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सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह ?

Publish Date: January 29 2018 05:03:02pm

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस कुरियन जोसफ और जस्टिस एम बी लोकुर ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपने ही संस्था के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश केस आवंटित करने का काम न्यायसंगत तरीके से नहीं कर रहें हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रेस कांफ्रेंस के पहले उन्होंने एक चिट्ठी मुख्य न्यायाधीश को लिखी थी जिसमें उन्होंने अपनी समस्याओं और मतभेदों से अवगत करवाया था लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने उसका संज्ञान ठीक से नहीं लिया। यही कारण रहा कि वे जनता की अदालत में प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से आएं हैं। 

अब इसमें कुछ बिंदुओं पर विचार विमर्श की आवश्यकता है । मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों का अधिकार क्षेत्र क्या है ?, क्या न्यायाधीशों के पास एक यही आखिरी विकल्प बच गया था ? क्या सचमुच लोकतंत्र खतरे में है ?  तो सबसे पहले मुख्य मुद्दा है केसों के आवंटन का अधिकार क्षेत्र जो इस विवाद का मूल भी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के बाकी वरिष्ठ न्यायाधीशों का किसी केस को सुनने और उसपर फैसले का अधिकार एक समान है लेकिन परम्परा के साथ यह मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है कि वह केसों का आवंटन कैसे और किसे करता है । 

जैसे ही बात किसी एक व्यक्ति विशेष के पद की विशेषाधिकार की आती है, निस्संदेह उस पद पर बैठा व्यक्ति अपने स्वविवेक से ही निर्णय लेगा और उसे ऐसा करना भी चाहिए। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश के बाद के न्यायाधीशों का कार्य होता है उन्हें आवंटित किए गए केसों की सुनवाई, उसपर निर्णय देना। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश के केस आवंटन पर प्रश्न चिन्ह लगाना न उनके अधिकार में है न न्याय संगत है। अगर न्यायाधीश प्रेस कांफ्रेंस कर के यह कह रहे हैं कि मुख्य न्यायाधीश केस के आवंटन में भेदभाव कर रहे हैं तो फिर ऐसा क्यों न सोचा जाए कि अन्य न्यायाधीश भी किसी से प्रभावित होकर मन मुताबिक केस पाना चाहते है ? यह एक विचारणीय प्रश्न है। 

अब आगे बढ़ते हुए न्यायाधीशों ने जो पत्र लिखा मुख्य न्यायाधीश को, उसका एक छोटा विश्लेषण करते हैं। अपनी ही संस्था के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखते वो कहते हैं कि यह पत्र वे इसलिए लिख रहे हैं ताकि इस अदालत से जारी किए गए कुछ आदेशों को चिन्हित किया जा सके जिन्होंने न्याय देने की पूरी कार्यप्रणाली और उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता के साथ भारत के सर्वोच्च न्यायालय के काम करने के तरीकों को बुरी तरह प्रभावित करके रख दिया है । इतना कहकर वे आगे के पत्र में अपने न्यायालय की स्थापना, उसके अस्तित्व और औचित्य पर आ जाते है लेकिन किसी खास केस का जिक्र नहीं करते जिसमें अदालत  ने गलत फैसला लिया है। यह देश की जनता के लिए असमंजस की हालत है । जिस संस्था पर उनका दृढ़ विश्वास रहा है उसपर ही उनके ही न्यायाधीशों द्वारा लगाया आरोप आम जन को संशय में डालता है और पत्र पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि उनकी कोशिश भी संशय में डालना ही है न कि मुद्दे से अवगत करवाना। जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है केसों का आवंटन।  इसे वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपने पत्र में महज परंपरा कहा है तो सवाल यह उठता है कि यह महज एक परंपरा है, कोई विशेषाधिकार नहीं तो क्या यह परंपरा बदली जा सकती है ? और न्यायाधीश अपने केसों का निर्धारण स्वयं कर सकते हैं ? और अगर ऐसा नहीं है तो इसे महज परंपरा न कहकर मुख्य न्यायाधीश का संवैधानिक विशेषाधिकार समझना चाहिए। 

वे आगे लिखते हैं कि वे इसका पूरा विवरण इस लिए नहीं दे रहे कि सर्वोच्च न्यायालय को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी है लेकिन सवाल उठता है कि अगर शर्मिंदगी की इतनी चिंता थी तो प्रेस कांफ्रेंस क्यों की और जनता की अदालत में आ ही गये हैं तो फिर लुका छिपी क्यों ? सारी बातें स्पष्टता से  क्या नहीं रखनी चाहिए और अगर नहीं रख रहे तो इसे अपने निजी हित हेतु जनता को गुमराह करने की कोशिश क्यों नहीं समझा जाना चाहिए ? वे आगे कहते हैं कि हम यह बताते हुए बेहद निराश हैं कि ऐसे कई मामले हैं जिनमें देश और संस्थान पर असर डालने वाले मुकदमे आपने अपनी पसंद के बेंच को सौंप दिए जिनके पीछे कोई तर्क नजर नहीं आता। तो सवाल उठता है कि क्या अन्य न्यायाधीशों को केस के आवंटन में दखल और सवाल पूछने का अधिकार है और वे ऐसा करके जिन्हें वे केस मुख्य न्यायाधीश द्वारा आवंटित किए गए हैं, उनकी विश्वसनीयता पर अंगुली नहीं उठा रहें है? 

अब सवाल उठता है कि उनके पास क्या एक यही विकल्प रह गया था ? वो चाहते तो ऐसे कुछ और पत्र संपूर्ण विवरण के साथ लिख सकते थे। मुख्य न्यायाधीश के साथ अन्य सभी न्यायाधीश चर्चा कर कोई हल निकाल सकते थे । अगर कोई संवैधानिक कानूनी कदम उठाना था तो महाभियोग की कोशिश कर सकते थे लेकिन जनता को प्रेस कांफ्रेंस के जरिए अधूरी जानकारी के साथ अपनी बात रखना इसे राजनीतिक रंग देना होता जो प्रेस कांफ्रेंस के तत्काल बाद शुरू भी हो गया । 

आखिरी बात जो सभी सम्मानित न्यायाधीशों ने कही कि लोकतंत्र खतरे में है, यह भी बेहद अटपटा और बचकाना  सा बयान महसूस हुआ क्योंकि जब देश के केन्द्र और सभी राज्यों में जनता द्वारा चुनी संवैधानिक सरकार बिना किसी अवरोध के चल रही है, प्रेस व मीडिया अपना काम स्वतंत्र रूप से कर रहा है पुलिस प्रशासन और सभी न्यायालय भी अपना काम निर्वाध रूप से कर रहें है, ऐसे में मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों के मतभेदों की रस्साकशी को लोकतंत्र पर खतरा नहीं कहा जा सकता। हां, इसमें कोई संदेह नहीं कि इस प्रकरण ने सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। 

लेखक अमित  अम्बष्ट
 

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