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इन गुरूओं ने बदलकर रख दी दुनिया की सोच, इसलिए मनाया जाता है टीचर्स डे

Publish Date: September 05 2018 11:35:13am

नई दिल्ली(उत्तम हिन्दू न्यूज): गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान, गुरु बिन इन्द्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान।

शिक्षक जिन्हें भारत में गुरू का दर्जा दिया जाता है। जो छात्रों को शिक्षा देकर उनके भविष्य को सही रास्ते पर चलने का मार्गदर्शन प्रदान करता है। आज दुनियाभर में टीचर्स डे मनाया जा रहा है। 

1962 में राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने के बाद उनके सम्मान में लोगों ने 5 सितंबर के दिन को 'राधाकृष्णन दिवस' के तौर पर मनाने का फैसला किया। हालांकि खुद राष्ट्रपति ने इससे इनकार किया और 5 सितंबर को बर्थडे की बजाय 'टीचर्स डे' के तौर पर मनाए जाने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद से हर साल इस दिन को शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जाता है। सर्वपल्ली राधा कृष्णन का सबसे महत्वपूर्ण गहना था उनका साधारण रहन सहन और उच्च विचारों का समन्वय जिसकी वजह से वो गुरुओं के गुरु कहलाए। सिर में सफेद रंग की पगड़ी के साथ सफेद रंग की धोती और कुर्ता पहनना राधाकृष्णन को काफी पसंद था और ज्यादातर वो इसी तरह के लिबास में नजर आते थे। राधाकृष्णन पूरे विश्व को एक ही स्कूल मानते थे और जहां से भी उन्हें कुछ सीखने को मिल जाता था वो उसे तुरंत अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते थे। राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षक का काम सिर्फ छात्राओं को पढा़ना ही नहीं बल्कि पढ़ाते हुए उनका बौद्धिक विकास करना भी है।

इस मौके पर हम आपको एेसे गुरूओं के बारे में बताने जा रहे है, जिन्होंने दुनिया की सोच बदलकर रख दी। 

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गुरु वशिष्ठ​
गुरु वशिष्ठ​ राजा दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। गुरु वशिष्ठ को राजा बने बिना जो सम्मान प्राप्त था उसके सामने राजा का पद छोटा दिखता था।

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द्रोणाचार्य
कौरवों और पांडवों के गुरु रहे द्रोणाचार्य भारतीय इतिहास के महान गुरुओं में से एक हैं। ऐसा कहा जाता है कि द्रोणाचार्य का जन्म उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में हुआ था। महाभारत युद्ध के समय वह कौरव पक्ष के सेनापति थे। गुरु द्रोणाचार्य को एकलव्य ने अपना अंगूठा गुरु दक्षिणा के रूप में दिया था।

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महर्षि वेदव्यास
महर्षि वेदव्यास महाभारत के रचयिता थे। महर्षि वेदव्यास का जन्म त्रेता युग के अन्त में हुआ था और वह पूरे द्वापर युग तक जीवित रहे थे। वेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं।
 
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चाणक्य
चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। उन्हें 'कौटिल्य' के नाम से भी जाना जाता था। चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध एक नीतिग्रंथ ‘चाण-क्य नीति’ भी प्रचलित है। उन्होने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया।
 

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