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भंडारा-लंगर पर GST छूट पर बवाल, धार्मिक संगठनों ने नए नियम का किया विरोध 

Publish Date: June 06 2018 06:00:49pm

रायपुर (उत्तम हिन्दू न्यूज) : धार्मिक संगठनों के लंगर और भंडारों पर जीएसटी में छूट के नए नियमों सवाल खड़े किए हैं। लिहाजा कई संगठनों ने इसका विरोध भी प्रारंभ कर दिया है। संगठनों का कहना है  कि हर महीने पांच हजार से अधिक लोगों को खाना खिलाने पर जीएसटी में छूट वाला नियम गलत है। ऐसे तो देश के कई संगठनों ने इसका विरोध किया है लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका जमकर विरोध हो रहा है। राज्य की कई संस्थाओं ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि अगर वे महीने में पांच हजार से कम लोगों को मुफ्त में भोजन करवाएं तो क्या यह मानव सेवा के दायरे में नहीं आएगा। इन संस्थाओं ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने मानव सेवा का भी मीटर बना लिया है

दरअसल, हाल ही में केंद्र सरकार ने प्रति माह 5 हजार से अधिक लोगों को मुफ्त खाना खिलाने वाली धामिज़्क संस्थाओं को जीएसटी में राहत दी है। ऐसी संस्थाओं को लंगर और प्रसाद में लगने वाला जीएसटी रिफंड किया जाएगा। पिछले साल जुलाई में जब धामिज़्क संस्थाओं को भी जीएसटी के दायरे में लाया गया था, तब अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर से जुड़े पदाधिकारियों ने मांग की थी कि वे रोजाना हजारों श्रद्धालुओं को मुफ्त भोजन कराते हैं इसलिए उन्हें जीएसटी से बाहर रखा जाए।

यही मांग और भी कई धार्मिक संस्थाओं ने उठाई थी। फिलहाल यह योजना दो साल के लिए लागू की गयी है। केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्रालय ने सेवा भोज योजना के तहत जीएसटी लागू होने के दस माह बाद धार्मिक स्थलों में लंगर पर लगाई जाने वाली जीएसटी रिफंड करने का फैसला किया है। श्री राम मंदिर ट्रस्ट रायपुर के सचिव अजय मिश्रा की दलील है कि आखिर किस आधार पर मोदी सरकार ने मानव सेवा का पैरामीटर तय किया है। उनके मुताबिक यदि वे हर माह 5 हजार से कम लोगों को भोजन करवाएं तो क्या ये मानव सेवा नहीं है। उन्होंने मांग की है कि सभी धार्मिक संस्थाओं पर मुफ्त भोजन और प्रसाद को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। बंगाली समाज के पंडित सुनीत मुखर्जी के मुताबिक देश में ज्यादातर धार्मिक  संस्थाओं में पांच हजार से कम लोगों को हर माह भोजन कराया जाता है।

उन्होंने कहा कि कुछ विशेष स्थानों में ही 5 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं को भोजन कराया जाता है। ऐसे में भोजन कराने को लेकर सरकार भेदभाव की नीति पर काम कर रही है। सुनीत मुखर्जी के मुताबिक धार्मिक क्रियाकलापों और जरुरतमंदों को भोजन कराने वाली किसी भी धार्मिक संस्था को त्रस्ञ्ज के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ की दो दर्जन से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं ने सरकार के फैसले का विरोध किया है। इन संस्थाओं के प्रमुखों ने सवाल उठाया है कि एक व्यक्ति को भी भोजन करवाना मानव सेवा है। ऐसे में टैक्स स्लैब में भेदभाव कर केंद्र सरकार धार्मिक संस्थाओं के साथ अन्याय कर रही है। धार्मिक संस्थाओं के प्रमुखों ने दलील दी है कि, बड़े मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चैरिटेबल ट्रस्ट ही सेवा भोज योजना का लाभ उठाएंगे। जबकि देश भर में कई ऐसी  भी संस्थाएं हैं जो यह कार्य छोटे स्तर पर कर रहे है।
 

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