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अब तक के सबसे मुश्किल दौर में भारत की प्रिंट इंडस्ट्री, हज़ारों अखबार बंद होने के कगार पर 

Publish Date: July 31 2018 12:20:08pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज़) : दुनिया के कई हिस्सों में प्रिंट मीडिया खत्म होने के कगार पर है। इसके बावजूद भारत में अखबार न सिर्फ खुद को बचाने में कामयाब रहे हैं बल्कि इनमें बढ़ोतरी भी हुई है। लेकिन हाल ही में अखबारी कागजों (newsprint) की कीमतों में हुई वृद्धि से हालात बहुत अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इससे इंडस्‍ट्री डूबने की कगार पर पहुंच सकती है। अखबारी कागजों की कीमतों में वृद्धि से देश में प्रिंट इंडस्ट्री पर 4600 करोड़ रुपए से ज्यादा का वार्षिक बोझ पड़ेगा।  

आखिर क्यों बने ऐसे हालात? 
कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए का कमजोर होना और चीन में रद्दी कागज के आयात पर प्रतिबंध लगने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में अखबारी कागज के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। ऐसे में इंडस्ट्री के लिए चिंतित होना स्‍वाभाविक है। क्‍योंकि, प्रिंट मीडिया में करीब 30-40 प्रतिशत खर्चा तो अखबारी कागज पर ही हो जाता है। ऐसे में अब इसकी कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी होने से प्रिंट मीडिया प्रतिष्‍ठानों की चिंता बढ़ गई हैं।  

यदि पिछले साल की बात करें तो इन दिनों में अमेरिकी डॉलर की कीमत जहां 64.16 रुपए थी, वह अब बढ़कर 68.62 रुपए हो गई है। पिछले साल न्यूजप्रिंट की कीमतें जहां 36000 रुपए प्रति टन थीं, वह अब बढ़कर 55000 रुपए प्रति टन हो गई हैं। भारत में सालाना रूप से न्यूजप्रिंट की मांग 2.6 मिलियन टन है। ऐसे में न्यूजप्रिंट की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने से इंडस्ट्री को वार्षिक रूप से 4600 करोड़ रुपए से ज्यादा के नुकसान की आशंका है।

कोच्चि से प्रकाशित होने वाले मलयालम भाषा के अखबार 'मेट्रो वार्ता' (Metro Vaartha) के जनरल मैनेजर पॉली ने बताया, 'पहले न्यूजप्रिंट के दाम लगभग 36-37 रुपए प्रति किलो थे, लेकिन अब ये बढ़कर लगभग 55-56 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुके है। अगस्त 2017 में 35000 रुपए प्रति टन के हिसाब से न्यूजप्रिंट का आयात किया गया था लेकिन अब यह बढ़कर 55,000-56,000 हजार रुपए प्रति टन तक हो गया है।' प्रिंट इंडस्ट्री की इस स्थिति के बारे में ‘सकाल’ और 'लोकमत पब्लिकेशंस' के पूर्व सीईओ ज्वलंत स्वरूप ने कहा कि डॉलर महंगा होने के कारण ज्‍यादा विदेश न्यूजप्रिंट इस्तेमाल करने वालों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, अंग्रेजी अखबार ज्यादा प्रभावित होंगे।

न्यूजप्रिंट की कीमतों में हुई बेतहाशा वृद्धि का असर 'एचटी मीडिया' (HT Media) के वित्तीय वर्ष 2019 की प्रथम तिमाही (Q1FY19) के नतीजों पर देखा जा सकता है, जिसमें कुल लाभ में करीब 86 प्रतिशत की कमी देखने को मिली थी। 'एचटी मीडिया लिमिटेड' (HT Media Ltd) और 'हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड' (Hindustan Media Ventures Ltd) की चेयरपर्सन और एडिटोरियल डायरेक्‍टर शोभना भरतिया का कहना था, 'न्यूजप्रिंट की ज्यादा कीमतों के कारण हमारी ऑपरेटिंग परफॉर्मेंस भी काफी प्रभावित हुई।'

न्यूजप्रिंट की कीमतों में हुई वृद्धि के अलावा देश में न्यूजप्रिंट के वास्तविक खरीदारों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट न होने के कारण यह मसला गहराता जा रहा है। 'इंडियन न्यूजप्रिंट मैन्‍यूफैक्‍चरर्स एसोसिएशन' (INMA) के एक सदस्‍य के अनुसार, 'पहले सिर्फ पंजीकृत मिल्‍स और पब्लिशर्स को ही रियायती टैक्स का लाभ मिला करता था। लेकिन जब से जीएसटी लागू हुआ है, अन्‍य पार्टियां भी न्यूजप्रिंट खरीद रही हैं जबकि पहले ऐसा नहीं था और उन्हें इसे दूसरे ग्रेड पेपर की तरह बेचा जाता था।'

