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गांधी के चश्मे से मोदी के मिशन पर नजर

Publish Date: December 22 2017 01:10:47pm

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में गांधी जी के चश्मे को लेकर काफी वाद विवाद चल रहा है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के एक शीर्ष प्रतिनिधि ने भी इस अभियान में गांधी जी के चश्मे के उपयोग पर व्यंग्यात्मक और नकारात्मक टिप्पणी की है। सुप्रीमकोर्ट ने तो शौचालयों आदि स्थानों पर गांधी के प्रतीक के रूप में उनके चश्मे के ढांचे के उपयोग को निषिद्ध कर दिया है। 

वाद विवाद का एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस अभियान के लिये गांधीजी के चश्मे को मोदी जी की आंखों पर चढ़ा दिया गया है। सम्भवत: दोनों के चश्मों का अलग-अलग नम्बर होने के कारण दृष्टिभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। स्वच्छ भारत अभियान की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता मगर इससे ज्यादा जरूरी मैला ढोने की सदियों पुरानी अमानवीय और अपमानजनक प्रथा को खत्म करना था, जिस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है और लाखों लोग आज भी दूसरों का मैला ढो रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय अभियान 'स्वच्छ भारत अभियान' के बारे में संयुक्त राष्ट्र के विशष अधिकारी (यूएनएसआर) लियो हेल्लर ने अपने प्रारम्भिक दौरे की रिपोर्ट में टिप्पणी की है कि वह जहां भी गये, उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन का लोगों-(महात्मा) गांधी के चश्मे को देखा। मिशन लागू होने के तीसरे साल में अब यह जरूरी हो गया है कि उन चश्मों को मानव अधिकारों के लेंस से बदला जाए। हेल्लर ने मानवाधिकार का सवाल भी उठाया है। उठाते भी क्यों नहीं। सन् 2013 की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश में 3,42,468 लोग सिर पर दूसरों का मैला ढो रहे थे। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की वर्ष 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1992 से लेकर 2००5 के बीच देश में कुल 7,70,338 हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों की पहचान हुयी थी जिनमें से 4,27,870 कर्मियों का पुनर्वास कर लिया गया था। इसके बाद 3,42,468 हाथ से मैला उठाने वाले कार्मिक रह गये थे। मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ऐसे कर्मियों की पहचान के लिये 2००7 में फिर अभियान चला तो उसमें 1.18 लाख कर्मियों की पहचान हुयी। इनमें से 78,941 सफाई कर्मियों को अन्य व्यवसाय चलाने के लिये आर्थिक सहायता दी गयी लेकिन उनमें से कितनों ने हाथ से मैला उठाने या सिर पर मैला ढोने का काम छोड़ा, इसका उल्लेख सरकारी रिपोर्ट में कहीं नहीं है।

ज्ञात इतिहास में महात्मा गांधी ही ऐसे पहले नायक थे जिन्होंने सबसे पहले अपना मैला या पाखाना स्वयं साफ करने पर जोर दिया था ताकि सफाई के साथ ही समाज का एक वर्ग दूसरों का मैला ढोने की परम्परागत अमानवीय और असभ्य व्यवस्था से मुक्ति पा सके। सन् 19०1 में गांधीजी ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्वयं अपना मैला साफ करने की पहल की थी। उन्होंने 1918 में साबरमती आश्रम शुरू किया तो उसमें पेशेवर सफाई कर्मी लगाने के बजाय आश्रमवासियों को अपना मैला साफ करने का नियम बनाया। श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1984 में लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान कहा था कि उन्होंने साबरमती आश्रम में स्वयं अपना मैला साफ किया था। आधुनिक शौचालयों के इस दौर में किसी से इंदिरा गांधी की तरह अपना मैला स्वयं साफ करने की उम्मीद तो नहीं की जा सकती है मगर यह सवाल जरूर उठाया जा सकता है कि कानूनन प्रतिबंध के बावजूद आज भी देश में लाखों लोग दूसरों का मैला अपने सिर पर क्यों ढो रहे हैं?

