Tuesday, May 22,2018     ई पेपर
ब्रेकिंग न्यूज़
राजनीति

कानून ने केजरीवाल को दिखाया आईना 

Publish Date: February 02 2018 12:13:57pm

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को लाभ के पद पर रहने के आरोप में अयोग्य ठहराने की चुनाव आयोग की सिफारिश को मंजूरी दे दी है। आयोग के ताजा फैसले से आम आदमी पार्टी और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बड़ा झटका लगा है। 'आप' के ये बेचारे विधायक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की खुदमुख्तारी के शिकार हुए हैं। जब केजरीवाल संसदीय सचिवों की 'रेवडिय़ां' बांट रहे थे, तब 'आप' के ही कुछ नेताओं ने भी सवाल किए थे, केजरीवाल को सचेत किया था लेकिन मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार का हवाला देते हुए केजरीवाल ने दखल नहीं देने की बात कही थी। मुख्यमंत्री केजरीवाल संविधान और कायदे-कानून की स्वत: ही व्याख्या करते रहे हैं, नतीजतन मुसीबतों में फंसते रहे हैं। इस मामले के जरिए संविधान ने केजरीवाल को आईना दिखाया है। 
कानून की दृष्टि से आम आदमी पार्टी का यह आचरण संविधान के अनुच्छेदों 102 (1) और 191 (1) का सरासर उल्लंघन है। यह जनप्रतिनिधित्व कानून की धाराओं के भी खिलाफ है। बेशक संसदीय सचिव बने विधायकों ने कोई भी वेतन, भत्ते, वाहन और सुविधाएं नहीं लीं लेकिन सवाल है कि विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बनाया गया? विधायकों को लाभ के पद क्यों दिए गए? मंसूबे साफ हैं, बेशक सफाई कुछ भी दी जाती रहे। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इन नियुक्तियों को 'असंवैधानिक' करार दिया था। फिर 1997 के कानून में संशोधन कर विधायकों को 'लाभ के पद' से बाहर लाने वाला बिल पारित क्यों किया गया? 
तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उस बिल को नामंजूर कर दिया था। वकील प्रशांत पटेल की शिकायत पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ही चुनाव आयोग की राय मांगी थी तो वह सामने है। चुनाव आयोग ने 'लाभ के पद' पर आसीन आम आदमी पार्टी (आप) के 20 विधायकों को 'अयोग्य' करार देते हुए उनकी सदस्यता समाप्त करने का फैसला किया है और यह सिफारिश राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अंतिम निर्णय के लिए भेज दी जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया है। 
चुनाव आयोग इस संदर्भ में एक विशेषज्ञ संवैधानिक संस्था है। मौजूदा प्रकरण में सवाल चुनाव आयोग की निष्ठा, तटस्थता और संवैधानिक ईमानदारी पर भी उठे हैं। आयोग ने 23 जून, 2017 के एक सर्कुलर में लिखा था कि विधायकों की सदस्यता आयोग के न्यायिक दायरे में है। आगे की सुनवाई की जाएगी लेकिन तथ्य यह है कि सुनवाई एक दिन भी नहीं की गई और 19 जनवरी, 2018 को 20 विधायकों को 'अयोग्य' घोषित कर दिया गया जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट एक बार फिर सुनवाई जरूर करेगी।
'आपÓ और सरकार को अदालतों से मुक्ति नहीं मिल पा रही है। सिर्फ 20 विधायकों पर ही तलवार नहीं लटक रही है बल्कि 27 अन्य विधायक भी चुनाव आयोग के विचाराधीन हैं। उन्हें केजरीवाल ने 'रोगी कल्याण समितियोंÓ की अध्यक्षता दे रखी है। इस सूची में 10 विधायक ऐसे हैं जिन्हें चुनाव आयोग पहले ही 'अयोग्य' घोषित कर चुका है। लिहाजा 17 विधायक और हैं जिनकी सदस्यता पर तलवार लटकी है। 'लाभ के पद' सांसदों और विधायकों के लिए हैं और वे केंद्र तथा राज्य सरकारों में अच्छी तरह परिभाषित हैं। लिहाजा केजरीवाल और 'आप' के अन्य नेता दूसरे राज्यों के उदाहरण न दें जहां संसदीय सचिव बनाए जाते रहे हैं और अब भी हैं। दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है और उसका संविधान भी भिन्न है। लिहाजा बार-बार प्रधानमंत्री मोदी को कोसना और अब चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री का एजेंट करार देना बेहद आपत्तिजनक हरकतें हैं। केजरीवाल और 'आपÓ के नेताओं ने इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया है। 
फरवरी, 2०15 में केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में 'आप' ने ऐतिहासिक चुनावी सफलता हासिल करते हुए विधानसभा की 7० में से 67 सीटें जीती थीं। सत्ता में आए थोड़े दिन बाद ही केजरीवाल ने पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया। इनमें से एक विधायक ने पिछले साल इस्तीफा दे दिया था। शेष जो 20 बचे, उनको चुनाव आयोग ने अयोग्य घोषित कर दिया। सवाल है कि एक छोटे से सदन में इतने विधायकों को संसदीय सचिव बनाने की क्या जरूरत पड़ गई थी? फिर इस पर विडंबना यह भी है कि इन नियुक्तियों पर सवाल उठने व मामला अदालत में जाने के बावजूद भी केजरीवाल को कोई होश नहीं आया।