इस अस्‍प्‍ष्टता के कारण जीएसटी की दरों में काफी छेड़छाड़ हो रही है। (पहले न्यूजप्रिंट पर पांच प्रतिशत जीएसटी था जबकि अन्य ग्रेड पेपर पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगता था।) अन्‍य पार्टियों द्वारा न्यूजप्रिंट की खरीद किए जाने से पब्लिशर्स के सामने आपूर्ति का संकट हो गया है।  

इंडस्ट्री पर प्रभाव 
'सकाल मीडिया ग्रुप' के चीफ एग्जिकयूटिव ऑफिसर प्रदीप द्विवेदी के अनुसार, 'जहां तक न्यूजप्रिंट की कीमतों की बात है तो इस साल इसने लगभग सभी को प्रभावित किया है। न्यूजप्रिंट का ऑर्डर छह से नौ महीने पहले एडवांस में दिया जाता है। ऐसे में कई लोगों की गणित गड़बड़ा गई है। ऐसे में कुछ लोग तो सिर्फ न्यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण ही घाटे में जा सकते हैं। इंडस्ट्री की यही सच्चाई है।' इनपुट कॉस्ट में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी होने और क्षतिपूर्ति के लिए कोई निश्चित उपाय न होने के कारण इंडस्ट्री को एक साल में करीब 4600 करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है।

अखबारों की बात करें तो हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबारों में से एक 'दैनिक जागरण' (Dainik Jagran) सालाना करीब 1,80,000 टन न्यूजप्रिंट खरीदता है। ऐसे में न्यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण अखबार को करीब 290 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा है। (इसमें लगभग पांच प्रतिशत रद्दी कागज वापस आया है।)

इस अखबार की वर्ष 2016-17 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, 'कुल खर्चे में न्यूजप्रिंट पर 39 प्रतिशत से ज्यादा खर्च किया गया है और लगभग 75 प्रतिशत न्यूजप्रिंट घरेलू मार्केट से लिया गया है। ऐसे में लगभग 20-25 प्रतिशत आयात किया गया है।'

'दैनिक जागरण' से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'वर्ष 2017 में हमने जो न्यूजप्रिंट 550 डॉलर प्रति टन के हिसाब से खरीदा था अब उसकी कीमत 750-780 डॉलर प्रति टन हो गई है। हम अखबार की कीमत बढ़ा नहीं सकते हैं। इसके अलावा विज्ञापन की दरों में भी वृद्धि नहीं की गई है। ऐसे में हमें कहीं से भी राहत मिलने की उम्‍मीद दिखाई नहीं दे रही है। इस कारण हमारे अखबार को हर साल लगभग 250 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। ऐसे में बड़े अखबार जैसे 'टाइम्‍स ऑफ इंडिया' (Times of India) और 'हिन्दुस्तान टाइम्‍स' (Hindustan Times) जो अधिकांश न्यूजप्रिंट आयात करते हैं, उन्हें ज्यादा नुकसान होगा।'

पॉली का कहना है, 'न्यूजप्रिंट की कीमतें बढ़ने के कारण हमें प्रत्येक माह लगभग 40 लाख रुपए ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं लेकिन हम कभी भी अपना सर्कुलेशन कम नहीं करेंगे क्योंकि इससे हमारी छवि प्रभावित होगी।' नाम न छापने की शर्त पर दक्षिण भारत के एक बड़े अखबार से जुड़े वरिष्‍ठ अधिकारी ने बताया, 'न्यूजप्रिंट की कीमतों में 50-60 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। भारतीय रुपए के अवमूल्‍यन की बात करें तो यह काफी मुश्किल समय है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि विज्ञापन नहीं बढ़ रहा है।' इसके साथ ही उनका कहना है कि कीमतों में बढ़ोतरी के कारण प्रकाशकों को हर साल 80-90 करोड़ रुपए ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। इंडस्ट्री से जुड़े एक अन्‍य वरिष्‍ठ व्यक्ति ने बताया, 'हम लागत में कमी के बारे में सोच रहे हैं। इसके अलावा हमने अखबार की कीमत में एक रुपए की वृद्धि की है। इससे भी कुछ राहत मिलेगी, ज्यादा नहीं। अखबार की कीमत बढ़ने से इस बढ़ोतरी में केवल 35-40 प्रतिशत तक ही राहत मिल सकती है।'

