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प्राचार्य की हत्या

Publish Date: January 22 2018 03:57:28pm

यमुनानगर के स्वामी विवेकानंद स्कूल में 12वीं कक्षा के छात्र द्वारा स्कूल की महिला प्राचार्य की गोली मार कर हत्या करने के हादसे ने अतीत में स्कूली छात्रों द्वारा किए अपराधों की याद भी ताजा कर दी है। गुरुग्राम, लखनऊ, जम्मू, जालन्धर तथा देश के कई अन्य भागों से स्कूली छात्रों द्वारा रोष में आकर अपने सहयोगी की हत्या करना, आत्महत्या करना या बलात्कार करना तमाम घटनाएं अति चिंताजनक हैं।
अपराध की राह पर चले विद्यार्थियों का संबंध विभिन्न स्कूलों और क्षेत्रों से है। कहीं अपराधी पकड़े गए और कहीं लापरवाही के लिए स्कूल प्रबंधक कमेटी या प्राचार्य को दंडित किया गया। प्रश्न यह है कि छात्र जो अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखने जा रहे हैं, उनमें इतना गुस्सा क्यों है कि वह सारी सीमाओं तथा मर्यादाओं को तोडऩे में कोई भय नहीं महसूस करते।
क्या बच्चों के लालन-पालन में कोई कमी रह गई या हमारी शिक्षा व्यवस्था में कमी है। सामाजिक परिस्थितियों में आ रहा बदलाव इसका कारण है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि उपरोक्त तीनों पहलुओं के साथ कई और कारण भी हैं जो युवा मन को प्रभावित करते हैं।
जहां तक यमुनानगर में प्राचार्य की हत्या का मामला है, तो छात्र को मां-बाप को बुलाने को कहा गया था और गलत हरकतों के कारण उसे कुछ दिनों से स्कूल से निष्कासित किया गया था। उसने इस बात की प्रतिक्रिया स्वरूप प्राचार्य की ही गोलियां मार कर हत्या कर दी। लखनऊ और गुरुग्राम में स्कूल में छुट्टी कराने हेतु बड़ी कक्षा के छात्र ने छोटी कक्षा के छात्र को चाकू मार दिया। एक मामले में छात्र बच गया तो दूसरे में उसकी मृत्यु हो गई। इसी तरह एक अन्य मामले में 10 वर्ष के छात्र ने छोटी कक्षा की छात्रा से बलात्कार किया है। इसी तरह के कई अन्य मामले आए दिन समाचारपत्रों की सुर्खियां बनते रहते हैं।
उपरोक्त घटनाओं से जहां स्कूल के वातावरण पर ऊंगली उठती है, वहीं परिवार के माहौल पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। एक स्कूली छात्र कुछ घंटे स्कूल में गुजारता है लेकिन अधिकतर समय तो परिवार में ही गुजारता है। वर्तमान परिवार छोटे परिवार हैं। संयुक्त परिवार टूट चुके हैं। आजकल तो हम दो हमारे दो का समय भी बदल चुका है और हमारे एक को ही प्राथमिकता दी जाती है। यहां स्वर्गीय दादा जी द्वारा कही बात याद आ गई है। वह कहते थे, एक बच्चे की मां अंधी होती है, दो बच्चों की मां कानी और तीन बच्चों की मां आंखों वाली होती है, उनका भाव स्पष्ट था कि एक बच्चे की मां को केवल अपना बच्चा ही दिखाई देता है। शेष दुनिया के प्रति वह अंधों की तरह ही बर्ताव करती है। जिसके दो बच्चे होते हैं, उसे बच्चों के अलावा दूसरे भी कुछ-कुछ दिखाई देते हैं। तीन बच्चों की मां दुनिया के प्रति सजग रहते हुए बच्चों की देखभाल करती है।
छोटे परिवार होने के कारण अधिकतर मां-बाप चाहे वह अमीर हों या गरीब, वह अपने इकलौते बच्चे की जायज या नाजायज मांग को पूरी करने का ही प्रयास करते हैं। अगर मां-बाप दोनों नौकरी पेशा हैं तो वह बच्चे को समय ही बहुत कम देते हैं। इसका हल वह टीवी में ढूंढते हैं और खाते, पीते, सोते वह बच्चे को टीवी सम्मुख छोड़ देते हैं। बच्चा उसमें क्या देखता है, उसके प्रति अधिकतर मां-बाप उदासीन ही रहते हैं, क्योंकि उनकी तत्काल समस्या का समाधान हो जाता है। इससे भी खतरनाक स्थिति है, जिन बच्चों के पास बचपन में ही मोबाईल फोन है, वह उसका इस्तेमाल किस तरह कर रहे हैं, उस प्रति मां-बाप अधिक चिंता नहीं करते। लेकिन टीवी और मोबाईल में जो कुछ वह देखता व करता है, उसका प्रभाव तो उसके दिलो-दिमाग पर पड़ता ही है। इसका पता तब चलता है जब स्कूल के अन्दर या बाहर कोई अपराधिक घटना घट जाती है।
एक पुरानी कहावत है बच्चे को दिए संस्कारों का पता 20 वर्ष बाद चलता है, जब वह समाज का सामना करते हैं। पिछले दो-तीन दशकों से धन कमाने को ही प्राथमिकता दी जा रही है। व्यक्तिगत सुखों की चाहत में हम लोग परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल रहे हैं। उपरोक्त कारणों के परिणामस्वरूप जहां परिवारों में तनाव बढ़ रहा है, वहीं युवा मन में रोष बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप परिवारों में बिखराव बढ़ता जा रहा है। युवा मन के भटकने के कारण अपराध बढ़ रहे हैं।
संस्कारों का कमजोर होना ही बाल मन को कमजोर कर रहा है। आज का युवा अगर अपराध की राह पर चल पड़ा और खलनायक को नायक मान बैठा तो हमारा कल कैसा होगा, इस बारे आज ही हमें सोच लेना चाहिए।
धन कमाना समय की आवश्यकता व मांग भी है लेकिन कितना और किस तरह कमाना है इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। धन के लिए हवस होना इंसान के पतन की निशानी है जबकि संस्कारित इंसान समाज के लिए कही अधिक हितकारी है। समाज को एक अच्छा इंसान देने की जिम्मेवारी परिवार की है फिर स्कूल की है। जब स्कूल व्यापारिक दृष्टि से चलाएं जाएं और परिवार के सदस्य मशीन की तरह काम करते हुए धन कमाने लगें तो समझा जाएं कि परिवार और समाज दोनों अंधेरी गली की ओर ही बढ़ रहे हैं।
स्कूली छात्रों द्वारा किए जा रहे अपराध हमें यही संकेत दे रहे हैं।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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