महात्मा गांधी सदैव हमारे लिये आदर्श रहे हैं इसलिये इस अभियान में प्रतीकात्मक रूप में उनकी तस्वीर या चश्मे का उपयोग करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन केवल चश्मे के ढांचे का इस्तेमाल करने से काम चलने वाला नहीं है। उस चश्मे के पीछे जो दर्शन छिपा है, उस पर गौर किये जाने की जरूरत है। गांधी जी सदैव भौतिक स्वच्छता के साथ ही नैतिक स्वच्छता पर भी जोर देते रहे हैं। कुम्भ नगरी हरिद्वार आदि स्थानों पर नैतिक गंदगी और नदी किनारे की गन्दगी पर उन्होंने अपनी डायरी में जो टिप्पणियां की थीं उन पर नमामि गंगे योजना के योजनाकारों और धर्म के ठेकेदारों को अवश्य गौर करना चाहिये। गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से पुन: 1915 में भारत लौटे तो उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर भारत यात्रा शुरू की। इसी क्रम में वह पहले रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने कलकत्ता गये और  फिर मुंशीराम से मिलने हरिद्वार चले आये। गांधीजी ने अपनी हस्तलिखित डायरी में कलकत्ता और हरिद्वार में मैला साफ करने के लिये गड्ढे खोदने और मल को स्वयं मिट्टी से ढकने का उल्लेख किया है। गांधीजी ने अपनी डायरी में हरिद्वार में गंगा किनारे तथा अन्य रास्तों पर खुले में शौच करने और धर्मस्थल पर श्रद्धालुओं के साथ ही साधु सन्तों के पाखण्ड की आलोचना तो जरूर की है लेकिन साथ ही खेत आदि में खुले में शौच का समर्थन भी किया है ताकि मानव मल का खाद के रूप में उपयोग किया जा सके। दरअसल गांधीजी के मन में मैले से खाद बनाने का विचार 1908 में तब आया था जब वह दक्षिण अफ्रीका में टॉलस्टॉय फार्म पर रहते थे। वैसे भी यूरोपीय देशों में मलव्ययन में सफाईकर्मी की व्यवस्था तो थी मगर 'नाइट स्वायल' के तौर पर उसका उपयोग खाद के रूप में करने का प्रचलन भी वहां था। 

गांधीजी जी की हरिद्वार यात्र के बारे में उनकी हस्तलिखित डायरी के विवरण पर गौर करना भी जरूरी ही है। गांधीजी ने डायरी में लिखा है कि.... ''ऋषिकेश और लक्ष्मण झूला के प्राकृतिक दृश्य मुझे बहुत पसन्द आये .........परन्तु दूसरी ओर मनुष्य की कृति को वहां देख चित्त को शांति न हुयी। हरिद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों को और गंगा के सुन्दर किनारों को गन्दा कर डालते थे। गंगा के पवित्र पानी को बिगाड़ते हुये उन्हें कुछ संकोच न होता था। दिशा-जंगल जाने वाले आम जगह और रास्तों पर ही बैठ जाते थे, यह देख कर मेरे चित्त को बड़ी चोट पहुंची........।
हरिद्वार जैसे धर्मस्थलों पर भौतिक और नैतिक गंदगी के बारे में गांधी जी ने डायरी में लिखा था कि...निस्संदेह यह सच है कि हरिद्वार और दूसरे प्रसिद्ध तीर्थस्थान एक समय वस्तुत: पवित्र थे ...... लेकिन मुझे कबूल करना पड़ता है कि हिन्दू धर्म के प्रति मेरे हृदय में गंभीर श्रद्धा और प्राचीन सभ्यता के लिये स्वाभाविक आदर होते हुये भी हरिद्वार में इच्छा रहने पर भी मनुष्यकृत ऐसी एक भी वस्तु नहीं देख सका जो मुझे मुग्ध कर सकती........पहली बार जब 1915 में मैं हरिद्वार गया था, तब भारत-सेवक संघ समिति के कप्तान पं. हृदयनाथ कुंजरू के अधीन एक स्वयंसेवक बन कर पहुंचा था। इस कारण मैं सहज ही बहुतेरी बातें आंखों देख सका था ....... लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहां दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरिद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ। भारत को स्वच्छ बनाने के लिये केवल गांधी के चश्मे के ढांचे से काम चलने वाला नहीं है। इसके लिये गांधी की सोच पर सम्पूर्णता से विचार किये जाने की जरूरत है। 

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