वहीं, इस स्थिति के बारे में 'दिल्ली प्रेस' (Delhi Press) के पब्लिशर परेश नाथ का नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है। हालांकि परेश नाथ ने माना कि स्थिति नाजुक है लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्रकाशक अखबार की कीमतें सही रखें और कंटेंट को मुफ्त में देना बंद कर दें तो इससे भी इतना बड़ा संकट नहीं होगा। उनका कहना है कि न्यूजप्रिंट की कीमतें बढ़ने के बावजूद अखबार की कीमतें बढ़ नहीं रही हैं। इनमें बढ़ोतरी होनी चाहिए और हमें रीडर को मुफ्त में कंटेंट नहीं देना चाहिए।

यह पूछे जाने पर कि क्या ‘डायरेक्टरेट ऑफ एडवर्टाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी’ (DAVP) विज्ञापनों की कीमतों के द्वारा क्या इस स्थिति को सही कर सकता है, उन्होंने कहा, 'किसी भी अखबार के लिए एक पेज का सरकारी विज्ञापन न्यूजप्रिंट के पांच पेज खरीदने के लिए काफी है। डीएवीपी के सिर्फ पांच-सात विज्ञापन हैं। अन्य विभागों से करीब 70-80 विज्ञापन आते हैं। ये डीएवीपी के विज्ञापन नहीं हैं लेकिन इन्हें डीएवीपी की दर से दिया जाता है। ऐसे में डीएवीपी कुल विज्ञापन खर्च का पांच प्रतिशत से भी कम खर्च करता है। इंडस्ट्री द्वारा विज्ञापनों के बारे में जानबूझकर लोगों को गुमराह किया गया है।'

क्या किया जा सकता है? 
'सकाल' मीडिया ग्रुप के सीईओ द्विवेदी का कहना है, 'विज्ञापन पर होने वाला खर्च उतना नहीं बढ़ रहा है, जितना हम चाहते हैं। इसके अलावा कीमतों में बढ़ोतरी, खासकर न्यूजप्रिंट की बात करें तो इससे इंडस्ट्री के सभी लोगों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।' द्विवेदी ने प्रिंट के सीमित विज्ञापन रेवेन्यू की ओर ध्यान दिलाते हुए यह भी कहा कि इसमें सिर्फ पांच से सात प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।    

उन्होंने कहा कि इस साल की पहली तिमाही की बात करें तो सूचीबद्ध कंपनियों के आंकड़ों के बारे में तो सभी को पता है लेकिन कुछ गैरसूचीबद्ध कं‍पनियों की ग्रोथ या तो नहीं बढ़ी है अथवा यह शीर्ष स्तर पर सिर्फ सिंगल डिजिट (single digit) बढ़ी है। उन्होंने कहा, 'त्योहारी सीजन के आने वाले तीन महीने काफी महत्वपूर्ण होंगे। सभी यह उम्मीद कर रहे हैं कि इस समय में विज्ञापन पर खर्च में काफी बढ़ोतरी होगी और यह समय उनके लिए काफी अच्छा रहेगा। यदि रेवेन्यू बढ़ता है तो लागत को झेलने की क्षमता भी बढ़ जाती है। ऐसे में हम ज्यादा पैसा आने की उम्मीद कर रहे हैं। रेवेन्यू जुटाने के लिए प्रिंट कंपनियां डिजिटल के साथ ही ईवेंट सॉल्यूशंस पर भी ध्यान केंद्रित कर रही हैं।' इंडस्ट्री से जुड़े एक अन्य दिग्गज ने कहा, 'ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री के हमारे पार्टनर्स को न्यूजपेपर इंडस्ट्री के साथ सहानुभूति रखनी चाहिए। लेकिन वे रेट के मुद्दे पर बात नहीं करते हैं। पिछले चार-पांच साल से विज्ञापन की दरों में बदलाव नहीं हुआ है। इंडस्ट्री की इनपुट कॉस्ट लगभग 60 प्रतिशत बढ़ने के बावजूद ऐडवर्टाइजर्स अभी भी कीमतें कम रखना चा‍हते हैं।'

'हैप्पीनेसइनफिनाइट सॉल्यूशंस' (Happinessinfinite Solutions) के सीईओ ज्वलंत स्‍वरूप का मानना है कि न्यूजप्रिंट की कीमतों के बढ़‍ते दबाव से राहत पाने का आसान उपाय पेजों की संख्या घटाना है। इसके साथ ही ब्रॉडशीट के स्‍थान पर इसे कॉपेक्ट करने का विकल्प भी है। अखबार की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ ही विज्ञापन की दरों के बारे में भी गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ये उपाय तभी कारगर साबित हो सकते हैं, जब पूरी इंडस्ट्री एकजुट हो जाए। प्रति‍स्पर्धा के इस माहौल में कोई भी पब्लिशर अकेले इस तरह का निर्णय नहीं ले सकता है। (साभार : samachar4media.com )

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