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दलितों के बिना हिन्दुत्व!

Publish Date: January 17 2018 01:23:43pm

देश का संविधान बेशक धर्म-निरपेक्ष राजनीति की बात कहता है लेकिन आजादी से लेकर आज तक देश की राजनीति धर्म, सम्प्रदाय तथा जाति आधारित ही रही है। देश में नरेन्द्र मोदी सरकार के गठन के साथ ही हिन्दुत्व आधारित राजनीति के पक्ष व विपक्ष में चर्चा जारी है। प्रत्येक राजनीतिक दल का पहला लक्ष्य सत्ता प्राप्ति ही होता है और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नित्य नये राजनीतिक दांव-पेच राजनीतिक दल लगाते रहते हैं।
मोदी के नेतृत्व में बनी राजग की सरकार से पहले की राजनीति का मुख्य आधार तुष्टिकरण ही था। मुस्लिम समाज और दलित वर्ग को हिन्दुत्व का भय दिखाकर 'वोट बैंक' तैयार किया जाता था। समय के साथ जन साधारण तुष्टिकरण की राजनीति से तंग आ गया और उसने भाजपा व उसके सहयोगी दलों को नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में स्पष्ट बहुमत दे दिया। मोदी को गिराने या भावी लोकसभा चुनावों में चुनौती देने के उद्देश्य से कांग्रेस व उनके सहयोगी दल एक बार फिर सम्प्रदाय आधारित वोट बैंक की राजनीति को आधार बनाकर सत्ता सुख पाने के प्रयास में है।
भारत में सत्ता पाने के लिए किसी भी दल को देश के बड़े प्रदेशों में आधार मजबूत करने की आवश्यकता होती है। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मोदी सरकार के विरोधी दलित और मुस्लिम समाज को हिन्दुत्व विरुद्ध एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव दलित बनाम सवर्ण विवाद बनाने का इसी तरह का ही प्रयास किया गया था। कांग्रेस अतीत में भी दलित व मुस्लिम समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती रही है और अब एक बार फिर वही प्रयास कर रही है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों जागरण समाचार पत्र समूह के साथ बातचीत में हिन्दुत्व को लेकर जो विचार प्रकट किए उसके कुछ अंश आप सम्मुख रख रहा हूं:-
रोहित वेमुला प्रकरण के बाद महाराष्ट्र से दलित राजनीति पर फिर नई बहस छिड़ी है। इस पर आक्रामक विपक्ष का तर्क है कि भाजपा और केंद्र सरकार दलित विरोधी हैं लिहाजा दलितों की सुनी नहीं जा रही?
ये सब निरर्थक बातें हैं। वे लोग ऐसी बातें करते हैं जो भारत को नहीं जानते। भारत को जानना है तो महर्षि वाल्मीकि, कृष्ण द्वैपायन व्यास, संत रविदास और डा. भीमराव अंबेडकर को जानने की कोशिश करनी चाहिए। जो भी व्यक्ति इन्हें मन से पढ़ेगा, इनके लिखे हुए की भावना को समझने का प्रयास करेगा वह भारत की आत्मा को समझ जाएगा। ...और जो यह समझ जाएगा फिर वह भारत को जाति, मत या संप्रदाय के आधार पर विभाजित करने की कुचेष्टा भी छोड़ देगा। त्रेता में जब महर्षि वाल्मीकि को भारत को एक सूत्र में बांधना था तो उन्होंने श्रीराम को माध्यम बनाया। राम की मर्यादा ने पूरब से पश्चिम तक भारत को एक किया। संस्कृत का पहला मौलिक महाकाव्य रचने का श्रेय भी महर्षि को ही जाता है। द्वापर में यही काम महर्षि व्यास ने महाभारत और श्रीमद्भागवत की रचना करके किया। उन्होंने लीला पुरुषोत्तम के माध्यम से समग्र भारत को जोड़ा। कर्मयोग की शिक्षा देने वाली गीता भी महाभारत का ही एक अंश है। भक्तिकाल में संत रविदास आए जिन्होंने ईश्वर भक्ति की धारा को भारत के गांव-गांव, गली-गली पहुंचाया। आप रविदासियों से मिलें। उनकी सज्जनता और धर्म के प्रति उनका समर्पण अभिनंदनीय है। आधुनिक काल में डा. भीमराव अंबेडकर आए जो स्वतंत्र भारत की व्यवस्था संचालित करने के एक विशद ग्रंथ का माध्यम बने। 
-ये चारों दलित थे। आप कहना चाहते हैं कि दलितों ने भारत की आत्मा को पहचाना? 
