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समान नागरिक संहिता फिलहाल संभव नहीं : विधि आयोग 

Publish Date: August 31 2018 06:59:42pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : अपने कार्यकाल के आखिरी दिन शुक्रवार को विधि आयोग ने पर्सनल लॉ पर एक परामर्श पत्र जारी किया, जिसमें ‘बिना गलती’ के तलाक, भरण-पोषण और गुजारा भत्ता तथा विवाह के लिए सहमति की उम्र में अनिश्चितता के नये आयामों पर चर्चा की गई है। परामर्श पत्र में कहा गया है कि देश में समान नागरिक संहिता की फिलहाल जरूरत नहीं है। न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी एस चौहान की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर सम्पूर्ण रिपोर्ट देने की बजाय परामर्श पत्र को तरजीह दी है, क्योंकि समग्र रिपोर्ट पेश करने के लिहाज से उसके पास समय का अभाव था।

परामर्श पत्र में कहा गया है कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा व्यापक है और उसके संभावित नतीजे अभी भारत में परखे नहीं गये हैं, इसलिए पिछले दो वर्ष के दौरान किये गये विस्तृत शोध और तमाम परिचर्चाओं के बाद आयोग ने भारत में पारिवारिक कानून में सुधार को लेकर यह परामर्श पत्र प्रस्तुत किया है। आयोग ने विस्तृत परिचर्चा के बाद जारी परामर्श पत्र में विभिन्न धर्मों, मतों और आस्था के अनुयायियों के पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने और उन पर अमल की आवश्यकता जतायी है। इसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी सहित कई धर्मों के मुताबिक मान्य पर्सनल लॉ या धार्मिक नियमों के मुताबिक़ विवाह, संतान, दत्तक यानी गोद लेने, विवाह विच्छेद, विरासत और सम्पत्ति बंटवारा कानून जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी गई है। आयोग ने कहा कि इस चरण में समान नागरिक संहित न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। इसके अलावा आयोग ने यह भी कहा है कि वर्तमान पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत है और धार्मिक रीति-रिवाजों और मौलिक अधिकारों के बीच सद्भाव बनाये रखने की आवश्यकता है।

न्यायमूर्ति चौहान ने पहले कहा था कि समान नागरिक संहिता की अनुशंसा करने के बजाय, आयोग पर्सनल लॉ में ‘चरणबद्ध’ तरीके से बदलाव की अनुशंसा कर सकता है। अब यह 22वें विधि आयोग पर निर्भर करेगा कि वह इस विवादित मुद्दे पर अंतिम रिपोर्ट लेकर आए। हाल में समान नागरिक संहिता के मुद्दे को लेकर काफी बहस हुई हैं। विधि मंत्रालय ने 17 जून 2016 को आयोग से कहा था कि वह ‘समान नागरिक संहिता’ के मामले को देखे। आयोग का मानना है कि समान नागरिक संहिता एक विस्तृत विषय है और इसे पूरा तैयार करने में समय लगेगा। संहिता पर अध्ययन जारी है। इस बाबत न्यायमूर्ति चौहान का कहना है कि देश के 26 प्रतिशत भूभाग में संसद का बनाया कानून लागू नहीं होता है, इसमें पूर्वोत्‍तर, जनजातीय इलाके और जम्मू-कश्मीर का हिस्सा आता है। इसलिए सभी धर्मों के लिए एक समान कानून फिलहाल संभव नहीं है। आयोग ने परामर्श पत्र में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह के मुद्दे को छोड़ दिया है, क्योंकि ये मामले उच्चतम न्यायालय में फिलहाल लंबित है। 

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