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ढोंगी बाबे

Publish Date: December 25 2017 12:38:37pm

डेरा सिरसा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी तथा डेरे के भीतर की गतिविधियों को लेकर समाचार पत्रों की सुर्खियों की स्याही अभी सुखने को आई थी कि दिल्ली के ढोंगी बाबा वीरेन्द्र का आध्यात्मिक विश्वविद्यालय सुर्खियों में आ गया है। पुलिस सूत्रों अनुसार ढोंगी बाबा के विभिन्न डेरों से 100 से अधिक महिलाओं को आजाद कराया जा चुका है। अध्यात्म के नाम पर चलाए जा रहे डेरों में औरतों को बंधक बनाकर रखा गया था, उनके शोषण का भी समाचार है। ढोंगी बाबा वीरेन्द्र देव दीक्षित संस्कृत में पीएचडी है और पहले यह माऊंटआबु के ब्रह्मकुमारी आश्रम से जुड़ा हुआ था। अब उसने देश के विभिन्न शहरों में अपने डेरे की शाखाएं खोल रखी थीं, डेरों से आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद की गई है। बाबा स्वयं फरार और पुलिस उसकी तलाश में है।

बाबा गुरमीत राम रहीम और बाबा वीरेन्द्र दीक्षित अध्यात्म के नाम पर अपना धंधा चमकाने वाले न तो पहले बाबा हैं और न ही अंतिम। आज भी देश के विभिन्न शहरों में विभिन्न संप्रदायों से संबंधित डेरे हैं जिनके पास आज भी लाखों-करोड़ों रुपये की जायदाद भी है और यह सब सरकार और समाज की नजरों तले ही पनपे और फले-फूले हैं।

अरबों-करोड़ों रुपयों की जायदाद बनाने वाले उपरोक्त बाबे कोई रातों रात नहीं पनपते। यह समाज के बल सरकार के सहयोग के साथ ही बढ़ते हैं। इन ढोंगी बाबाओं का शिकार सबसे पहले समाज का गरीब व पिछड़ा वर्ग होता है। समय के साथ जब बाबा में आस्था रखने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है, तब डेरा व उसके संचालकों व बाबाओं को राजनीतिक संरक्षण मिल जाता है। 

समाज के गरीब व पिछड़े वर्ग के लिए उपरोक्त डेरे व उनके तथाकथित बाबा आस्था के प्रतीक बन जाते हैं। तब इन डेरों पर धन की वर्षा भी होने लगती है। राजनीतिज्ञ इन्हें अपना वोट बैंक समझकर संरक्षण देने लगते हैं। उपरोक्त कारणों से एक ऐसे विष चक्र का निर्माण होता है, जिसके राजनीतिज्ञ से लेकर जन साधारण सभी बाबा के चंगुल में फंसे दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति का लाभ उठा तथाकथित बाबा भोग विलास की राह पर चलकर गरीब व पिछड़ों की भावनाओं व इज्जत दोनों से खिलवाड़ करने लगता है। राजनीतिज्ञ 'वोट बैंक' को देखते हुए डेरों पर कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं और शिकार हो जाता है समाज का वह वर्ग जो पिछड़ा है, गरीब है तथा दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा होता है।

तथाकथित बाबाओं का उपरोक्त घिनौना खेल दिन रात चलता रहता है लेकिन समाज और सरकार चुप्पी साधे सबकुछ देख कर भी चुप रहते हैं। यही कारण है कि डेरों की संख्या और समाज पर पकड़ बढ़ती जाती है। ढोंगी बाबाओं का चेहरा जब बेनकाब होता है तो फिर कुछ समय के लिए समाचार पत्रों की सुर्खियां उपरोक्त बाबा व उन द्वारा संचालित डेरे का खेल जारी रहता है। हिन्दू समाज के भगवाधारियों को चाहिए कि वह समाज के सम्मुख डेरावाद की कमजोरियों को आगे रखें व धर्म में आस्था रखने वालों को अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूक करें।

डेरा चाहे किसी भी समुदाय या धर्म का हो उस पर सरकार व समाज की नजर रहनी चाहिए तथा यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि धर्म के नाम पर पाखंड तो नहीं हो रहा, किसी वर्ग विशेष का शोषण तो नहीं किया जा रहा तथा आस्था के साथ खिलवाड़ तो नहीं हो रहा। समाज की भी जिम्मेवारी है कि वह अंधविश्वास पाखंड तथा कर्मकांड प्रति लोगों को सचेत करें। इस कार्य में जिन लोगों से भगवाधारण किया हुआ है और सनातन धर्म में आस्था रखते हैं, उनका कर्तव्य बढ़ जाता है। 

डेरों का मजबूत होने का अर्थ है कि संबंधित समुदायों में आई कुरीतियां बढ़ गई हैं। गरीबी, अनपढ़ता और बेरोजगारी से परेशान इंसान उपरोक्त डेरों के मायाजाल में बहुत जल्द फंस जाता है। डेरावाद को रोकने में सरकार एक सीमा तक ही कदम उठा सकती है। समाज के उस वर्ग को जिस पर समाज को राह दिखाने की जिम्मेवारी है, उसको आगे आने की आवश्यकता है तथा पाखंड व आडंबरों विरुद्ध समाज में अभियान चला हो रहे शोषण को रोकना होगा। कुछ अपवादों को छोड़ अधिकतर डेरों प्रति सतर्क हो समाज और सरकार को मिलकर कार्य करना होगा ताकि आम आदमी का शोषण ढोंगी बाबाओं के हाथों रुक सके। 



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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