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हाईकोर्ट ने पुलिस कर्मियों से आठ घंटे की ड्यूटी लेने के दिए निर्देश

Publish Date: May 15 2018 07:06:45pm

नैनीताल (उत्तम हिन्दू न्यूज): उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में राज्य सरकार को पुलिस कर्मियों से आठ घंटे से अधिक काम न लेने के निर्देश दिये हैं। साथ ही साल में 45 दिन का अतिरिक्त वेतन देने को कहा है। उच्च न्यायालय ने प्रदेश में राज्य पुलिस सुधार आयोग की सिफारिश के तहत पुलिस कर्मियों के कल्याण के लिये तीन माह में अतिरिक्त (काॅरपस) फंड बनाने एवं खाली पदों को भरने के लिये विशेष चयन बोर्ड गठित करने के निर्देश भी दिये हैं। वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति शरत शर्मा की खंडपीठ ने ये निर्देश आज अधिवक्ता अरुण भदौरिया की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। पुलिस कर्मियों के लिहाज से इस आदेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पीठ ने सरकार को निर्देश दिये हैं कि पुलिस कर्मियों से आठ घंटे से अधिक ड्यूटी नहीं करवायी जाय। साथ ही पुलिस कर्मियों को साल में 45 दिन का अतिरिक्त वेतन देने, आवासीय व्यवस्था में सुधार लाने के लिये आवासीय योजना बनाने, प्रत्येक पुलिस कर्मी को सेवा काल में तीन पदोन्नति देने के लिये उत्तराखंड पुलिस एक्ट में जरूरी संशोधन करने के निर्देश दिये हैं। 

खंडपीठ ने अपने आदेश में आगे कहा है कि सरकार पुलिस विभाग में योग्य चिकित्सकों की नियुक्ति करे। पीठ ने पुलिस विभाग में रिक्त पदों को भरने के लिये विशेष चयन बोर्ड गठन करने के निर्देश दिये हैं। साथ ही साथ पीठ ने कहा कि सरकार प्रत्येक जिले में पुलिस कर्मियों के तनाव को दूर करने के लिये मनोचिकित्सकों की भी नियुक्ति करे। पीठ ने ट्रैफिक पुलिस कर्मियों के स्वास्थ्य की देखभाल एवं सुरक्षा के लिये भी विशेष निर्देश दिये हैं। पीठ ने कहा कि ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को मास्क एवं अन्य आवश्यक सुविधायें उपलब्ध करायी जायें। साथ ही गर्मियों की दिनों में बारीबारी से ड्यूटी लगायी जाये और आवश्यक अंतराल में अवकाश दिया जाये। इसके साथ ही सरकार को निर्देश दिये हैं कि सरकार हर तीन महीने में प्रत्येक पुलिस कर्मी की स्वास्थ्य की जांच कराये। 

खंडपीठ ने सरकार को पुलिस कर्मियों की आवासीय सुविधा में सुधार के भी निर्देश दिये हैं और उनके लिये आवासीय कालोनी की व्यवस्था करने और उनमें जिम एवं स्वीमिंग पूल की व्यवस्था करने को भी कहा है। याचिकाकर्ता की ओर से जनहित याचिका के माध्यम से कहा गया था कि उसने इस मामले में मार्च 2013 में प्रदेश के मुख्यमंत्री को भी पत्र दिया था। साथ ही साथ प्रदेश मानवाधिकार आयोग में भी मामला दायर किया था। उसके बाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजा था। 

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