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भ्रष्टाचार के कलंक से कब मुक्त होगी पुलिस

Publish Date: December 14 2017 01:38:04pm

भारत की विशाल जनसंख्या में पुलिस की संख्या अत्यल्प है, लेकिन उसके भ्रष्टाचारी हाथ इतने लंबे हैं कि जीवन में कभी न कभी सभी को उसकी मुट्ठी गरम करनी पड़ती है। इक्का-दुक्का ऐसे संस्कारी पुलिस वाले भी होते हैं, जो स्वयं भ्रष्टाचार की पहल नहीं करते, लेकिन हिस्सा उन्हें भी पहुंचता है। पुलिस प्रशासन में थाना इकाई तक का कोई पुलिसकर्मी ऊपर की कमाई से बच पाता हो, यह संभव नहीं लगता। अपराध करके दंड से बचने की मानव प्रवृत्ति स्वाभाविक है। अपराध करने वाला दंड से बचने या कम दंड पाने की जुगत में पुलिस को रिश्वत खिलाता है। इस तरह पुलिस के साथ वह खुद भी आधा भ्रष्टाचारी बनता है, लेकिन जिसने अपराध नहीं किया है या जिसके प्रति अपराध हुआ है, वह भी पुलिस को रिश्वत देने के लिए अभिशप्त है।

साहित्यकारों ने हमारे साहित्य में भी पुलिस के कारनामे का वर्णन किया है। पुलिस का उत्पीडऩ जिस तरह से उस समय किया गया, वह आज भी नहीं बदला है। यहां प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का एक रोचक प्रसंग देखा जा सकता है। होरी का छोटा भाई शोभा गाय को जहर देकर भाग जाता है। गाय मर जाती है। मामले की तहकीकात के लिए दरोगा बिना किसी रपट के ही गांव में आता है और आते ही शोभा के घर की तलाशी का ऐलान कर देता है। बिचौलिए दारोगा को बताते हैं कि होरी से पचास रुपए का डौल बैठना भी मुश्किल है। दरोगा पुलिस कार्रवाई का करिश्मा अच्छी तरह से जानता है। वह तलाशी का ऐलान दुहराता-तिहराता है। होरी को घर की इज्जत की फिक्र पड़ जाती है। वह मदद के लिए सूदखोरों की ओर ताकता है, जो तत्परता से मदद का हाथ बढ़ाते हैं। दरोगा और बिचौलिए रकम आपस में आधी-आधी बांटने का निर्णय लेते हैं। होरी जब अंजुरी में रुपए लेकर दरोगा को भेंट करने चलता है तो उसकी पत्नी धनिया का उग्र हस्तक्षेप पुलिस के रिश्वतखोर चरित्र को सरेआम नंगा कर देता है। दरोगा को खाली हाथ लौटना पड़ता है।


पुलिस प्रशासन की मुख्य फोर्स कंास्टेबलरी है, जो थानों और चौकियों पर रहती है। आम जनता का पुलिस प्रशासन की थाना इकाई से ही सामना पड़ता है। पुलिस भ्रष्टाचार को अधिकांश वह इकाई ही संपन्न करती है। पुलिस थाने में शिकायत या सहायता के लिए जेब को भारी करके जाना होता है। खाली जेब जानेवालों को खाली गालियां, धक्के और डंडे ही मिलते हैं। पुलिस सुधार की जब भी बात की जाती है तो अधिकांश सुझाव कांस्टेबलरी से ही संबंधित होते हैं। भारतीय पुलिस सेवा के तहत बने उच्च पुलिस अधिकारियों का जनता से सीधा संबंध नहीं होता। आम जनता की नजर में इन बड़े अधिकारियों की छवि बेहतर होती है। कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पुलिस की भ्रष्टाचार छवि के प्रति चिंता भी व्यक्त करते हैं, लेकिन उच्च पुलिस अधिकारियों के भ्रष्टाचार का खुलासा भी यदा-कदा होता रहता है। बड़े शहरों में जमीन पर बड़े पैमाने पर होने वाले अवैध कब्जों के मामलों में अक्सर बड़े पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत होती है, जो कभी-कभार सामने भी आ जाती है। पुलिस में उच्च पदों पर भले ही कम भ्रष्टाचार होता हो या सामने न आ पाता हो पर पुलिस भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी पूरे पुलिस प्रशासन की बनती है।

दूसरे विभागों की अपेक्षा पुलिस की विशिष्टता यह है कि यहां भ्रष्टाचार के आगे-आगे अत्याचार चलता है। पुलिस एक हाथ से डंडा चलाती है, दूसरे हाथ से रिश्वत खाती है। उसका डंडा केवल थाने में ही नहीं, सरे बाजार भी चलता है। बात से पहले हाथ छोडऩा पुलिस की सहज आदत में शुमार है। औपनिवेशक काल से लेकर आज तक पुलिस अत्याचार की कहानी सर्वविदित है। देशी-विदेशी नागरिक और मानवाधिकार संगठनों की रपटों और सामान्य पत्र-पत्रिकाओं में पुलिस अत्याचार के विस्तृत ब्यौरे मिलते हैं, यह अत्याचार अक्सर क्रूरता की हद तक पहुंचा होता है। स्वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी भारतीय गणतंत्र में पुलिस की बदली हुई भूमिका अपेक्षित थी। लेकिन औपनिवेशक भूत ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है। संवैधानिक नागरिक अधिकारों के प्रति बढ़ती जनचेतना का साथ पुलिस बल को नहीं दे पाए। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के ही शब्द लें तो जनता की नजर में पुलिस आज भी अपराधियों का सर्वाधिक संगठित समूह है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रपट में कहा गया है कि ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बनी पुलिस व्यवस्था की संस्कृति, जब पुलिस निर्ममता पूर्वक सरकारी सत्ता को बनाए रखनेवाली एजेंसी के रूप में काम करती थी, आज भी जारी है। एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी लिखते हैं, करीब पन्द्रह हजार थानेदारों में से भारत में सामान्यत: दो तिहाई राजनैतिक नियुक्तियां हैं,जिनका मुख्य काम पैसा कमाना और उसका एक हिस्सा अपने राजनैतिक गुरुओं को देकर खुश रखना है। वर्तमान ढांचे में सुधार से भी जनता को कुछ न कुछ राहत और पुलिस को अपनी बेहतर छवि बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन सुधार के जो दावे किए जाते हैं, उन्हें फलीभूत होते नहीं देखा जाता। पुलिस के भ्रष्टाचार और अत्याचार से मुक्ति एक ऐसा आदर्श है जिसे शायद ही कभी पाया जा सके, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस तंत्र को जिस हद तक मानवीय बनाना संभव है, वह भी न किया जाए। पुलिस की वास्तविक वस्तुस्थिति से आज सभी परिचित हैं। क्या पुलिस अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के कलंक धो पाएगी, इस सवाल का जवाब खोजना बहुत ही कठिन प्रतीत होता है। (विनायक फीचर्स)

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