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अदालतों का काम

Publish Date: January 06 2018 12:51:42pm

देश के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन और सेवा शर्तों में संशोधन विधेयक 2017 पर संसद में चर्चा में हिस्सा लेते हुए भाजपा के गोपाल शेट्टी ने कहा कि हमारे देश में लोग न्यायपालिका को महत्व देते हैं, उसका सम्मान करते हैं। यह लोकशाही की खूबसूरती है। शेट्टी ने कहा कि  सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्टों के न्यायाधीशों की नियुक्ति का विषय भी महत्वपूर्ण है। कुछ समय पहले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के बारे में सरकार की पहल को रद्द कर दिया गया। न्यायपालिका और चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच यह टकराव की स्थिति ठीक नहीं है। न्यायाधीशों की नियुक्ति कालेजियम की बजाए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के माध्यम से होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका कहे कि वे बड़े हैं, चुने हुए प्रतिनिधि अपनी बात कहें, नौकरशाही अपनी बात कहे, मीडिया अपनी। इस  'मैं बड़ा'  के चक्कर में देश पीछे छूट रहा है। 

तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने संसद के कामकाज में न्यायपालिका के बढ़ते दखल का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि आज की स्थिति यह है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे आशंका है कि आने वाले 10 से 15 वर्षों में यही स्थिति रही तब न्यायपालिका और संसद के बीच सीधे संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस दौरान लोकसभा उपाध्यक्ष एम थम्बीदुरई ने कहा कि न्यायपालिका कानून की व्याख्या कर सकती है, कानून बनाने का काम संसद का है। उन्होंने कहा कि यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि न्यायपालिका का प्रशासनिक पक्ष संसद के प्रति जवाबदेह है या नहीं। चूंकि इसका बजट संसद से मंजूर होता है, इसलिए यह संसद के प्रति जवाबदेह है। तेलगूदेशम पार्टी के पी रवींद्र बाबू ने कहा कि सुप्रीमकोर्ट को सामाजिक विषयों पर व्यवस्थाएं नहीं देनी चाहिए। बाबू ने सुप्रीमकोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण किये जाने की मांग की। उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति में गुणवत्ता और पारदर्शिता लाने के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा शुरू करने की मांग की।

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के आम आदमी की न•ारों में विधानपालिका और कार्यपालिका से अधिक इज्जत न्यायापालिका की है, यह स्थिति अचानक नहीं बन गई समय गुजरने के साथ बनी है। आम आदमी के मन में धारणा है कि राजनेता तथा अधिकारी दोनों अपना कर्तव्य निभाने में असफल हो रहे हैं तथा भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद से भी प्रभावित हैं। न्यायापालिका में समय के साथ निचले स्तर पर भ्रष्टाचार तो अवश्य बढ़ा है लेकिन भाई-भतीजावाद से अभी मुक्त है। न्याय मिलने में जो देरी आ रही है उसके लिए न्यायाधीशों की कमी ही मुख्य कारण है। 'देशभर की अदालतों में 2 करोड़ 60 लाख केस लंबित हैं और जजों के खाली पद छह हजार से ज्यादा हैं। मौजूदा समय में जजों के कुल 6379 पद खाली हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट में 6, हाईकोर्टों में 389 और निचली अदालतों में 5984 पद खाली हैं। इसके अलावा, नौ हाईकोर्ट ऐसे हैं, जहां चीफ जस्टिस की पोस्टें खाली हैं। वहां कार्यकारी चीफ जस्टिस के माध्यम से काम हो रहा है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में इस साल सात और जज रिटायर हो जाएंगे। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट की ओर से इन पदों को भरने का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार को नहीं भेजा गया है। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। 

इस संबंध में केंद्रीय राज्य मंत्री पीपी चौधरी ने बताया कि 'देशभर की निचली अदालतों में जजों के कुल स्वीकृत पदों में से 26.38 फीसदी पद खाली हैं। निचली अदालतों में 22 हजार 677 जजों के स्वीकृत पद हैंं' जिनमें से सिर्फ 16 हजार 693 जज कार्यरत हैं। सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत पदों की संख्या 31 है, जबकि देश के 24 हाईकोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 1048 है। देश में सिक्किम हाईकोर्ट ही एकमात्र ऐसा हाईकोर्ट है, जहां पर जजों का कोई पद खाली नहीं है। यहां जजों के पदों की स्वीकृत संख्या 3 है। पीपी चौधरी के अनुसार कानून मंत्रालय ने वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट के चार, हाईकोर्ट के 126 जज और हाईकोर्ट के ही 14 चीफ जस्टिस की नियुक्ति के कोलेजियम के प्रस्ताव को मंजूर किया था। यह पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा नियुक्तियों का रिकार्ड है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट में 5 जज, हाईकोर्ट के 8 चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट के 115 जजों की नियुक्ति की गई थी। मौजूदा समय में चीफ जस्टिस की ओर से खाली पदों को भरने का कोई प्रस्ताव कानून मंत्रालय के पास नहीं आया है।'

