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क्या गणतंत्र का कोई विकल्प है?

Publish Date: January 27 2018 12:44:11pm

'गणतंत्र' की परिभाषा करते हुए अब्राहम लिंकन ने कहा था-'जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन प्रणाली।' आज विश्व के अधिकतर देशों ने गणतंत्र प्रणाली को अपनाया है। आधुनिक विश्व  के लिए गणतंत्र एक सर्वाधिक आदर्श शासन प्रणाली है परंतु किसी भी शासन प्रणाली की सफलता उसके क्रियान्वयन के तरीके पर निर्भर करती है। विश्व के सबसे बड़े गणतांत्रिक देश के रूप में भारत में गणतंत्र की मूल भावनाओं को विस्मृत किया जाता रहा है और गलत हाथों में शासन की बागडोर चले जाने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। कुछ बुद्धिजीवी गणतंत्र को 'संख्याबल का खेल' मानते हुए इसे असफल पद्धति बताते रहे हैं। पर क्या गणतंत्र का कोई विकल्प हो सकता है? गणतंत्र का कोई विकल्प नहीं हो सकता। वर्तमान मेंं गणतंत्रीय प्रणाली का विकल्प या तो तानाशाही शासन हो सकता है या फिर सैनिक  शासन। इस तरह का विकल्प किसी भी समाज या राष्ट्र के हित में नहीं हो सकता। तानाशाही शासन कीे निरंकुशता या सैनिक शासन की आक्रामकता से सभी परिचित हैं। इस तरह की शासन प्रणाली से किसी भी राष्ट्र की भलाई संभव नहीं हो सकती।
मगर भारत में गणतंत्र की नींव रखने वालों ने जिन मूल्यों का बीजारोपण किया था और जिस स्वराज्य का सपना देखा था, आज वे मूल्य खतरे मेंं नजर आ रहे हैं। दिनोंदिन गणतांत्रिक शासन प्रणाली का कुत्सित स्वरूप जनमानस को आतंकित कर रहा है। राजनीति में जनसाधारण को जैसी बातेें सुननी नहीं चाहिए थी, जैसे दृश्य देखने नहीं चाहिए थे। वैसी बातें सुनकर, वैसे दृश्य देखकर यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि आज देश की राजनीति अपनी दिशा खोकर भटक चुकी है। इस तरह की राजनीति के साथ देश की सामान्य जनता के जीवन का तनिक भी संबंध नहीं है। न ही सामान्य जनता की संस्कृति, देश की मिट्टी-पानी-हवा के साथ कोई संबंध है। देश के करोड़ों नागरिकों की चेतना इस  राजनीति के माध्यम से उजागर नहीं हो  पा रही है। देश के वर्तमान काल की राजनीति के बारे में जब कोई इतिहास लिखा जाएगा, तब चाल्र्स डीकेंस की तरह इतिहासकार इस तरह शुरुआत करेगा- यह अत्यंत ही खराब समय था। चाल्र्स डीकेंस ने तो इतिहास के सकारात्मक पहलुओं को भी वर्णित किया था, मगर ऐसा हमारे लोकतंत्र के बारे में नहीं लिखा जा सकता। भारत में वर्तमान की राजनीति में मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। राजनेताओं ने नैतिक मूल्यों के साथ इस तरह खिलवाड़ किया है कि अब उनकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है। किसी भी कीमत पर सत्ता सुख हासिल करने की हठधर्मिता ने झूठ, छल, विश्वासघात, संशय जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया है। राष्ट्र का वृहत हित राजनीति में गौण हो गया है। व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देने की मानसिकता ने पांच हजार साल पुरानी सभ्यता-संस्कृति वाले इस देश को आज खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है। राजनीति में भ्रष्ट एवं कलुषित चेहरों की भरमार हो गई है। पल-पल बयान बदलने वाले आदर्शों और सिद्धांतों की दुहाई देकर स्वयं अनैतिक आचरण करने वाले राजनेता सरकार बनाने-गिराने का खेल खेल रहे हंै।
अब्राहम लिंकन ने कहा था, 'अगर आप किसी आदमी की असलियत जानना चाहते हंै तो उसे क्षमता देकर देखें।' क्षमता की लड़ाई में शामिल जनप्रतिनिधियों की कुत्सित और वीभत्स वास्तविकता देश के समक्ष स्पष्ट हो चुकी है। आज देश की गणतांत्रिक प्रणाली की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जनता के मतों से चुनकर सदन में  पहुंचे राजनेताओं के व्यवहार पर जनता का कोई नियंत्रण नहीं होता। अपने मतदाताओं को भूलकर ये राजनेता सत्तालोलुपता की होड़ में किसी भी हद को लांघने के लिए तत्पर रहते हैं। राजनीति की सिद्धांतहीनता का गहरा प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ता है। जो लोग सिद्धांतों को तिलांजलि देकर सत्ता संभालेंगे, उनके हाथों में देश का भविष्य कैसे सुरक्षित रह सकता है? रोमन सभ्यता के पतन के जो प्रमुख कारण थे, उनमें दो प्रमुख   थे रोमन शासकों का विलासितापूर्ण जीवन और अन्तर्कलह। आज भारतीय नेताओं के विलासितापूर्ण जीवन की असलियत जगजाहिर हो चुकी है। वहीं उनके बीच अन्तर्कलह भी लगातार बढ़ता जा रहा है। राजनीति की ऐसी अराजकता से राष्ट्र की रक्षा करने के लिए गणतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित करने की आवश्यकता है। देश के जागरूक लोगों को, विशेपरूप से चिंतकों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों एवं कलाकारों को एकजुट होकर नैतिक मूल्यों का स्वर बुलंद करना होगा। क्योंकि गणतंत्र के सिवा भारत में कोई विकल्प नहीं हो सकता। भारत के पड़ोसी देश सैनिक शासन के दुष्परिणाम भुगत चुके हैं। 

अशोक संचेती, लेखक (विनायक फीचर्स)       

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