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अभिव्यक्ति पर प्रहार है 'पद्मावती' का विरोध

Publish Date: January 20 2018 02:13:50pm

-राजेन्द्र राजन

यह बात जग ज़ाहिर हो चुकी है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावती' को लेकर देशभर में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में मूल एजेण्डा क्या है? राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा में भाजपा की सरकारें हैं। उनके मुख्यमंत्रियों ने फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा की है। मगर देश के अन्य राज्यों की सरकारों ने 'पद्मावती' की स्क्रीनिंग को लेकर चुप्पी साध रखी है। ममता क्योंकि भाजपा विरोधी हैं, बंगाल में फिल्म के प्रदर्शन के आफर के पीछे संकेत यह है कि वे उन सभी संगठनों या आंदोलनकारियों को करारा जबाव देना चाहती हैं जो भाजपा समर्थित हैं। 'पद्मावती' को लेकर हो रहे उग्र व हिंसक आंदोलन की तह में राजनीति काम कर रही है। ऐसा माना जा रहा है कि मुस्लिम समाज के विरुद्ध हिन्दूवादी संगठनों का धु्रवीकरण हो रहा है और भाजपा गुजरात विधानसभा चुनाव में ऐसे संवेदनशील मुद्दे का लाभ लेना चाहती थी।
    
    यह खेदजनक है कि राजस्थान में करणी सेना और अन्य संगठनों ने दीपिका पादुकोण और संजयलीला भंसाली की हत्या के लिये सार्वजनिक तौर पर घोषणाएं की हैं। वास्तव में यह ऐसे संगठनों की बीमार मानसिकता का परिचायक तो है ही, इससे यह भी पता चलता है कि ये लोग हरियाणा की खाप पंचायतों की तर्ज पर बेहद खूंखार किस्म के हैं जो खास एजेन्डे को फलीभूत करने या उसे वोटों में तब्दील करने के वास्ते किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस प्रकरण में सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि जिन तथाकथित संगठनों ने तोड़-फोड़ की है और फिल्म के कलाकारों और निर्माताओं को जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं, उनके विरुद्ध सरकार, कानून व्यवस्था, पुलिस प्रशासन की चुप्पी विचलित करती हैं। यानी सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और फिल्म से जुड़े कलाकरों की हत्या करने की खुली धमकियों के बावजूद ऐसे लोग अब तक सलाखों के भीतर क्यों नहीं हैं? स्पष्ट है कि ऐसे सभी नेताओं को भाजपा सरकार के मुख्यमंत्रियों का संरक्षण प्राप्त है। अगर फिल्म को लेकर विरोध प्रदर्शन सरकारों के एजेन्डे को प्रोमोट नहीं करता तो शायद खून खरावे वाली मानसिकता के लोग हवालात में होते। प्रख्यात फिल्म निदेशक श्याम बेनेगल ने उचित ही कहा है कि जो लोग खुले आम 'पद्मावती' के कलाकारों की हत्या करने की घोषणाएं कर रहे हैं, उनके विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो रही। उल्टे सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता उनका समर्थन कर रहे हैं। देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था सहिष्णुता और अभिव्यक्ति के लिए यह बेहद खतरनाक स्थिति है।

    मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट का सीधा निशाना ऐसे मुख्यमंत्रियों या सरकारों पर रहा जो जिम्मेदार पदो पर बैठकर गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लोक सेवकों की बयानबाजी पर सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि लोक सेवकों को किसने यह अधिकार दिया कि वे सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाए? सुप्रीम कोर्ट ने दो बार 'पद्मावती' फिल्म पर याचिकाएं खारिज की हैं और परोक्ष रुप से राजनेताओं और हिंसक प्रदर्शन में शामिल लोगों को लताड़ लगाई है। लेकिन इससे प्रदर्शनकारियों पर कोई सकारात्मक प्रभाव होगा ऐसा नहीं लगता। वे तो शायद कठपुतलियों हैं, जिन्हें सत्तारूढ़ सरकारों के नेता अपने वोट बैंक को मजबूत करने और हिन्दूवादी संगठनों की भावनाओं को भडक़ाने के लिये अपने इशारों पर नचा रहे हैं?
    
