Sunday, June 17,2018     ई पेपर
ब्रेकिंग न्यूज़
राजनीति

युवाओं की मनोदशा

Publish Date: January 09 2018 12:51:08pm

गृह मंत्रालय द्वारा सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि हर 24 घंटे में 26 युवा आत्महत्या कर रहे हैं, यानि प्रत्येक एक घंटे में एक आत्महत्या। महाराष्ट्र और बंगाल में युवा वर्ग सबसे अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। मानसिक रोग विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक बीमारी, नशे और शराब यह मुख्य तीन कारणों से युवा आत्महत्या कर रहे हैं। इन विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में आ रहे परिवर्तन के कारण युवा अपने आप को संभाल नहीं पा रहे और हताश हो आत्महत्या कर रहे हैं।

मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी कहा जाता है, लेकिन समाज में रहकर भी आज व्यक्ति अपने को अकेला महसूस कर रहा है, क्योंकि धन और भौतिक सुख-सुविधा की प्राप्ति ही मुख्य लक्ष्य रहता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु इंसान समाज से टूटता जा रहा है और एक मशीन की तरह काम करता है। ऐसे में जब उसे जीवन के मोड़ पर असफलता मिलती है तो वह अपने को अकेला पाता है। संयुक्त परिवार टूटते चले जा रहे हैं, छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा असफल हो रहा है। मां-बाप और एक बच्चा बस यहीं तक परिवार आज कल सीमित होकर रह गया है। ऐसे में थोड़े से दबाव के कारण परिवार टूटने लगता है और उसका परिणाम समाज को भी भुगतना पड़ रहा है। युवा वर्ग उपरोक्त परिस्थितियों में अपने भविष्य को लेकर ही चिंतित रहता है। अपने भविष्य को सुरक्षित रखने हेतु वह शिक्षा पर जोर देता है और मां-बाप भी उस पर दबाव बनाकर रखते हैं। लक्ष्य होता है 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्ती का। अब प्रत्येक युवक 90 से अधिक अंक तो ले नहीं सकता। जब युवा को लगता है कि अंकों की कमी के कारण उसके और उसके परिवार के सपने साकार नहीं हो सकते तो वह हताश हो इस संसार को ही अलविदा कह देता है।

युवाओं के उपरोक्त कमजोर पहलू के साथ उज्जवल पहलू यह है कि देश में उच्च शिक्षा में लड़कियों की स्थिति बेहतर होती जा रही है। 'ये जानकारी ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई) 2016-17 में सामने आई है। इसके मुताबिक उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो (जीईआर) 5 साल में करीब 19 प्रतिशत से बढ़कर 25.2 प्रतिशत हो गया है। जीईआर 18-23 साल की उम्र के युवाओं की उच्च शिक्षा में नामांकन की दर है। सर्वे में उन छात्रों को शामिल किया गया है जो ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और रिसर्च (एमफिल या पीएचडी) कर रहे हैं या इस कोर्स में आवेदन किया है। सरकार ने 2020 तक उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो यानी जीईआर को 30 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। रिपोर्ट में भारत में उच्च शिक्षा की स्थिति के बारे में भी काफी जानकारियां दी गई हैं। इसके मुताबिक पिछले 5 सालों में उच्च शिक्षा में 56 लाख छात्र बढ़े हैं। इस दौरान देश में कुल यूनिवर्सिटीज की संख्या 667 से बढ़कर 864 हो गई है। पिछले 5 साल के दौरान देश में 4501 नए कॉलेज भी खुले हैं। इसके अलावा 10 राज्यों में महिलाओं के लिए 15 यूनिवर्सिटीज हैं।Ó

