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बंबई हाईकोर्ट की टिप्पणी, भारतीय महिलाएं झूठे आरोप कभी-कभार ही लगाती 

Publish Date: April 07 2018 04:22:56pm

मुंबई (उत्तम हिन्दू न्यूज) : बंबई हाईकोर्ट ने गैंगरेप के एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि यौन हमले की रिपोर्ट तुरंत पुलिस में दर्ज न कराने का मतलब यह नहीं कि पीडि़ता झूठ बोल रही है। कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि यदि पीडि़ता देर से भी मामले की प्राथमीकी दर्ज कराती है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि भारतीय महिलाएं ऐसे झूठे आरोप कभी-कभार ही लगाती हैं। हाईकोर्ट ने गैंगरेप के इस मामले में चार दोषियों की सजा बरकरार रखी है। 

न्यायमूर्ति ए. एम. बदर ने इस हफ्ते के शुरू में दत्तात्रेय कोरडे, गणेश परदेशी, पिंटू खोसकर और गणेश जोले की अपील खारिज कर दी। इन चारों ने अप्रैल 2013 में सुनाए गए सत्र अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें गैंगरेप के जुर्म में दस साल जेल की सजा सुनाई गई थी। इन चारों को 15 मार्च 2012 को एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म करने और उसके पुरुष दोस्त से मारपीट करने का दोषी ठहराया गया था। यह घटना तब की थी, जब दोनों पीडि़त नासिक जिले में त्रयंबकेश्वर से लौट रहे थे।

दोषियों ने दावा किया कि उन्हें इस मामले में इसलिए फंसाया गया क्योंकि उन्होंने पीडि़ता और उसके दोस्त को आपत्तिजनक हालत में देख लिया था और उन्हें पुलिस के पास ले जाने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा कि महिला ने दावा किया कि यह घटना 15 माचज़् को हुई, जबकि उसने दो दिन बाद शिकायत दजज़् कराई। वादियों ने कहा कि मेडिकल जांच में दुष्कर्म की बात से इनकार कर दिया गया क्योंकि महिला के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे। 

बहरहाल, उच्च न्यायालय ने दोषियों की सजा बरकरार रखते हुए एक मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई उस टिप्पणी का हवाला दिया कि भारत में विरले ही कोई लड़की या महिला यौन उत्पीडऩ के झूठे आरोप लगाएगी। न्यायमूर्ति बदर ने कहा कि समाज के रूढि़वादी वर्ग से आने वाली और अपने पति से अलग हो चुकी पीडि़त को कलंक लगने और अपनी अस्मिता पर सवाल खड़े होने का डर होगा।

कोर्ट ने कहा, महिला को अपने माता-पिता समेत समाज द्वारा तिरस्कारपूर्ण नजरों से देखे जाने का डर था। गैंगरेप के बाद शर्म की भावना के कारण तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज न कराना असामान्य नहीं कहा जा सकता और इसे ले कर उसकी बात पर संदेह नहीं किया जा सकता। साथ ही अदालत ने कहा कि चोट के निशान न होना यह साबित नहीं करता कि महिला के साथ बलात्कार नहीं हुआ था। 
 

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