    ‘पद्मावत’ महाकाव्य की रचना 700 साल पहले मलिक मौहम्मद जायसी ने की थी। उन्होंने अपनी कृति में कहीं इस बात के संकेत नहीं दिये थे कि उनकी रचना वास्तविक या ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित है। 'पद्मावती' फिल्म को लेकर मचे बवाल के पीछे मात्र जनआस्था व जनश्रुतियों को आधार बनाया जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि इतिहास में अल्लाउद्दीन खिलजी और पद्मावती का कहीं भी लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। यानी यह केवल जनआस्था का प्रश्न है। यह बात सचमुच हास्यास्पद है कि जिन ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ को मुद्दा बनाया गया है उनकी सत्यता को जानने का प्रयास किसी भी आंदोलनकारी संगठनों के नेताओं ने नहीं किया। यानी केवल मात्र विरोध के लिये विरोध जताना है क्योंकि उसके पीछे छिपे एजेन्डे को अमलीजामा पहनाने का दबाब काम कर रहा है। 

फिल्म की कहानी के किन प्रसंगों को परदे पर उतारा जाए और किन्हें नहीं, इसका निर्णय निर्माता निर्देशक को नहीं, भीड़ को करना चाहिए? यह नितान्त गलत सोच है फिल्म निर्माण एक क्रिएटिव माध्यम है। कला की अभिव्यक्ति है। पद्मावती फिल्म में अगर कल्पनाशीलता और यथार्थ का मिश्रण कर अगर उसे क्रिएटिव आर्ट में ढाला गया है तो इसमें कुछ भी $गलत नहीं है। दूसरे, फिल्म के सेन्सर बोर्ड से पास होने या उसकी रिलीज़ से पहले ही फिल्म पर आरोप-प्रत्यारोप की बौछारों को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। किसी भी पुस्तक, फिल्म या सृजनात्मक कृति के सार्वजनिक होने के बाद ही उस पर आलोचनात्क टिप्पणियां की जा सकती है। नैतिकता का तकाजा यही है कि पद्मावती फिल्म को हिन्दू रानी के जौहर और मुस्लिम शासक अल्लाउदीन खिलजी की बदनीयत को साम्प्रदायिक दृष्टि से न देखकर उसे कला के स्तर पर आंका जाना चाहिए। पद्मावती एक फीचर फिल्म है नाकि एक डाक्यूमेन्टरी फिल्म जिसमें ऐतिहासिक दस्तावेजों का बखान हो। कहानी पर आधारित फिल्मों में कभी कभार काल्पनिक घटनाओं का समावेश कर उसके कला पक्ष को उभारने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इससे पद्मावती जैसे आदर योग्य किरदार की अवमानना की मंशा नहीं झलकती। उल्टे जौहर के माध्यम से पद्मावती के त्याग और बलिदान की गाथा को चितौडग़ढ़ की तंग गलियां से निकाल कर उसे करोड़ों-अरबों दर्शकों के दिलों में उतारने को प्रयास किया है, जो पद्मावती के प्रति बड़े सम्मान का सूचक है। इसके लिये भंसाली की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। 

निश्चित रुप से पद्मावती का समूचा व्यक्तित्व व कृतित्व महिला समाज के लिये प्ररेणादायक रहा है। वे रोल माडल है। लेकिन प्रश्न यह कि क्या राजस्थान के समाज ने पद्मावती जैसी महान शख्शियत से कोई प्रेरणा प्राप्त की है? शायद नहीं। अगर ऐसा होता तो मरू प्रदेश में बच्चियों को पैदा होते ही उन्हें मौत के घाट न उतारा जाता। देश के दीगर प्रान्तों की तुलना में राजस्थान में बेटी का जन्म अभिशाप माना जाता है। यही कारण है कि लिंग अनुपात में राजस्थान पिछड़ रहा है। बाल विवाह यहां बड़ी सामाजिक कुरीति रही है जिस पर सरकार व प्रशासन चुप्पी साधे रहते हैं। करणी सेना व अन्य संगठनों को ‘बेटी बचाओ’ अभियान में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए। बाल विवाह पर अंकुश के लिये वे आंदोलन करें। लड़कियों की सुरक्षा के लिये पहल करें। मगर ऐसा कभी नहीं होगा क्योंकि विकृत मानसिकता के स्वयंभू नेताओं को पद्मावती के बहाने अपनी औछी राजनीति चमकानी है।

