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'भारत आइए'

Publish Date: January 25 2018 03:12:00pm

स्वीटजरलैंड के शहर दावोस में वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम के उद्घाटन भाषण में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व समुदाय को भारत में निवेश करने का जिस भारतीय ढंग से आह्वान किया उसने देश व दुनिया का दिल जीत लिया। विश्व के आर्थिक मंच पर बोलने का आम आदमी यही अर्थ निकालता है कि वहां पर केवल और केवल धन व व्यापार से संबंधित बातें ही होंगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के साथ भारत के आर्थिक ही नहीं सामाजिक व नैतिक पहलू को जोड़कर जो आह्वान किया वह विश्व मंच पर अपनी विशेष पहचान छोडऩे में सफल रहा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'भारत को निवेश का भविष्य करार देते हुए विश्व समुदाय से आह्वान किया कि अगर वे समृद्धि के साथ सेहत और शांति की आकांक्षा रखते हैं तो भारत जरूर आएं। भारत में उनका स्वागत रेड टेप के बजाय रेड कार्पेट से किया जाएगा। वे मंगलवार को यहां वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक के पूर्ण सत्र को संबोधित कर रहे थे। भारत की संभावनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 2025 तक हमारी अर्थव्यवस्था पांच लाख करोड़ डॉलर की हो जाएगी। हम तीसरे बड़े उपभोक्ता बाजार बन जाएंगे। हमें गरीबों और बेघरों के लिए पांच करोड़ मकान बनाने हैं। पचास से ज्यादा शहरों में मेट्रो सेवा शुरू करनी है। भारत के प्रति व्यक्ति का स्टील उपभोग 60 किग्रा है जबकि विश्व का औसत 218 किग्रा है। भारत में प्रति 1000 व्यक्ति पर वाहनों की संख्या 25 है जबकि यूरोपीय देशों में यह लगभग 500 है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और सिकुड़ते वैश्वीकरण को दुनिया के सामने 3 प्रमुख चुनौतियां बताते हुए इसके समाधान के लिए प्राचीन भारतीय दर्शन के अनुरूप सभी देशों से मिलकर काम करने का आह्वान किया। इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में मौजूदा समय के अनुरूप बदलाव को भी जरूरी बताया। जलवायु परिवर्तन को बड़ी चुनौती बताते हुए कहा कि इसके कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, कई द्वीप डूब चुके हैं या डूबने की कगार पर हैं। कहीं बहुत गर्मी, कहीं बहुत सर्दी, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की समस्या आ रही है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सीमित दायरों से निकलकर सभी देशों को इससे मुकाबले के लिए एक हो जाना चाहिए। मोदी ने कहा, हर कोई कहता है कि कार्बन उत्सर्जन कम हो, पर ऐसे कितने देश हैं जो विकासशील देशों को इसके लिए तकनीक उपलब्ध करवाते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में पृथ्वी को माता माना गया है। यदि हम पृथ्वी की संतान हैं तो प्रकृति और मानव के बीच संघर्ष क्यों चल रहा है। लालचवश हम अपने सुखों के लिए प्रकृति का शोषण तक कर रहे हैं।'
भारत का दृष्टिकोण तो श्रुति के उस महावाक्य से स्पष्ट हो जाता है, जिसमें प्रार्थना की गई है। 
सर्व भवन्तु, सुखिन: सर्व सन्तु निरामया।
सर्व भद्राणि पश्यन्तुमा कश्चिद ् दु:खमाग्मवेत्।।
अर्थात् सब सुखी रहें, सब निरोग हों, सब का कल्याण हो, दु:ख का अंश किसी को प्राप्त न हो। इसी तरह ऋग्वेद में कहा गया है-देवगण! हम कानों से सदा कल्याण वचन सुनें, आंखों से सदा शोभन-दृश्य देखे तथा दिव्य कर्म करते हुए पूर्णायु होकर जीएं।
अर्थववेद में कहा गया है कि यह पृथ्वी जो विविध भाषा-भाषियों और विविध धर्मांवलंबियों को इस प्रकार धारण करती है जैसे वे एक ही परिवार के सदस्य हों। भारत में नदियों, पेड़ों और पहाड़ों से लेकर पशु व पक्षियों की पूजा होती है। कण-कण में भगवान देखने वाले भारतीय दृष्टिकोण को आजादी के बाद भी विश्व मंच पर नहीं रखा गया तो इसका मूल कारण धर्म-निरपेक्षता की आड़ में खेले जाने वाला तुष्टिकरण का खेल ही था। राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के सकारात्मक पक्ष के प्रति भी उदासीनता दिखाई जाती रही।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय विचार दर्शन को विश्व के आर्थिक मंच पर जिस ढंग से रखा है उससे उनके नेता के रूप में विश्व स्तर पर कद बढ़ा है। वहीं भारतीय दृष्टिकोण को समझने में भी विश्व को आसानी होगी। भारत हमेशा विश्व में शांति चाहता है, जियो और जीने दो की नीति में विश्वास रखता है। लेकिन भारत की उस नीति को भारत की कमजोरी समझा जाने लगा, इसी कारण भारत की सीमाओं पर ही नहीं भारत के भीतर भी भारत विरोधी हिंसात्मक गतिविधियां करते रहे। अब मोदी सरकार ने भारत विरोधियों को उनको समझ आने वाली भाषा में उत्तर देना शुरू किया है तो स्थिति में परिवर्तन आता दिखाई दे रहा है।
नरेन्द्र मोदी ने विश्व के सामने जो प्रमुख चुनौतियां रखी हैं उन पर विश्व समुदाय को गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि सभी चुनौतियां गंभीर हंै जो हमारे वर्तमान के साथ-साथ भविष्य को भी प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। भावी पीढ़ी के प्रति हमारा यह कर्तव्य भी बनता है कि हम उनके लिए एक स्वच्छ वातावरण और माहौल छोड़कर जाएं।


- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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