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अंकित सक्सेना का कसूर क्या था?

Publish Date: February 07 2018 08:09:16pm

जब कोई निर्दोष मरता है तो वह केवल निर्दोष होता है और मारने वाला अपराधी। न मरने वाला का धर्म होता न मारने वाले का। दोनों के बीच एक ही रिश्ता और एक ही पहचान होती है अपराधी व पीडि़त की, परंतु देश का सेक्युलर तानाबाना अपने व्यवहार से बता देता है कि मरने वाले का मजहब क्या है और मारने वाला कौन-सी आस्था में विश्वास रखता है। देश का कोई अखलाक या पहलु खान अपराधियों का शिकार होता है तो सेक्युलर कबीला पहुंच जाता है राजनीतिक पर्यटन करने, जेब में नोटों की गड्डियां और मुंह में गालियां भर कर परंतु जब दिल्ली में ही अंकित सक्सेना मारा जाता है तो देश की राजधानी होते हुए भी कोई उनके घर शोक व्यक्त करने तक नहीं पहुंचता। यही है देश का विकृत सेक्युलरवाद, जो अंकित और अखलाक में भेद करता है।

दुर्गा और दरगाह में समान विश्वास रखने वाले अंकित सक्सेना का अपराध केवल इतना ही था कि वह दूसरे धर्म की लड़की से प्यार करता और उससे शादी करना चाहता था। पुलिस की अभी तक की जांच में पता चला है कि अंकित की हत्या सिर्फ इसलिए की गई क्योंकि आरोपी उसकी शादी होने से रोकना चाहते थे। 1 फरवरी, 2018 के दिन अंकित और उसकी महिला मित्र के बीच आखिरी बार बातचीत हुई थी। इस बातचीत में दोनों ने शादी करने का फैसला किया था। अंकित से बात करने के बाद उसकी महिला मित्र रात करीब आठ बजे अपने माता-पिता को घर में बंद कर अंकित के पास जाने के लिए निकली थी। माता-पिता को घर में बंद करने के बाद इस युवती ने उन्हें बताया था कि वह अंकित से शादी करने जा रही है। अंकित और उसकी महिला मित्र ने टैगोर गार्डन मेट्रो स्टेशन पर मिलने की योजना बनाई। अंकित किसी कारण से तय समय पर मेट्रो स्टेशन नहीं पहुंच पाया था, इसी दौरान लड़की के अभिभावकों ने अपने पड़ोसियों की मदद से घर की कुंडी खुलवाई और अंकित के घर चले गए, लेकिन अंकित उन्हें घर के पास के चौराहे पर ही किसी से बात करते हुआ मिल गया। गुस्साए हुए लड़की के घरवालों ने अंकित के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसकी जानकारी किसी जानकार ने अंकित के घरवालों को दी। वह जैसे ही चौराहे पर गए तो मारपीट कर रहे लोगों ने अंकित की मां के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसी दौरान अंकित जैसे ही अपनी मां को बचाने के लिए गया तो अचानक ही लड़की के पिता ने उसके गले पर छुरे से हमला कर दिया। घटना में अंकित की मौके पर ही मौत हो गई।
 
पक्षपात करने वाले मीडिया के एक वर्ग ने इस हत्या को नया नाम दिया है 'हॉरर मर्डर' और सेक्युलर इसे 'ऑनर कीलिंग' यानि शान की खातिर हत्या साबित करने में जुटे हुए हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने स्थानीय मामलों को लेकर कुछ अपराधी तत्वों की दादरी में अखलाक और राजस्थान में पहलू खान की की गई हत्या के लिए बिना कोई जांच, बिना प्रमाण के हिंदू धर्म, आरएसएस व केंद्र की मोदी सरकार को दोषी ठहरा दिया था। अंकित सक्सेना की हत्या के आरोपी परिवार को लेकर एक नई जानकारी सामने आई है। पता चला है कि पहले भी परिवार की एक अन्य लड़की ने 3 साल पहले एक ब्राह्मण लड़के से शादी की थी। परिवार ने इसके बाद उसके अपने रघुबीर नगर वाले घर में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। इससे साफ है कि आरोपी परिवार धर्म के आधार पर इस शादी के खिलाफ था और हत्या का कारण भी अंकित का हिंदू होना ही बना। मामले को ऑनर कीलिंग इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि इस तरह की हत्या उस केस में होती है जहां दूसरा पक्ष अपने से आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर हो। यहां अंकित सक्सेना का परिवार अपनी प्रेमिका के परिवार से किसी रूप में कम होना तो दूर, हर दृष्टि से ऊंचा था। इसलिए इस हत्या को इज्जत के लिए हत्या का नाम देने वाले कृपया अपनी गलती सुधार लें। इस कत्ल को हॉरर मर्डर करार देने वाले बताने का कष्ट करेंगे कि दुनिया में कौन-सी हत्या होती है जो भयानक (हॉरर) न हो। विशुद्ध रूप से धर्म के नाम पर हुई इस हत्या का पूरा मामला भटकाने के लिए बुद्धिजीवी आखिर कितने षड्यंत्र रचेंगे और कितनी नई शब्दावलियों का अविष्कार करेंगे?
 
यही सेक्युलर कुनबा है जो अंकित की हत्या को लेकर समाज को गुमराह कर रहा है तो दूसरी ओर लव जिहाद जैसी गंभीर समस्या पर इसके विपरीत रुख अपनाता रहा है। शादी-विवाह युवक-युवति का निजी मामला है और दोनों का निजी फैसला परंतु जब कोई प्रेम की बजाय किसी और उद्देश्य से दूसरे धर्म की लड़की को फंसा कर अपना संकीर्ण उद्देश्य पूरा करता है तो उसका विरोध होना ही चाहिए। लेकिन हमारे सेक्युलरों को उस षड्ंयत्र में प्यार झलकता है और अंकित की धर्मांध मौत पर बोलना भी उन्हें गंवारा नहीं। दु:ख तब होता है जब इस तरह की निर्दोष हत्याओं को तर्कसंगत ठहराने के लिए लव जिहाद के विरोध को आगे कर दिया जाता है। याद करें अखलाक की मौत पर कितना रोए थे सेक्युलर। अवार्ड वापसी समुदाय ने अपने पुरस्कार गलियों में फेंकने ही शुरू कर दिए थे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता वहां राजनीतिक पर्यटन करके आए परंतु दिल्ली में रहते हुए भी इन नेताओं ने अभी तक इतना समय भी नहीं निकाला कि वह अंकित के परिवार को ढांढस ही बंधा आएं। यही मरने वाला व मारने वाले अलग-अलग होते तो शायद इनका व्यवहार दूसरा होता। किसी समय भारतीय समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने जीवनदायी पेयजल को हथियार बनाया था। उस समय रेलवे स्टेशनों पर 'हिंदू पानी' और 'मुस्लिम पानी' की अलग व्यवस्था की और आज वही विभाजनकारी मानसिकता यह काम सेक्युलरिज्म के नाम पर करती दिखाई दे रही लगती है।

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                        लेखक राकेश सैन
 

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