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नीतीश की खामोशी या तूफान का संकेत?

Publish Date: January 03 2018 01:03:41pm

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं भाजपा की उपेक्षा के बाद भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं प्रांतवासी खामोश हैं। वह अपनी मांगों के प्रति केंद्र की बेरुखी के बाद भी चुप हैं पर कब तक? यह खामोशी एवं चुप्पी कभी भी तूफान बन कर सामने आ सकता है अथवा ज्वालामुखी बन कर फट सकता है। नरेंद्र मोदी एवं भाजपा नीतीश एवं बिहार को साधारण या तुच्छ  न समझें। नीतीश अड़ जाएंगे तो मोदी के 2019 के आम चुनाव के सपने पर खलल पड़ जाएगा। वह खटाई में पड़ जाएगा और बिहार से बदलाव की बयार बहेगी तो नरेंद्र मोदी एवं भाजपा का स्वप्न महल ताश के पत्तों जैसे भरभराकर ढह  या उड़ जाएगा। ध्यान  रहे बिहार से सदैव बदलाव की बयार बही है। बिहार में कभी खामोश या चुप जैसी स्थिति नहीं रही है। वह सदैव देश के लिए सबके लिए सियासी मार्गदर्शक बनता रहा है। यह कर्मठ एवं बुद्धिमान लोगों की भूमि है। यहां के लोग देश दुनिया में कहीं पर भी जाकर कुछ भी आजीविका अपना कर कहीं भी रच  बस जाने में पारंगत हैं। देश दुनिया इस बात की गवाह है।

66 वर्षीय नीतीश कुमार इस समय बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी चौथी बार संभाल रहे हैं। वह जनता दल यूनाइटेड अर्थात जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सर्वेसर्वा हैं। भाजपा के साथ उनका संबंध कई दौर में बनता बिगड़ता रहा है। नीतीश एवं जदयू कभी भाजपा के विरोधी तो कभी पक्षधर रहे हैं।  2014 के बिहार विधानसभा चुनाव एवं आम चुनाव के समय नीतीश नरेंद्र मोदी के सम्मुख कट्टर विरोधी बनकर डट कर खड़े थे।

वर्तमान दौर में नरेंद्र मोदी एवं नीतीश एक दूसरे के गुणगान गायक बन गए हैं इस हेतु वह मौके की तलाश करते रहते हैं। मोदी ने नीतीश की नशाबंदी की तारीफ की तो जवाब में नीतीश नोटबंदी एवं जीएसटी की तारीफ की। राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के चुनाव के समय नीतीश का दोहरा रूप देखने को मिला। नीतीश ने रामनाथ कोविंद के पक्ष में वोट दिया जबकि वेंकैया नायडू का विरोध किया। 

एक में भाजपा प्रत्याशी को वोट दिए तो दूसरे में कांग्रेस प्रत्याशी को वोट दिए। 2014 से 2017 के दरमियान बिहार में बहुत कुछ घटा। आगे और भी बहुत कुछ घट सकता है। इस बीच नीतीश लालू एवं कांग्रेस ने बिहार में कई बार रंग बदला। बिहार ने इसे देखा एवं देश इसका गवाह बना। भाजपा के पक्षधर रहे नीतीश 2014 में भाजपा एवं मोदी के विरोधी बन गए। आज फिर दोनों में यारी है जिसके आगे ऐसे ही बने रहने की कोई गारंटी नहीं है। यहां की राजनीतिक तस्वीर कभी भी बदल सकती है। बिहार विधानसभा एवं आम चुनाव के समय धुर विरोधी राजद के लालू एवं जदयू के नीतीश बड़े भाई छोटे भाई कहते गले मिले, एक हुए और मोदी का विरोध किया। परिणाम आम चुनाव में भाजपा  एवं मोदी को जीत मिली जबकि बिहार विधानसभा चुनाव में राजद जदयू एवं कांग्रेस को विजय मिली। नीतीश मुख्यमंत्री बने और तिकड़ी पार्टी की सरकार बनी। तिकड़ी सरकार के दौरान बड़ी पार्टी राजद के मुखिया लालू एवं उनके दोनों बेटों ने हर बार में हर बात में नीतीश पर दबदबा एवं दबाव बनाया किंतु गुंडाराज के विरोधी नीतीश को सुशासन छोड़ गुंडाराज की वापसी पसंद नहीं आई, इसलिए उन्होंने लालू का दामन छोड़ भाजपा का दामन थामना मंजूर कर लिया। वर्तमान समय में बिहार में जदयू भाजपा की सरकार में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। राज्य के भाजपा नेता सत्ता में रहकर मनमानी कर रहे हैं जबकि नरेंद्र मोदी केंद्र से बिहार को दिल खोल कर मदद कर रहे हैं। भरपूर धन उपलब्ध करा रहे हैं किंतु नीतीश के मनमाफिक काम नहीं कर रहे हैं।

बिहार का विशेष राज्य का दर्जा ठंडे बस्ते में बंद पड़ा है। नीतीश के अनुरोध के बाद भी पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय दर्जा नहीं मिला जबकि कुछ दिन पूर्व समस्तीपुर के पूसा विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया था। इस कड़ी में सौ वर्ष पुराने पटना विश्वविद्यालय  को उपेक्षित किए जाने से नीतीश नाराज हैं। भाजपा के साथ कदमताल करते ही नीतीश कुमार पार्टी के अंदर और बाहर चौतरफा विरोधियों से  घिर गए हैं। पुराने नेता शरद यादव जदयू पर कब्जा जमाने या नई पार्टी बनाने की फिराक में हैं जबकि लालू प्रसाद यादव का कुनबा उन पर लगातार गोले दागने में लगा है। उधर पटना विश्वविद्यालय की अनदेखी से नीतीश नरेंद्र मोदी से मायूस एवं दुखी हैं जबकि इस पर मोदी का अपना अलग तर्क है। बिहार की सियासत एक बार फिर करवट ले रही है। प्रधानमंत्री मोदी से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिदके  हुए हैं जदयू भाजपा गठबंधन में मतभेद उभरने लगा है। नीतीश भाजपा के दबाव में चलना स्वीकार नहीं कर पाएंगे। उनके सामने अपनी छवि बचाने एवं पार्टी अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती है। इस हेतु वे तूफान या ज्वालामुखी कुछ भी बन सकते हैं और नरेंद्र मोदी एवं भाजपा के विरोध में फिर मोर्चा खोल सकते हैं।      

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