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समलैंगिक संबंधों पर जवाब के लिए समय बढ़ाने से सुप्रीम कोर्ट का इन्कार

Publish Date: July 09 2018 04:44:18pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए केंद्र सरकार ने आज और समय देने की मांग की जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि 10 जुलाई से इस मामले पर संविधान बेंच के समक्ष होने वाली सुनवाई नहीं टाली जाएगी। कोर्ट ने कहा कि ये मामला कुछ दिनों से लंबित है और केंद्र सरकार को इस पर अपना जवाब दाखिल कर देना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आप सुनवाई के दौरान ही अपना जवाब दाखिल कीजिए।

एक याचिका हमसफर ट्रस्ट की ओर से अशोक राव कवि और दूसरी याचिका आरिफ जफर ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि धारा 377 पर सुप्रीम कोटज़् का फैसला दोषपूणज़् है। याचिका में कहा गया है कि निजता के अधिकार के फैसले में सुप्रीम कोटज़् के धारा 377 के फैसले को उलट दिया गया है। याचिका में हाल के हदिया मामले पर दिए गए फैसले का जिक्र किया गया है जिसमें शादीशुदा या गैर शादीशुदा लोगों को अपना पाटज़्नर चुनने का अधिकार दिया गया है। पिछले 23 अप्रैल को द ललित सूरी हॉस्पिटैलिटी ग्रुप के कायज़्कारी निदेशक केशव सूरी ने भी याचिका दायर की थी।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच 10 जुलाई से सुनवाई करेगा। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली इस संविधान बेंच में जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस इंदू मल्होत्रा शामिल हैं। धारा 377 को निरस्त करने के खिलाफ आईआईटी के करीब 20 पूवज़् छात्रों ने भी याचिका दायर की है। इन पूवज़् छात्रों में कुछ वैज्ञानिक, कुछ उद्यमी और कुछ शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

केशव सूरी ने अपनी याचिका में सेक्सुअल पसंद को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक अधिकार घोषित करने की मांग की है। अपनी याचिका में उन्होंने मांग की है कि आपसी सहमति से दो समलैंगिक वयस्कों के बीच यौन संबंध से अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होने के प्रावधान को सुप्रीम कोटज़् समाप्त करे। सूरी ने वकील मुकुल रोहतगी के माध्यम से यह याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि आईपीसी की धारा 377 गैर कानूनी है। इस बारे में नवतेज सिंह की भी एक याचिका भी सुप्रीम कोटज़् में लंबित है। याचिका में कहा गया है कि देश में भारी संख्या में लोगों के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जा सकता और उनको उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता और समलैंगिकों का अपराधीकरण का आधार कलंक है और इसी कलंक को देश की विधि व्यवस्था आगे बढ़ा रही है।

सूरी का यह कहना है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के बहिष्कार का मतलब है उनको नौकरी और संपत्ति के निमाज़्ण से दूर रखना है जो उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ जीडीपी को प्रभावित करता है। विश्व बैंक का आंकड़ा बताता है कि एलजीबीटी समुदाय को आथिज़्क गतिविधियों से दूर रखने की कीमत जीडीपी में 0.1 से 1.7 प्रतिशत की कमी है और ऑफिस में काम करने वाले 56 प्रतिशत एलजीबीटी को भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
 

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