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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

Publish Date: December 13 2017 10:45:53am

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अब सारी चुनावी परिक्रियाएंं पूरी करने के बाद निर्विरोध राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया है। 16 दिसम्बर को राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभालने के बाद कांग्रेस में राहुल गांधी का दौर शुरू हो जाएगा। वैसे मणिशंकर अय्यर को निष्कासित करने की घटना से ही स्पष्ट हो गया था कि कांग्रेस ने अब राहुल गांधी को अपना अध्यक्ष स्वीकार कर लिया है। श्रीमती सोनिया गांधी ने जब करीब 20 वर्ष पहले कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाला था तब लोकसभा में 141 कांग्रेस की सीटें थीं और सात राज्यों में कांग्रेस सत्ता में थी। राहुल गांधी जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चुने गए हैं तो इस समय कांग्रेस की लोकसभा में 46 सीटेें हैं और पांच राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है। यह राज्य देश की राजनीतिमें कम महत्व रखते हैं और सांसदों की संख्या की दृष्टि से भी कम महत्व रखते हैं। देश के बड़े राज्यों से कांग्रेस एक तरह से बाहर हो चुकी है और अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है।

राहुल के अध्यक्ष पद संभालते ही एक नहीं अनेक चुनौतियों का उनको सामना करना पड़ेगा। 'उन्हें अगले एक साल में 8 विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना होगा। अगले साल राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों नागालैंड, मिजोरम, मेघालय और त्रिपुरा में विधानसभा के चुनाव हैं। इनमें से त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के चुनाव फरवरी, 2018 में ही हैं। इनमें से मेघालय में कांग्रेस की सरकार है लिहाजा राहुल के सामने यहां सरकार बचाए रखने की चुनौती होगी। इसके अलावा नागालैंड में नागा पीपल फ्रंट की सरकार है जबकि त्रिपुरा में सी.पी.आई. (एम) सत्ता में है। इसके तुरंत बाद अगले साल मई में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हैं। यहां कांग्रेस की ही सरकार है और भाजपा यहां आक्रामक तरीके से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही है, लिहाजा राहुल के सामने यहां सरकार बचाने की चुनौती होगी। इसके बाद अगले साल नवम्बर-दिसम्बर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के अलावा मिजोरम में चुनाव होंगे।'

राहुल गांधी के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती भाजपा ही है। राहुल के पिता स्वर्गीय राजीव गांधी ने जब कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला था तब भाजपा की लोकसभा में 2 सीटें ही थीं। आज भाजपा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार चला रही है। राहुल गांधी के मजबूत पक्ष को देखें तो कह सकते हैं कि राहुल गांधी का युवा वर्ग से अच्छा तालमेल है। राहुल कुछ नया कर सकने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और संगठनात्मक स्तर पर कई महत्वपूर्ण निर्णय युवा कांग्रेस के लिए भी लिए गए हैं। राहुल पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूत करने के प्रयास में भी हैं। राहुल पार्टी के विभिन्न धड़ों के विचार सुनने को भी तैयार हैं। राहुल गांधी एक मेहनतकश इंसान हैं। गुजरात चुनावों के लिए राहुल ने जितनी चुनावी रैलियां और यात्राएं की हैं उससे राहुल की राजनीतिक छवि पहले से अधिक मजबूत हुई है।

राहुल का प्रयास रहा है कि वह निर्णय लेने से पहले सर्वसम्मति ले लें। राहुल के विरोधी राहुल गांधी पर हमेशा यही आरोप लगाते आ रहे हैं कि राजनीति को लेकर वह गंभीर नहीं हैं। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर विराजमान होने के साथ ही राहुल गांधी पर लग रहे आरोप समाप्त हो जाते हैं।

राहुल गांधी के पास एक अमीर विरासत तो है लेकिन वर्तमान में पार्टी संकट में है, उन्हें पार्टी व अपनी साख बचाये रखने की आवश्यकता है। सोनिया गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मनमोहन सिंह के दौर में राहुल अगर सरकार में भागीदारी कर लेते तो राहुल गांधी को सरकार में रहते हुए कार्य करने का अनुभव होता जिससे उनकी व्यक्तिगत छवि में निखार आता व विचारों में और अधिक परिपक्वता आती। राहुल गांधी का सीधे-सीधे मुकाबला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ है और यह दोनों नेता जमीन से उठे और जमीन से जुड़े नेता हैं। इनको इनके पद विरासत में नहीं मिले, जिस तरह राहुल गांधी को मिला है। व्यवहारिक स्तर पर राहुल गांधी को और अधिक व्यवहारिक हो कार्य करना होगा और पार्टी के भीतर आयु व अनुभव के हिसाब से छोटे-बड़े नेताओं से सम्पर्क व संतुलन बनाकर चलना होगा।

लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। वर्तमान में विपक्ष में रहते हुए राहुल गांधी कितना सक्रिय होकर कार्य करते हैं इसी पर राहुल का तथा कांग्रेस पार्टी का भविष्य निर्भर करेगा। राहुल गांधी के दौर में कांग्रेस का नया दौर तो अवश्य शुरू हुआ है, लेकिन गुजरात चुनाव परिणाम आने के बाद ही इस दौर की दशा व दिशा निर्धारित होगी।


- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू। 

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