हिन्दू मुस्लमान समुदायों में सद्भाव व भाईचारे की जड़ों को पुख्ता करने की बजाय ऐसे आंदोलन उन्हें आपस में लड़ाने-भिड़ाने का काम करते हैं। देश में लगातार असहिष्णुता का माहौल बन रहा है और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे मंडरा रहे हैं। अगर जावेद अख़्तर कहते हैं कि हिन्दू राजाओं-रजवाड़ो द्वारा मु$गलों और अंग्रेजो के समक्ष घुटने टेक देने के कारण भारत एक हजार साल तक $गुलाम रहा तो इसमें कुछ भी $गलत नहीं है। ‘निश्चित तौर पर पद्मावती पर हो रहा आंदोलन को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। पद्मावती से भावनात्मक रुप में जुड़े समाज की भावनाएं तो तब आहत होंगी, जब वह रिलीज़ होगी और उसमें इतिहास से छेड़छाड़ के आरोप को सही पाया जाता है। फिलहाल सेंसर बोर्ड ने तकनीकी कारणों से फिल्म को लौटा दिया है। अगर गुजरात चुनाव के बाद पद्मावती पर छिड़ा आंदोलन शान्त हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तब स्वत: ही आंदोलनकारियों के हिडन एजेन्डे का पर्दाफाश हो जाएगा।
    
पद्मावती को लव जिहाद की घटनाओं से जोडक़र भी देखा जा रहा है। राजपूत समाज यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि अल्लाउदीन खिलजी जैसा क्रूर शासक पद्मावती पर बुरी नज़र रखे और उनका प्रतिबिम्ब आइने में देखने के जुर्रत करे। सात सौ साल पहले के इन तथ्यों का कोई दस्तावेजी आधार है, कोई नहीं जानता। अस्सी के दशक में जब श्याम बेनेगल ने भारत एक खोज जैसे लम्बे टीवी धारावाहिक का निर्माण किया था तो उसमें अल्लाउदीन खिलजी व पद्मावती के प्रेम प्रसंग पर एक ऐपीसोड था। लेकिन तब राजपूत समाज ने उसका विरोध नहीं किया था। इसी प्रकार जब ‘रानी रुपमती’ फिल्म का निर्माण हुआ था तो इस बात का किसी ने भी नोटिस नहीं लिया था कि मुस्लिम शासक बाज बहादुर ने दक्षिण राजपूताना की रानी रुपमती से रोमांस किया था। अपने ज़माने में यह हिट फिल्म थी। सन 1946 में ‘राजपुतानी’ नाम से हिन्दी फिल्म का निर्माण हुआ था जो रानी पदमावती की कहानी पर आधारित थी। इसमें वीना ने पद्मावती का किरदार निभाया था तो जयराज ने राजा रत्नसेन का। इस फिल्म में भी ऐसा दृश्य था जिसमें खिलज़ी रानी के सौंदर्य को आईने में देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। खिलजी की भूमिका बिपिन गुप्ता ने निभाई थी। लेकिन न तो ‘राजपुतानी’ का विरोध हुआ ना ही ‘रानी रुपमती’ का। लेकिन तब शायद राजस्थान का समाज जागरुक नहीं था। राजनीति की शतरंज की परिकाष्ठा और मीडिया के ज़बरदस्त प्रचार ने सोये हुए समाज को जागृत किया है। लेकिन किसी भी साहित्यकि कृति या फिल्म का विरोध तर्कसंगत होना चाहिए, क्योंकि सतत मन्थन, बहस और विमर्श से ही प्रत्येक कला माध्यम परिपक्वता के उत्कर्ष को ग्रहण करता है।

(लेखक फिल्म टिप्पणीकार हैं और इरावती पत्रिका के संपादक हैं। मोबाइल:- 82191-58269)

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