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किसने निपटाए आप के 20 विधायक?

Publish Date: June 06 2018 04:13:14pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): दिल्ली में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को लेकर मचे बवाल पर आयी एक पुस्तक में दावा किया गया है कि कुछ छद्म विशेषज्ञों और अनुभवहीन सलाहकारों की अधकचरी सलाह के चलते न केवल ये नियुक्तियां रद्द हुयीं बल्कि सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी (आप) के 20 विधायकों की सदस्यता पर बन आयी।
 
लोकसभा और दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एस के शर्मा ने अपनी आने वाली पुस्तक ‘दिल्ली सरकार के संसदीय सचिवों का सच (इनसाइड स्टोरी)’ में दावा किया है कि इस मामले में सलाह देने वाले विशेषज्ञ और सलाहकारों को दिल्ली की वैधानिक और संवैधानिक सीमाओं, शक्तियों, परंपराओं तथा इसके संसदीय मामलों की पृष्ठभूमि का पूर्ण ज्ञान नहीं था। परिणामस्वरूप अधपकी सलाह पर संसदीय सचिव नियुक्त किये गये और 20 विधायकों की विधानसभा की सदस्यता पर बन आयी। पुस्तक में इस सिलसिले में किसी का नाम नहीं लिया गया है , लेकिन एक वरिष्ठ वामपंथी नेता और संसद सचिवालय के एक सेवानिवृति वरिष्ठ अधिकारी की ओर इशारा किया गया है।

पुस्तक में ‘किसने निपटायें आप के 20’ शीर्षक से एक अध्याय में कहा गया है कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति से पूर्व अाप के शीर्ष नेतृत्व ने वामनेता से किसी विशेषज्ञ का नाम सुझाने का आग्रह किया और उनकी सिफारिश पर संसद सचिवालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की ‘एक्सपर्ट राय’ ली गयी। लेखक का कहना है कि इस विशेषज्ञ को विषय का ज्ञान तो था लेकिन वह ज्ञान संसद तथा पूर्ण अधिकार संपन्न राज्यों और उनके विधानमंडलों के परिप्रेक्ष्य में था न कि संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत गठित दिल्ली जैसी विशेष और सीमित शक्ति की अनूठी व्यवस्था के संबंध में। उनका मानना है कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति के संबंध में कम से कम छह या सात ऐसे बिंदु हैं जिन पर ‘एक्सपर्ट सलाह’ में परिपक्वता तथा विषय के ज्ञान का अभाव स्पष्ट झलकता है।

दिल्ली सरकार द्वारा मार्च 2015 में 21 संसदीय सचिवों की नियुक्ति और उनके नियुक्ति की प्रक्रिया को पुस्तक में अवैध और गैर कानूनी बताते हुये कहा गया कि ये नियुक्तियां ऐसे की गयीं मानो यह सरकार में ना होकर किसी राजनीतिक पार्टी का अंदरुनी मामला हो। इस निर्णय को पूर्णतया गोपनीय रखा गया और पार्टी तथा राजनिवास को इसकी भनक नहीं लगने दी गयी। यहां तक कि कैबिनेट से भी मंजूरी नहीं ली गयी। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने नियुक्तियों के आदेश को अगस्त 2017 में रद्द कर दिया। बाद में यह मामला चुनाव आयोग पहुंचा जिसने मामले पर गहन विचार विमर्श के बाद संसदीय सचिव बनाये गये विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का फैसला सुना दिया हालांकि दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश पर आयोग इस मामले पर फिर से विचार कर रहा है।

पुस्तक के अनुसार उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने 26 फरवरी 2015 को विधायकों के नामों के साथ मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजे नोट में लिखा “ यह निर्णय लिया गया है कि इन विधायकों को उनके सामने दर्शाये गये मंत्रियों का संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया जाये। ” लेखक के अनुसार इस नोट से साफ था कि संसदीय सचिवों का नियुक्त करने का निर्णय ‘पर्दे के पीछे’ लिया जा चुका था। मुख्यमंत्री के सचिव ने चतुराई दिखाते हुये इसे एक प्रस्ताव की संज्ञा दी और मुख्यमंत्री से इस प्रस्ताव काे मंजूरी देने का आग्रह किया और मुख्यमंत्री ने मंजूरी दे दी।

यह निर्णय किसने लिया, कब लिया, क्यों लिया, किस आधार पर लिया गया, संसदीय सचिव क्या कार्य करेंगे, क्या दायित्व निभायेंगे इस सबका का कहीं उल्लेख एवं चर्चा नहीं की गयी। उपलब्ध रिकार्ड यह भी दर्शाता है कि संसदीय सचिव बनाये गये विधायकाें का ना तो बायोडेटा मांगा गया और ना ही साक्षात्कार हुआ, ना उनकी योग्यता, शिक्षा, पूर्व विधायी या प्रशासनिक अनुभव, विभागीय कार्य में रुचि आदि पैमाना बना। सीधे एक या दो नहीं बल्कि 21 नाम छांटकर उन्हें संसदीय सचिव बना दिया गया। लेखक ने दस्तावेज के आधार पर दावा किया है कि यह निर्णय मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्वयं लिया था और सिर्फ तीन व्यक्तियों, विधानसभा अध्यक्ष, उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को इसकी जानकारी थी।

पुस्तक में कहा गया कि दिल्ली सरकार यह दावा करती रही है कि संसदीय सचिव पद पर नियुक्त कर इन विधायकाें काे किसी भी प्रकार के वेतन, भत्ते या वित्तीय लाभ नहीं दिया गया। इन विधायकाें ने भी चुनाव अायाेग में शपथपत्र देकर कहा है कि उन्हाेंने सरकार से किसी प्रकार का लाभ नहीं लिया है लेकिन सच यह है कि इन पदधारकाें पर अनेक प्रकार के ‘लाभ’ की वर्षा हुयी जिनकी संविधान अाैर कानून अनुमति नहीं देते।

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