महंगी होती व्यवस्था और न्याय दिलाने में देरी के कारण न्यायपालिका पर भी उंगली अब अवश्य उठने लगी है। संसद में न्यायपालिका की बढ़ती सक्रियता को लेकर चिंता की जा रही है, जबकि जन साधारण न्याय मिलने में हो रही देरी के कारण परेशान हो रहा है। 1986 के विधि दिवस पर मुख्य न्यायाधीश श्री पी.एन. भगवती ने न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कहा था 'दुर्भाग्य से हमारे देश में आज भी कुछ वकील और विधिवेत्ता ऐसे हैं जो शुतुरमुर्ग की तरह बालू में अपने सिर धंसाए रहना चाहते हैं और लोकहित वाद के परिणामस्वरूप न्यायिक प्रक्रिया में जो परिवर्तन आ रहा है उसे पहचानने से इंकार कर रहे हैं। प्रतिपक्षी न्याय की अंग्रेजी परम्परा में प्रशिक्षित और उस काल में जन्मे और बढ़े, जब अबंध सिद्धांत का बोलबाला था, ये बुद्धि से अश्मीभूत और सठियाए लोग प्राचीन गलियारों में सरसराती हुई बदलाव की नई हवा के साथ अपना मेल नहीं बिठा पा रहे हैं। वे बौद्धिक रूप से अब भी 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध या शायद 19वीं शताब्दी में ही रह रहे हैं और उस सोच से बाहर निकल कर अपना विकास नहीं कर पा रहे हैं। वे बंधी लकीर पर चलने के इतने अभ्यस्त हैं कि उससे कोई विचलन अथवा परिवर्तन उन्हें सहन नहीं होता। 

उनकी दृष्टि में न्याय की प्रक्रिया केवल एक बौद्धिक व्यायाम है, जिसमें न्यायाधीश और वकील अपनी विद्या और विद्वता का प्रदर्शन कर सकते हैं, उनकी दुनिया में सर्वहारा और असहायों, निचले वर्ग के और गुमनाम लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है। वे चाहते हैं कि न्यायापालिका उसी जर्जर और पुरावशिष्ट आंग्ल-सेक्सन न्यायशास्त्र की प्रक्रियाओं का अनुसरण करते हुए न्याय प्रदान करती रहे, क्योंकि उनकी दृष्टि में इस न्यायशास्त्र का समर्थन करते हुए न्याय प्रदान करने वाले लोग देवताओं के समान हैं। किन्तु न्याय के ये तथाकथित पक्षधर यह नहीं समझते कि देश में लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें न्याय चाहिए और अगर उन्हें यह शीघ्र न मिला तो वे एक दिन राजमार्गों पर धावा बोल देंगे और उन्हें नष्ट कर देंगे, जिनका दावा है कि उन पर चलने का अधिकार केवल हमारा ही है। सौभाग्य से, लोकहित वाद के फलस्वरूप, जनता के कमजोर वर्ग, समुदाय के अलाभग्रस्त तबके अब पहली बार अन्याय से संरक्षण प्रदान करने वाली संस्था के रूप में न्यायालयों पर आंख गड़ाए हैं। अब तक वे न्यायालयों के द्वार तक भी नही पहुंच पाते थे। किन्तु जब लोकहित वाद के माध्यम से उनकी समस्याएं न्यायालय के समक्ष लाई जा सकती हैं। उन मुट्ठी भर लोगों की निराधार आलोचना के होते हुए भी जो समाज से कट कर विशाल भवनों के वासी हैं और जिन्हें समाज के उस पददलित वर्ग के दु:ख, पीड़ा, और शोषण की कोई चिंता नहीं है जो इस देश की जनसंख्या के 50 प्रतिशत से भी अधिक हैं। हमारी न्यायिक प्रक्रिया में एक क्रांति सी आ रही है।'

न्यायाधीश भगवती ने अतीत में जो कहा था आज भी सार्थक है। न्यायपालिका का लक्ष्य आम आदमी को न्याय देना है। यह बात लोकतंत्र के तीनों अंगों विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को मिलकर सुनिश्चित करनी चाहिए, आपसी टकराव देशहित में नहीं है।    


 -इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

 

 

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