2018 11:17:17am

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु पर आज ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को शर्तों के साथ कानूनी मान्यता देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि मृत्यु के करीब पहुंचे व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। ये फैसला पांच सदस्यीय पीठ ने ये फैसला सुनाया। पीठ की अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने की। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने कहा था कि इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।  प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने पिछले साल 11 अक्तूबर को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। 

ये होती है लिविल वेल
यहां आपको जानना जरूरी है कि लिविंग विल आखिर क्या होती है। लिविंग वेल एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की मौत की तरफ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है। 

कॉमन कॉज ने दाखिल की थी याचिका
गैर सरकारी संस्था कॉमन कॉज ने देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में कहा गया था कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। 
 

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