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बिहार में सूखे से धान उपजाने वालों की नींद गायब

Publish Date: July 17 2018 08:02:57pm

सरैया (उत्तम हिन्दू न्यूज): लंबे समय से सुखाड़ की स्थिति रहने से मुजफ्फरनगर जिले के सरैया प्रखंड के लक्ष्मीपुर अराई गांव के किसान अवधेश प्रसाद और महेश यादव की रातों की नींद गायब हो गई है, क्योंकि वे बारिश नहीं होने से धान की रोपाई नहीं कर पा रहे हैं। धान का बिचरा बमुश्किल बचा हुआ है और अवधेश की पूरी जमापूंजी खतरे में है। अगले कुछ दिनों में अगर बारिश नहीं हुई तो उनके लिए हालात काफी मुश्किल हो जाएंगे। बुरा समय सिर्फ अवधेश के लिए नहीं है, बल्कि प्रदेश के हजारों किसान मुश्किलात के दौर में हैं, क्योंकि राज्य सूखे की चपेट में है और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में सोमवार तक औसत से करीब 40 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। प्रदेश के किसान पिछले सात साल में तीन बार सूखे के हालात से जूझ चुके हैं, इसलिए उनकी चिंता बढ़ गई है। 

बिहार के 37 जिलों में से दो दर्जन जिलों में मानसूनी बारिश कम हुई है, जिससे धान की रोपाई पर असर पड़ा है। अधिकारी बताते हैं कि प्रदेश में रोपाई की सबसे आदर्श अवधि के दौरान सिर्फ 14-15 फीसदी धान की रोपाई हो पाई है। समस्तीपुर जिले के पूसा स्थित राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ डॉ. अब्दुस सत्तार कहते हैं कि मानूसन के दौरान लंबी अवधि तक सूखे की स्थिति फसल के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने कहा, "जाहिर है कि मई और जून में अधिक बारिश हो रही है लेकिन जुलाई, अगस्त और सितंबर में लगातार सूखे का अल्पकालिक और दीर्घकालिक दौर जारी रहा है। यह दीर्घकालिक बारिश के आंकड़ों पर आधारित है। अब धान की रोपाई 20 जुलाई तक पूरी हो जानी चाहिए।"

डॉ. सत्तार ने बताया कि बिहार में अक्सर मानसून 12 जून के आसपास दस्तक देता है, मगर इस साल राज्य में मानसून करीब 14 दिन विलंब से पहुंचा।राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 22 से अधिक जिलों में 60 फीसदी कम बारिश हुई है, जिसमें पटना भी शामिल है। पटना में 60 से 86 फीसदी कम बारिश हुई है। राज्य में पिछले डेढ़ महीने में सामान्य बारिश का आंकड़ा 316.1 मिलीमीटर होने की जगह अब तक सिर्फ 202.5 मिलीमीटर बारिश हुई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सूखे के हालात के खतरे का आकलन करने के लिए बैठक बुलाई है। पिछले साल बिहार को बाढ़ ने बेहाल किया था और नीतीश के मंत्री ने तटबंधों के टूटने के लिए चूहों को जिम्मेदार ठहराया था।
 

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