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परिवार एकजुट रखने की कवायद

Publish Date: January 25 2018 03:17:09pm

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके सहयोगी संगठनों की पिछले साल सितंबर में वृंदावन में हुई वार्षिक समन्वय बैठक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह दूसरे संगठनों के प्रमुखों के साथ नीचे की कतार में बैठे थे। संघ के सरसंघचालक और दूसरे वरिष्ठï अधिकारी मंच पर विराजमान थे। इसका मकसद यह जताना था कि संघ परिवार में पदानुक्रम में सभी संगठन बराबर हैं, भले ही किसी एक संगठन को दूसरों से शक्तिशाली क्यों न माना जाता हो। आरएसएस से आए भाजपा के एक उपाध्यक्ष ने कहा, 'यह व्यवस्था भाजपा को वामपंथी दलों से अलग करती है। माकपा के अग्रिम संगठन राजनीतिक दल के अधीन काम करते हैं जबकि हमारे यहां आरएसएस धुरी है और भाजपा तथा बाकी संगठन उसके इर्दगिर्द हैं।'
इस बैठक में शाह को भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस), स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) , भारतीय किसान संघ (बीकेएस) और संघ परिवार के दूसरे संगठनों के अध्यक्षों के साथ बिठाया गया। गुजरात चुनावों से पहले शाह को चेतावनी दी गई कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कानून से कारोबारी खुश नहीं हैं जो परंपरागत रूप से भाजपा को वोट देते आए हैं। इस पर शाह ने कुछ नहीं कहा।  नरेंद्र मोदी सरकार के 4 साल पूरे होने जा रहे हैं और इस दौरान भाजपा ने एक के बाद एक कई राज्यों में चुनाव जीतकर जीएसटी और नोटबंदी के बारे में संघ परिवार की आंतरिक चिंताओं को दरकिनार किया है। अलबत्ता संघ परिवार की एक और चिंता है। शक्तिशाली भाजपा परिवार के दूसरे संगठन को हाशिये पर डाल सकती है और उन्हें अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। 
लेकिन संघ के एक सूत्र ने इस संभावना को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की पहली सरकार के 13 साल पहले सत्ता से बाहर होने के बाद भाजपा और संघ पारस्परिक उम्मीदों पर यथार्थवादी हो गए हैं। सूत्र ने दावा किया, 'अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में पहली समन्वय बैठक उनके सत्ता में आने के कई साल बाद 2002 में हुई थी। उसमें भी वाजपेयी सरकार के दो वरिष्ठï मंत्रियों जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा ने हिस्सा नहीं लिया। मोदी सरकार बनने के बाद हर साल समन्वय बैठक हो रही है। ज्यादा जानकारी साझा की जा रही है और सलाह मशविरे की एक व्यवस्था बनी है। यही वजह है कि भाजपा की चुनावी जीत और संघ के वैचारिक मुद्दे के बीच अच्छा तालमेल है।Ó
सूत्र ने भाजपा और संघ के बीच इस बदले समीकरण का श्रेय मौजूदा सरसंघचालक मोहनराव भागवत को दिया। संघ के पूर्व सरसंघचालक के एस सुदर्शन तो वाजपेयी सरकार के लिए सिरदर्द बन गए थे। संघ विचारक ने कहा, 'राजग की पिछली सरकार में मतभेद सार्वजनिक को गए थे। सुदर्शन सरकार के खिलाफ बयान जारी करते थे और प्रधानमंत्री कार्यालय उनका खंडन करता था। भागवत सरकार से ज्यादा उम्मीद नहीं पालते हैं।Ó
इसका यह मतलब नहीं है कि मोदी सरकार और संघ के सौहार्दपूर्ण संबंध हैं। एसजेएम के राष्ट्रीय सह संयोजक अश्वनी महाजन जोर देकर कहते हैं कि अगर उनके कार्यकर्ताओं ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन नहीं किया होता तो यह कानून बन गया होता। महाजन ने कहा, 'कांग्रेस इसका श्रेय ले सकती है लेकिन उसके नेता भी इस बात को मानते हैं कि अध्यादेश के खिलाफ के आंदोलन से सरकार को अपने हाथ पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा।'
महाजन ने कहा, 'प्रधानमंत्री कार्यालय ने उज्ज्वला, जनधन और मुद्रा जैसी जन समावेशी योजनाएं शुरू की हैं। नीति आयोग उन पर पलीता लगाने की कोशिश कर रहा है। जब हमने पहली बार नीति आयोग पर सवाल उठाया तो यह भगवान पर सवाल उठाने जैसा था। अच्छी बात यह है कि अब आयोग की और ज्यादा आलोचना हो रही है।Óलेकिन एसजेएम की तुलना में संघ का मजदूर संगठन बीएमएस और किसान संगठन बीकेएस केंद्र सरकार की नीतियों का ज्यादा विरोध किया है। कोयला खदानों की नीलामी के मुद्दे पर बीएमएस ने सरकार के खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद किया था और कोल इंडिया में हड़ताल की धमकी दी थी। सरकार को आश्वासन देना पड़ा कि खदानों का निजीकरण नहीं किया जाएगा, तब जाकर बीएमएस के तेवर ठंडे हुए।
बीएमएस के महासचिव ब्रजेश उपाध्याय ने स्वीकार किया कि केंद्र में भाजपा सरकार होने से सत्ता तक पहुंच आसान है क्योंकि हमारी विचारधारा समान है। लेकिन सरकार से कोई काम करवाना आसान नहीं है। वाजपेयी के दौर में बीएमएस में स्वदेशी विचारक दत्तोपंत ठेंगडी का दबदबा था और कई बार सरकार को उनके आगे नतमस्तक होना पड़ा था। उपाध्याय का कहना है कि बीएमएस सरकार को ऐसी रोजगार नीति बनाने के लिए मना रही है जिसमें रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
संघ के किसान संगठन का मोदी के साथ बहुत अच्छे संबंध नहीं रहे हैं। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी उनका बीकेएस के साथ छत्तीस का आंकड़ा था। बीकेएस के उपाध्यक्ष प्रभाकर केलकर का कहना है कि अगर केंद्र सरकार ने फसल आयात-निर्यात से जुड़ी व्यापक नीति नहीं बनाई और न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून नहीं बनाया तो ग्रामीण इलाकों में भाजपा का पत्ता साफ हो जाएगा। भाजपा की तरह बीएमएस और बीकेएस से बड़ी संख्या में आम कार्यकर्ता जुड़े हैं और केवल 10 फीसदी कार्यकर्ता ही संघ से हैं। उन्हें नाराज करना भाजपा को भारी पड़ सकता है क्योंकि चुनाव में बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद करने की जरूरत पड़ती है।

लेखक राधिका रामशेषन
 

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