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कांग्रेस मुक्त भारत राजनीतिक मुहावरा, संघ की भाषा नहीं : मोहनराव भागवत

Publish Date: April 01 2018 07:13:28pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समावेशी चरित्र पर बल देते हुए संघ प्रमुख मोहनराव भागवत ने रविवार को कहा कि कांग्रेस मुक्त भारत जैसे नारे राजनीतिक मुहावरा है  न कि संघ की भाषा का हिस्सा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने साफ कर दिया कि कांग्रेस मुक्त भारत वाले नारे से उनका कोई लेना-देना नहीं है। आपको बता दें कि आरएसएस को अपना मातृ संगठन बताने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्ष नेता लगातार इस नारों का प्रयोग करते हैं लेकिन आज आरएसएस प्रमुख भागवत ने इस नारे को खारिज कर दिया।  

आरएसएस प्रमुख मोहनराव भागवत ने पुणे में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में कहा कि ये राजनीतिक नारे हैं। यह आरएसएस की भाषा नहीं है। मुक्त शब्द राजनीति में इस्तेमाल किया जाता है। हम किसी को छांटने की भाषा का कभी इस्तेमाल नहीं करते। भागवत का यह बयान उस वक्त आया है जब भाजपा कई मोर्चों पर अपने आप को घिरा हुआ महसूस कर रही है साथ ही कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस के साथ उलझी पड़ी है। इस बयान को राजनीतिक गलियारे में बड़ी गंभीरता के साथ देखा जा रहा है। 

पूणे के कार्यक्रम के दौरान भागवत ने कहा कि हमें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सभी लोगों को शामिल करना है, उन लोगों को भी जो हमारा विरोध करते हैं। फरवरी में संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वह महात्मा गांधी के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और उन्होंने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी पर सत्ता में रहने के दौरान देश की विकास की कीमत पर गांधी परिवार का महिमामंडन करने का आरोप लगाया था।

भागवत 1983 बैच के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी ध्यानेश्वर मुले की छह पुस्तकें लांच करने के लिए यहां आए थे। मुले विदेश मंत्रालय में फिलहाल सचिव (कांसुलर, पासपोर्ट, वीजा और ओवरसीज इंडियन अफेयर्स) हैं। आरएसएस प्रमुख ने बदलाव लाने के लिए सकारात्मक पहल की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि नकारात्मक दृष्टि वाले बस संघर्षों और विभाजन की ही सोचते हैं।

उन्होंने कहा, ऐसा व्यक्ति राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में बिल्कुल ही उपयोगी नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व को देखने का एक तरीका अपने आप, अपने परिवार एवं अपने देश पर विश्वास करना है। भागवत ने कहा कि यदि कोई अपने आप पर, परिवार पर और देश पर विश्वास करता है तो वह समावेशी राष्ट्रनिर्माण की दिशा में काम कर सकता है। 

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