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अब सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के मामले दाखिल करना होगा कठिन, जानिए कारण

Publish Date: July 25 2018 10:16:33am

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : लोकसभा में ध्‍वनिमत से पारित हुए भ्रष्‍टाचार निरोधक (संशोधन) विधेयक-2008 बिल को राज्य सभा में भी पारित कर दिया गया। इस विधेयक की सबसे अहम बात, सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्‍टाचार का मामला शुरू करने से पहले लोकपाल और राज्‍य के लोकायुक्‍त की अनुमति लेना अनिवार्य है। साथ ही रिश्‍वत लेने ही नहीं देने वाले पर भी कानूनी कार्रवाई की जाने का प्रब्धान है। इसके तहत अब रिश्वत देने वालों को सात साल तक की सजा हो सकती है। इस विधेयक की खास बात यह भी है कि संशोधन बिल के तहत भ्रष्‍टाचार से जुड़े मामलों को दो साल के अंदर ही निपटाना होगा। 

अब रिश्‍वत लेने वाले के साथ ही देने वाले को भी सजा मिलेगी। राज्‍यसभा में पास हो चुके भ्रष्‍टाचार निरोधक (संशोधन) विधेयक-2008 बिल को लोकसभा से भी मंजूरी मिल गई है। इस विधेयक के मुताबिक रिश्‍वत देने वाले को सात साल जेल या जुमानज़ या फिर दोनों सजा देने का प्रावधान किया गया है। विधेयक में रिश्‍वत लेने वाले के लिए कम से कम तीन साल और ज्‍यादा से ज्‍यादा सात साल की सजा का प्रावधान किया गया है।

लोकसभा में ध्‍वनिमत से पारित हुए भ्रष्‍टाचार निरोधक (संशोधन) विधेयक-2008 बिल को पारित कर दिया गया। संशोधन बिल में भ्रष्‍टाचार से जुड़े मामलों को दो साल के अंदर ही निपटाना होगा। बताया जाता है कि 1988 के भ्रष्‍टाचार निवारण कानून में संशोधन कर नया बिल पेश किया गया है। राज्‍य सभा में एक सप्‍ताह पहले ही इस बिल को मंजूरी मिल गई थी। विधेयक में सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्‍टाचार का मामला शुरू करने से पहले लोकपाल और राज्‍य के लोकायुक्‍त की अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है।
 

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