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महिलाओं की मंदिरों में नो-एंट्री पर बोर्ड की दलील, मस्जिदों में भी है बैन

Publish Date: July 24 2018 04:50:47pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सबरीमाला मंदिर देवासन बोर्ड के अधिवक्ता ने न्यायालय को कहा कि जनहित याचिका से केवल एक ही धर्म के मामले में हस्तक्षेप करने के बजाय प्रगतिशील न्यायालय को अन्य मान्याताओं पर भी ध्यान देना चाहिए और उनके खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए। बोर्ड के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मुस्लिम समाज में भी इसी प्रकार की मान्यता है और वहां तो महिलाओं को कई मस्जिद में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा है। ऐसे में न्यायालय को केवल एक धर्म पर आघात नहीं करना चाहिए। 

सबरीमाला मंदिर मे महिलाओं के प्रवेश से संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान त्रावणकोर देवासम बोर्ड की तरफ से दलील दी गई है कि जब मस्जिदों में भी महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है तो सिर्फ  एक जनहित याचिका के आधार पर बिना किसी ठोस दलील के सिर्फ  मंदिर मामले पर ही सुनवाई क्यों हो रही है। त्रावणकोर देवासन बोर्ड ने यह भी कहा है कि समानता के अधिकार के उल्लंघन का मामला मस्जिदों पर भी लागू होता है।  

त्रावणकोर देवासम बोर्ड के वकील अभिषेक मनु सिंघवी की इस दलील के साथ ही सुप्रीम कोर्ट में सुने जा रहे सबरीमाला के अय्यप्पा स्वामी के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के मामले में एक नया मोड़ आ गया है। त्रावणकोर देवासम बोर्ड की तरफ से कहा गया कि रजस्वला अवस्था के दौरान महिलाओं को कई मस्जिदों में भी तो महिलाओं को जाने की इजाजत नहीं दी गई है। सिंघवी ने कोर्ट से पूछा है कि देश के शिया मुस्लिम मुहर्रम में अपने शरीर को हथियारों के वार से लहूलुहान कर लेते हैं। देश में काली के कई ऐसे मंदिर हैं जहां त्वचा में कांटे चुभाए जाते हैं। श्रद्धालु त्वचा में कीलें चुभा कर खुद को लटकाते हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट तरक्की पसंद होने के नाते इस पर भी रोक लगाएगी। 

त्रावणकोर देवासम बोर्ड ने 10 से 55 साल के बीच की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को उचित बताते हुए कहा कि वहां कई ऐसी अनोखे रीति रिवाज और विधि विधान हैं जिसपर हिंदू ही नहीं गैर हिंदू जन भी आस्था रखते हैं। लिहाजा एक जनहित याचिका के आधार पर हिंदू धर्म को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के दाखिले पर पाबंदी के मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने त्रावणकोर देवासम बोर्ड से कहा था कि बोर्ड साबित करे कि यह पाबंदी धार्मिक विश्वास का अभिन्न अंग है। 

कोर्ट ने पूछा था कि क्या सिर्फ रजस्वला अवस्था की वजह से महिलाएं मलिन हो जाती हैं? लिहाजा महिलाओं के मंदिर में दाखिले पर ही पाबंदी लगा देना उनके संवैधानिक अधिकारों और गरिमा के खिलाफ है। कोर्ट ने बोर्ड को आड़े हाथों लेते हुए पूछा है कि केरल हाईकोर्ट में तो ये कहा गया था कि सबरीमाला के देव अय्यप्पा के मंदिर में सालाना उत्सव के शुरुआती पांच दिनों में महिलाओं के दाखिल होने की छूट है। मसलन कोई पाबन्दी नहीं, तो अब यहां विरोधाभासी बयान क्यों दिया जा रहा है?
 

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