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बीमार पति की सेवा न करना तलाक के लिए पर्याप्त आधार : हाईकोर्ट 

Publish Date: May 29 2018 12:00:43pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : शादी के 18 साल बाद दहेज प्रताडऩा का झूठा मुकदमा दर्ज कराना न सिर्फ  पति का उत्पीडऩ है बल्कि तलाक को मंजूरी देने के लिए पयाप्र्त आधार भी है। आज एक मामले के सिलसिले में दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया। मंगलवार को न्यायालय ने कहा कि इसके अलावा बीमार पति की देखरेख व सेवा नहीं किया जाना भी तलाक के लिए आधार माना जाएगा। दरअसल, शादी के 36 साल बाद एक दंपति के तलाक को मंजूरी देते हुए हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की है।

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल की अगुवाई वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि तथ्यों से साफ  है कि महिला ने शादी के 18 साल बाद पति के खिलाफ  दहेज उत्पीडऩ का मुकदमा दर्ज कराया। इतना ही नहीं, इसके अलावा भी महिला के ऐसे रवैये रहे हैं जो पति का उत्पीडऩ है। हाईकोर्ट ने ऐसे में तलाक को मंजूरी देने के परिवार न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही परिवार न्यायालय के फैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की ओर से दाखिल की गयी अपील को खारिज कर दिया। 

हाईकोर्ट ने कहा है कि पति ने जिस आधार पर तलाक की मांग की थी उसे साबित करने के पर्याप्त साक्ष्य पेश किए हैं। जबकि दूसरी तरफ पत्नी की ओर से पति द्वारा लगाए गए आरोपों को झूठ साबित करने में वह नाकाम रही है। प्रेम व रश्मि (दोनों बदला हुआ नाम) की शादी 1982 में हुई थी। उनके चार बच्चे भी हैं लेकिन कुछ साल बाद पति-पत्नी के बीच गतिरोध प्रारंभ हो गया। परिवार अदालत में अर्जी दाखिल कर पति ने पत्नी पर प्रताडि़त करने का आरोप लगाते हुए उसने तलाक की मांग की। उन्होंने कहा कि पत्नी बात-बात पर झगड़ा करती है और 1990 में जब उसे गंभीर रूप से अस्थमा की बीमारी हुई तो वह उसकी देखरेख करने से भी इनकार कर दिया।

इतना ही नहीं, तलाक के लिए दाखिल अर्जी में पति ने कहा कि उसकी पत्नी ने उनके व उनके परिवार वालों के खिलाफ  दिल्ली पुलिस में साल 2000 में दहेज उत्पीडऩ का झूठा मुकदमा दर्ज कराया। इस मामले में अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद इसी साल मार्च में तलाक को मंजूरी दे दी थी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर कहा कि उन्हें पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया, ऐसे में तलाक के फैसले को रद्द किया जाए। 

पति ने तलाक की मांग को लेकर दाखिल याचिका में आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने अपने भाई के साथ मिलकर संपत्ति अपने नाम करने के लिए उस पर दवाब बनाया। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि जब उन्होंने पत्नी के नाम संपत्ति स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया, उनकी पिटाई की गई। साथ ही कहा कि उनकी पत्नी ने डीडीए को पत्र लिखकर उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बताते हुए संपत्ति का कागजात की दूसरी प्रति उनके नाम जारी नहीं करने की मांग की थी।


 

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