पार्टी और केजरीवाल अपने मामले में सफाई पेश करते रहे, कई तर्क भी देते रहे और मोदी सरकार और भाजपा पर दुराशय के आरोप लगाते रहे लेकिन यह शुरू से ही तय लग रहा था कि इन विधायकों की सदस्यता समाप्त होगी। 2015 में नियुक्त इन संसदीय सचिवों को दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 में इसलिए अमान्य कर दिया था कि उप राज्यपाल ने इनकी नियुक्ति पर मोहर नहीं लगाई थी। इसके बाद भी केजरीवाल नहीं चेते। एक युवा वकील प्रशांत पटेल ने 2015 में ही वकालत शुरू की और उन्होंने सबसे पहले संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती दी। याचिका राष्ट्रपति को भेजी तो मामले ने तूल पकड़ लिया। अब 'आप' की 66 सीटें हैं और भाजपा की सिर्फ चार और कांग्रेस के खाते में 'शून्य' हैं। यदि 'अयोग्य' 20 विधायकों की सदस्यता भी रद्द हो जाती है तो भी केजरीवाल सरकार के पक्ष में बहुमत होगा। 
आयोग का फैसला दो तरह से आम आदमी पार्टी और मुख्यमंत्री केजरीवाल के लिए भारी आघात साबित हो सकता है। एक तो, एक बार फिर उनकी छवि पर बट्टा लगा है। दूसरा यह कि अगर चुनाव आयोग की सिफारिश को राष्ट्रपति द्वारा मंजूर कर लेने के बाद अब अगर अदालत से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिलती है तो खाली हुई सीटों पर उपचुनाव होंगे। उप चुनावों के नतीजे जो भी आएं, लेकिन यह अनुदान सहज ही लगाया जा सकता है कि बीस के बीस विधायक वापस जीत कर तो आ नहीं सकते। लिहाजा, इससे विपक्ष की ताकत कुछ बढ़ेगी और यह सब आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के लिए असुविधाजनक ही होगा जो प्रचंड बहुमत का मजा लेते आ रहे थे। अब तक तो सदन में विपक्ष का कोई महत्व ही नहीं है। 
विधायकों और सांसदों को लाभ का कोई पद लेने से रोकने का प्रावधान इसलिए किया गया था कि सदन के सदस्य के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वाह वे बिना किसी लोभ और बिना किसी दबाव के कर सकें। मंत्रियों को इस प्रावधान से अलग रखा गया है लेकिन इस प्रावधान की अवहेलना आधा दर्जन से अधिक राज्यों में हो रही है और मामले अदालतों में चल रहे हैं। चुनाव आयोग को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए लेकिन सांसदों और विधायकों के लिए लाभ के पद को अस्वीकार्य मानने के पीछे जो अवधारणा थी, उसकी तौहीन बहुत बार होती रही है।  सत्तारूढ़ दल के विधायक और सांसद संसदीय सचिव जैसे पद पर रहें या नहीं, वे सत्ता के गलियारे में होने के प्रकारांतर से अनेक लाभ उठाते रहते हैं। आम आदमी पार्टी के बार-बार मुश्किल में पडऩे की वजह यह है कि वह औरों से बेहतर तथा ऊंचे नैतिक कद का दावा करते हुए वजूद में आई थी मगर अपने ही मानदंडों पर खरा उतरना तो दूर, उसने लोक-लाज का भी लिहाज नहीं रखा।
बेशक इन तीन सालों की सत्ता के दौरान केजरीवाल सरकार ने निराश किया है और दिल्ली को कोई भी विजन नहीं दे पाई है। फिर भी निचले आय-वर्ग के कुछ तबके ऐसे हैं, जो 'आपÓ के घोर समर्थक हैं, लिहाजा 'आप' को चुनावी रेस से बाहर मानने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए लेकिन केजरीवाल की 'नायक' के तौर पर छवि पर कई दाग लगे हैं। वह और संपूर्ण 'आप' भ्रष्टाचार के खिलाफ एक क्रांतिनुमा आंदोलन की देन हैं, लेकिन अब वह आंदोलन नाकाम साबित हुआ है और केजरीवाल की सत्ता भी आम बुर्जुआ सरकारों और पार्टियों से भिन्न नहीं है। आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करते हुए चुनाव आयोग ने जब राष्ट्रपति के पास रिपोर्ट भेजी, तब आप के नेताओं द्वारा खूब हाय-तौबा मचाई गई। यह सही नहीं था। लाभ के पद पर रहने की वजह से पहले भी विधायकों और सांसदों पर कार्रवाई हुई है। यूपीए के समय 2006 में लाभ के पद का विवाद होने के कारण ही सोनिया गांधी को लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर दोबारा रायबरेली से चुनाव लडऩा पड़ा था। इसी तरह, 2006 में ही जया बच्चन की भी सदस्यता चली गयी थी जबकि श्रीमती बच्चन सुप्रीम कोर्ट भी गयीं थीं। फिर ऐसी परिस्थिति में आप जनता को क्या बताना चाह रही थी? अब तो राष्ट्रपति ने भी आयोग की अनुशंसा पर मुहर लगा दी है। सच यही है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। 
लेखक आशीष वशिष्ठ , 
(युवराज)

WhatsApp पर न्यूज़ Updates पाने के लिए हमारे नंबर 9814266688 को अपने Mobile में Save करके इस नंबर पर Missed Call करें ।


साइना नेहवाल ने पूरा किया खेल मंत्री राठौड़ का चैलेंज, देखें वीडियो

नई दिल्ली (उत्तम हिंदू न्यूज) : फिटनेस को बढ़ावा देने के लिए ...

जीवन के हर रिश्ते को महत्व देती हैं करीना कपूर

मुंबई (उत्तम हिन्दू न्यूज) : अभिनेत्री करीना कपूर खान का कहना...

top