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अटलजी के व्यक्तित्व ने जाटों को भाजपा से मिलाया

Publish Date: August 17 2018 02:35:03pm

सीकर (उत्तम हिन्दू न्यूज): पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के कारण ही राजस्थान में जाट पहली बार कांग्रेस से नाता तोड़कर भाजपा की तरफ आए तथा लोकसभा अध्यसक्ष रहे जाट नेता बलराम जाखड़ को भी दो बार हार का मुंह देखना पड़ा। अटल जी चुनाव सभा को संबोधित करने के लिए दो बार सीकर आये। संयोग से दोनों बार ही उनका निशाना बने कांग्रेस के कद्दावर किसान नेता डॉ.बलराम जाखड़। वह पहली बार 1989 में संयुक्त विपक्ष के नेता चौधरी देवीलाल के समर्थन में रामलीला मैदान में बोले। उनकी वाक् चातुर्यता के आगे लोकसभा अध्यक्ष डॉ़ बलराम जाखड़ भी कमजोर साबित हुए। 

दरअसल जीजा-साला की जंग का अखाड़ा बना सीकर इस समय हरियाणा-पंजाब के दो दिग्गज जाट नेताओं की कुश्ती को देख रहा था। उसी दरम्यान चौ.देवीलाल ने अटल जी को यहां लाकर अपने जीजा जी (जाखड़) को चारों खाने चित का दिया था। उस समय एक तरफ था “ताऊ पूरा तोलेगा लाल किले से बोलेगा ” का नारा बुलंदी पर था तो दूसरी ओर वाजपेयी की करिश्माई वाणी ने जनता के दिल और दिमाग पर असर डाल दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि लाख जतन के बावजूद जाखड़ साहब को हार का मुंह देखना पड़ा।

किस्मत की बात है कि अटल जी ने जब वर्ष 1999 में दूसरी दफा सीकर में चुनाव सभा की तब भी निशाने पर तत्कालीन कृषि मंत्री डॉ बलराम जाखड़ ही थे। आई टी आई मैदान में 30 अगस्त को हुई इस जनसभा को राजनीति में लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा क्योंकि इस जनसभा में ही वाजपेयी ने ओबीसी में जाटों को शामिल करने का का वायदा किया था जो बाद में पूरा भी हुआ। उसी की बदौलत आज राजनीति का रंग बदला हुआ है। अटल जी के जाटों को ओबीसी में शामिल करने की घोषणा का ही परिणाम रहा है कि डॉ.जाखड़ को अपने से काफी कमजोर भाजपा प्रत्याशी सुभाष महरिया से मात खानी पड़ी। इतना ही नहीं वाजपेयी सरकार में महरिया को मंत्री बनाया गया,जो सीकर के लिए गौरव था। हालांकि महरिया आज कांग्रेस में है।

अटल जी का पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत से मित्रता भी किसी से छुपी नहीं थी। दोनों राजनेताओं के दोस्ताना संबंधों से सीकर फ़क्र करता रहा। क्योंकि शेखावात भी सीकर के ही सपूत थे। आज के दौर में नेताओं को सुनने के लिए संसाधन लगाकर भीड़ इकठ्ठी करनी पड़ती है अन्यथा दावों की हवा निकल जाती है। राजनीति के “सुपर हीरो” अटल बिहारी वाजपेयी के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ बल्कि उनको सुनने के लिए लोग भारी तादाद में दौड़े-दौड़े आते थे और उनको सुनने के लिए घंटों इंतजार भी करते थे।

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