एकांगी व अतिभौतिकवादी जीवन जीने वाले को समझाते हुए अतीत में लाला हरदयाल ने कहा था 'बहुत से स्त्री-पुरुष इतने धनलिप्त होते हैं कि वे कोई भी ऐसा काम गंभीरता से हाथ में नहीं लेते, जिससे धन की प्राप्ति न हो। उनका यह विश्वास है कि अध्ययन तथा मानसिक परिश्रम के लिए अपने आपको कष्ट देना मूर्खता है, क्योंकि केवल पैसा कमाने के लिए कड़ा परिश्रम, तत्पश्चात् खूब खेल तथा भरपूर मनोरंजन-यही उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य है। ऐसे लोग बुद्धि को केवल भौतिक संपन्नता की चाबी मात्र समझते हैं तथा व्यक्तिगत विकास को एक मूर्खतापूर्ण मानसिक सनक। यह शोचनीय पदार्थवादी प्रवृत्ति समाज के सभी वर्गों में अत्यन्त गहरी जड़ जमाए हुए हैं। क्या धनी, क्या निर्धन सब इससे कष्ट पाते हैं। एक बूढ़ी कामकाजी महिला ने मुझसे अपने बेटे की शिकायत करते हए कहा, उसे प्राय: सस्ती पुस्तकें खरीदने की आदत है। वह पुस्तकों पर अपना पैसा बर्बाद करता है। भला उनसे उसे क्या लाभ होगा? वह तो एक बढ़ई है न कि एक अध्यापक। हम कितने ही ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनका जीवन अपने रोजगार तथा उथले मनोरंजन की नीरस खींचतान में व्यतीत होता है। वे भले ही अपने व्यवसाय अथवा धंधे में कितने ही कुशल तथा ख्यातिप्राप्त क्यों न हों-चाहे वह कानून हो, धर्म हो, चिकित्सा हो अथवा कोई अन्य कोई कौशल हो, परन्तु जब भी उन्हें आजीविकोपार्जन संबंधी अध्ययन से फुर्सत मिलती है वे केवल गोल्फ, शतरंज, पर्वतारोहण में ही अपना समय व्यतीत करते हैं। ऐसे एकांगी अति-भौतिकवादी लोगों से मैं यही कहूंगा, ध्यान रखिए कहीं छाया ही आपके हाथ में न रह जाये तथा सारवस्तु निकल जाये। यह माना कि आप अपनी बुद्धि का प्रयोग पैसा कमाने में कर सकते हैं किन्तु इस प्रकार आप प्रकृति की इस अमूल्य देन का निरादार एवं दुरुपयोग कर रहे होते हैं। 

मुख्यत: बुद्धि का प्रयोग विकास तथा समाज-सेवा के कार्यों में करना चाहिए। इसे अपने ही सह-नागरिकों के शोषण का अस्त्र मत बनाइए। यदि आप अपने मस्तिष्क को धनोपार्जन करने वाली एक मशीन बना लेते हैं तो आपमें तथा एक पतित एवं दयनीय वेश्या की स्थिति में कोई अंतर नहीं। इस प्रकार की वेश्यावृत्ति हमारी पूंजीवादी व्यवस्था में इतनी छाई हुई है कि आप इसे स्वाभाविक समझने लगे हैं। न तो आप इस स्थिति से घृणा करते हैं और न ही इस पर आपको कोई आश्चर्य होता है। प्र्रकृति ने आपको मस्तिष्क इसलिए दिया है कि आप जान सकें, विचार कर सकें, समझा सकें, अन्यों को समझा सकें, आविष्कार एवं शोधकार्य कर सकें तथा उस अतीव आनन्द की अनुभूति कर सकें जो उन सबको मिलता है जो प्रकृति के इस महान् नियम का पूरी तरह पालन करते हैं। ज्ञान का अनुगमन करने वाले जो आनन्द तथा कैवल्य सुख अनुभव करते हैं वह शब्दों द्वारा अकथनीय है। फ्रांसीसी प्राय: जीवन जीने की प्रसन्नता की बात किया करते हैं परन्तु यदि हम एक अन्य वाक्य जानने की प्रसन्नता को साथ जोड़ दें तो कैसा रहेगा? यदि आप अपने मस्तिष्क के सर्वतोमुखी विकास के कत्र्तव्य से विमुख होते हैं तो आप एक अकथनीय आनन्द से अपने आपको वंचित रखते हैं। यह आनन्द धन द्वारा क्रय की गई सभी सुख-सुविधाओं से कहीं हटकर है। इसलिए मानसिक बौनों के समान जीने पर संतोष न करें। ऐसे लोग धन की थैलियों के बोझ के नीचे दबे रह जाते हैं। आपको पूरे मानसिक उत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। यही प्रकृति का आपको आदेश भी है। अपने ही कट्टर शत्रु आप स्वयं न बनें तथा इस प्रकार अपने जीवन को व्यर्थ न करें।Ó

युवा वर्ग को जीवन की सार्थकता को समझने की आवश्यकता है, केवल धन कमाना ही जीवन का लक्ष्य नहीं। शिक्षा तो मानव विकास का साधन है, शिक्षा के दबाव में आ आत्महत्या करना गलत है। यह बात युवा व उसके माता-पिता दोनों को समझने की आवश्यकता है।     


-इरविन खन्ना, मुख्य संंपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

WhatsApp पर न्यूज़ Updates पाने के लिए हमारे नंबर 9814266688 को अपने Mobile में Save करके इस नंबर पर Missed Call करें ।


फीफा विश्व कप : कप्तान कोलारोव की फ्री-किक से जीता सर्बिया

समारा (उत्तम हिंदू न्यूज) : आठ साल बाद विश्व कप में कदम रख रह...

मौका मिलने पर चुनाव लड़ सकती हैं किम कर्दशियां

लॉस एंजेलिस (उत्तम हिन्दू न्यूज): रियलिटी टीवी स्टार किम कर्दशियां वेस्ट ने कहा है कि समय ...

top