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सपा-बसपा की दोस्ती रोक सकता है 2019 में भाजपा का विजय रथ  

Publish Date: March 26 2018 05:34:30pm

लखनऊ (उत्तम हिन्दू न्यूज) : हाल ही में बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती की आक्रामकता के बाद अब यह साफ हो गया है कि किसी भी कीमत पर समाजवादी पार्टी (सपा) व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठबंधन तय है। सोमवार को मायावती के खास सूत्रों ने मीडिया को बताया कि उन्होंने अपने बेहद निकटस्थ नेताओं को बुलाकर साफ संकेत दिया है कि अब प्रदेश में बड़े राजनीतिक दुश्मन के खिलाफ सपा के साथ जाना जरूरी है। बदल रही इस राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए अब यह आकलन किया जाने लगा है कि दोनों क्षेत्रीय क्षत्रप दल आपस में मिल कर चुनाव लड़े तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए 2019 के आम चुनाव में 2014 दुहराना आसान नहीं होगा। 

कहा जाता है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। 2019 में विपक्ष खासकर मायावती और अखिलेश यादव जैसे यूपी के दो बड़े क्षत्रप बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी के लिए इसी रास्ते को बंद करने की कोशिश में हैं। दोनों दल मोदी और अमित शाह के विजय रथ को रोकने के लिए एक साथ आ गए हैं। राज्यसभा चुनावों में बीएसपी उम्मीदवार की हार से भी इनके हौसले पस्त नहीं हुए हैं और बीजेपी के लिए ये चिंता बढ़ाने की बात है क्योंकि अगर माया-अखिलेश का गठबंधन 2019 में बीजेपी के खिलाफ मैदान में उतरा तो 2019 में बीजेपी के लिए सूबे में 2014 जैसे नतीजे दोहराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो जाएगा।

इस बात को लेकर भाजपा के नेतृत्व में भी चर्चा होने लगी है। इसका संकेत देते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी चिंता व्यक्त की है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आखिर जो राजनीतिक प्ररिस्थिति होगी उसका मुकाबला किया जाएगा लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यदि उत्तर प्रदेश में तीन दल इक_े हो गए तो भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करेंगे। बसपा प्रमुख मायावती ने सोमवार को संकेत दिया कि उनकी पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करेगी।  

उन्होंने पार्टी सदस्यों को चेताया कि वे भाजपा व राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार पर ध्यान न दें और आसन्न गठबंधन के प्रति आशावान रहें। उन्होंने कहा, भाजपा द्वारा जो भी कुछ नकारात्मक कहा जा रहा है वह कुछ नहीं है, बल्कि यह हमारे साथ आने का डर है, इसलिए सर्तक रहें। मायावती के एक करीबी ने मीडिया से कहा कि उन्होंने राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनावों में अपनी पार्टी की हार के बाद पैदा हुए इस डर को खत्म करने की भी कोशिश की है कि सपा-बसपा का साथ खत्म हो जाएगा। मायावती ने कहा कि यह गठबंधन निजी या पार्टी के फायदे के लिए नहीं है, बल्कि दुष्ट और क्रूर मोदी सरकार पर जीत हासिल करने के लिए है।

इस गठबंधन का प्रभाव संभवत: अगले महीने होने वाले विधान परिषद चुनाव पर भी पडऩे की पूरी संभावना है। सपा मुखिया अखिलेश यादव सहित परिषद के 12 सदस्यों का कार्यकाल 5 मई को पूरा हो रहा है। इनमें प्रदेश सरकार के दो मंत्री डॉ. महेन्द्र सिंह और मोहसिन रजा भी शामिल हैं। इन सीटों के लिए अप्रैल में चुनाव होगा। राज्यसभा चुनाव में अपने नौवें उम्मीदवार को जिताने में कामयाब रही भाजपा विधान परिषद चुनाव में भी पेंच फंसा सकती है। विधान परिषद चुनाव की प्रक्रिया भी राज्यसभा जैसी ही होती है। निर्धारित फॉमूर्ले के अनुसार, भाजपा दस सदस्यों को आराम से जिता लेगी। पर, राज्यसभा चुनाव की तरह अगर उसने दस से अधिक उम्मीदवार उतार दिए तो गठबंधन के लिए मुश्किल हो सकती है। यहां भी सपा-बसपा का गठबंधन की परीक्षा होगी और इस चुनाव के बाद यह साफ हो जाएगा कि आखिर प्रदेश की राजनीति किस ओर जा रही है। फि देश की राजनीति की भी दिशा तय हो जाएगी। 

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