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सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई कांग्रेस की मांग, बोपैया बने रहेंगे प्रोटेम स्पीकर

Publish Date: May 19 2018 12:03:18pm

नयी दिल्ली(उत्तम हिन्दू न्यूज): उच्चतम न्यायालय ने कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन को आज करारा झटका देते हुए के जी बोपैया को कर्नाटक विधानसभा का अस्थायी अध्यक्ष नियुक्त किये जाने के खिलाफ उसकी याचिका आज ठुकरा दी। न्यायमूर्ति अर्जन कुमार सिकरी, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति के खिलाफ कांग्रेस-जद (एस) की याचिका को आगे की सुनवाई के लिए स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने बोपैया के पुराने इतिहास का हवाला देते हुए उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़े किये। राज्यपाल वजूभाई वाला की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि शक्ति परीक्षण की पूरी प्रक्रिया की सीधे प्रसारण की व्यवस्था की गयी है इसलिए किसी प्रकार की गड़बड़ी की कोई आशंका नहीं है। इस पर न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि मेहता ने उनकी समस्या हल कर दी है। सभी क्षेत्रीय समाचार चैनलों से इसका सीधा प्रसारण किया जायेगा और न्यायालय का एक मात्र उद्देश्य निष्पक्ष शक्ति परीक्षण कराना है। सुनवाई के दौरान जस्टिस सीकरी ने कहा कि हम स्पीकर की नियुक्ति नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम राज्यपाल को इसके लिए निर्देश नहीं दे सकते। जबतक परंपरा कानून नहीं बन जाती तबतक कोर्ट दबाव नहीं डाल सकता। भाजपा दावा कर रही है कि वो सदन में होने वाले फ्लोर टेस्ट में पास होकर दिखाएगी, वहीं कांग्रेस का कहना है कि सीएम की कुर्सी पर येदुरप्पा चंद घंटों के मेहमान हैं।     

बता दें कि सुनवाई के दौरान अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल कांग्रेस और जेडीएस का पक्ष सामने रख रहे थे। वरिष्ठ वकील रामजेठमलानी भी सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहे। कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि प्रोटेम स्पीकर सबसे वरिष्ठ सदस्य को होना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कई बार हुआ है कि प्रोटेम स्पीकर सबसे वरिष्ठ सदस्य नहीं बने। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस-जद (एस) ने केजी बोपैया को कर्नाटक विधानसभा का प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। बता दें कि याचिका में प्रोटेम स्पीकर के अधिकार सीमित करने की मांग भी की गई थी। 
  
याचिका में आरोप लगाया था कि येदियुरप्पा केंद्र के साथ मिलकर राज्यपाल के जरिये फ्लोर टेस्ट को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे है। इस बार भी 2008 की ही तरह फ्लोर टेस्ट की तैयारी की जा रही है, जिसे ऑपरेशन लोटस कहते हैं। याचिका में कहा गया था कि अगर पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी नहीं हुई तो कुछ भी गलत होने पर कोर्ट में कुछ साबित नहीं हो पाएगा। समर्थन और विरोध करने वाले विधायकों को अलग-अलग बैठाया जाए।

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