जी, बिल्कुल यही कहना चाहता हूं। इनसे पहले वेदों की रचना देखें तो वहां भी अनेक रचनाकार दलित मिल जाएंगे। आज से कितने समय पहली हुई थी रामायण की रचना। भक्ति और मुक्ति दोनों का आधार है रामायण। संतों, बटुकों की आजीविका और कथा, प्रवचन का आधार भी है रामायण। हमारे जीवन में सैकड़ों वर्षों से सकारात्मक परिवर्तन लाती रही है रामायण। लोग बातें चाहे जितनी कर लें, मैं पूछता हूं जातिवाद होता तो इन दलित लेखकों और विचारकों को क्या इतनी मान्यता मिलती। उनके साहित्य को जिस समाज ने न केवल सहर्ष स्वीकार किया बल्कि उसे हृदय से लगाया, उसका अनुकरण किया, वह अनुदार भला कैसे हो सकता है। जातिवाद होता तो मध्यकाल में संत रामानंद जैसे विद्वान ब्राह्मण क्या रविदास को अपना शिष्य बनाते। रामानंद ने ही तो लिखा था,-जाति पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई। अंबेडकर ने संविधान रचना की तो अपने साथ हुए भेदभाव को बाधक नहीं बनने दिया। वर्तमान परिदृश्य में इन महात्माओं के प्रति श्रद्धा-सम्मान का भाव रखते हुए हम सबको भारत की एकता के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। लोग देखें कि पहले दिन से इस देश में महिलाओं को मताधिकार मिला। यह क्या साधारण बात है। डा. अंबेडकर समतामूलक समाज बनाने के प्रति आग्रही थे। 
-दलित बनाम हिंदू या दलित बनाम ब्राह्मणवाद की बहस का कारण कहीं यह तो नहीं कि सवर्णों में दलितों के प्रति विद्वेष बढ़ा है और जिसे समझने में केंद्र सरकार और भाजपा चूक रहे हैं? 
नहीं ! केवल वे लोग हर छोटी बात को बड़ा बनाना चाह रहे हैं जो केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के नेतृत्व को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। वर्ष 2022 में देश अपनी स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं जयंती मनाने जा रहा है। प्रधानमंत्री उस समय तक भारत को जाति, मत, मजहब और गरीबी मुक्त देश बनाना चाहते हैं। ऐसा देश जहां आतंकवाद, नस्लवाद और नक्सलवाद न हो। कुछ लोगों को यह अखर रहा है। 
- इस बीच दलित-मुस्लिम एकता की बात भी चली है। आप इसे किस रूप में देखते हैं? 
दलित-मुस्लिम एकता असंभव कल्पना है। मित्रता वहां चलती है जहां आत्माएं मिलती हों। राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर की गई कोई भी दोस्ती कभी स्थायी नहीं हो सकती। यह तो राजनीतिक गठजोड़ हुआ। हिंदुओं को बांटने के ऐसे प्रयास पहले भी होते रहे हैं। हैदराबाद के निजाम ने भी ऐसी कोशिश की थी, लेकिन जिसे डा. अंबेडकर ने खारिज कर दिया था। ऐसी कुत्सित कोशिशों को जवाब जनता देगी। भारत का वोटर सीधा परंतु बहुत बुद्धिमान भी है। वह इन विभाजनकारी ताकतों के प्रभाव में नहीं आने वाला। जो लोग ऐसे तत्वों को फाइनेंस कर रहे हैं, उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी। मैं आपसे एक बात कहता हूं। दलितों के बिना हिंदू समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। दलितों के बिना हिंदुत्व नहीं। दलितों से अधिक धार्मिक और सात्विक भला और कौन है। आप मेरी बात के कितने ही उदाहरण देख सकते हैं। इतिहास उठाकर देख लें, धर्म की रक्षा में दलितों का योगदान प्रत्यक्ष है।
योगी आदित्यनाथ जो कह रहे हैं वह एक ऐसा सत्य है जिससे कोई मुंह नहीं मोड़ सकता। हिन्दुत्व को कमजोर करने के लिए अतीत में और वर्तमान में भी कोशिशें जारी हैं, भविष्य में भी जारी रहेंगी।  दलित-मुस्लिम एकता केवल राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए तो हो सकती है, सैद्धांतिक तौर पर नहीं। ज्ञात रहे दलित नेता जोगिन्द्र मंडल और मुस्लिम लीग के राजनीतिक सहयोग के रूप में यह प्रयोग अतीत में भी हो चुका है। आजादी के बाद जोगिन्द्र मंडल पाकिस्तान चले गए और वहां के पहले कानून मंत्री बने लेकिन जल्द ही मुस्लिमों को लेकर उनका भ्रम जाता रहा और उन्हें याहियां खां की सरकार से त्यागपत्र देकर वापिस भारत लौटना पड़ा। अतीत में किया प्रयोग आज भी सफल नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों में व्यवहारिक स्तर पर बहुत भिन्नता है। वही दलित हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है। हिन्दुत्व प्रेमियों को हिन्दुत्व विरोधी नीतियों पर सतर्क हो न•ार रखने की आवश्यकता है, क्योंकि लापरवाही हानिकारक ही साबित होगी।


 -इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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