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फौजियों विरुद्ध एफआईआर

Publish Date: February 10 2018 12:21:07pm

जम्मू-कश्मीर के शोपियां क्षेत्र में सेना द्वारा आत्म रक्षा में की गई गोलीबारी को लेकर जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा मेजर आदित्य के विरुद्ध दर्ज की गई एफआईआर को मेजर आदित्य के पिता ले. कर्नल करमवीर सिंह ने देश के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। ले. कर्नल करमवीर सिंह ने अपनी याचिका में कहा है कि एफआईआर में उनके बेटे का नाम गलत और मनमाने तरीके से दर्ज किया गया है। याचिका के मुताबिक सेना का काफिला केंद्र सरकार के निर्देश पर गया और सेना अपने कर्तव्यों का पालन कर रही थी। सेना की ओर से तब कार्रवाई की गई, जब भीड़ ने पथराव किया गया। कुछ जवानों को पीट-पीट कर मारने की कोशिश की गई। देश विरोधी गतिविधियों को सेना ने रोकने की कोशिश की। वकील ऐश्वर्य भाटी के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया कि मेजर आदित्य का इरादा सेना के जवानों और संपत्तियों को नुकसान होने से बचाना था। हिंसक भीड़ को वहां से हटने का और सेना के काम में दखल न देने का आग्रह किया गया। लेकिन हालात बेकाबू होने पर सेना को भीड़ तितर-बितर करने का आदेश मिला। हालात उस वक्त बेकाबू हो गए जब उग्र भीड़ ने एक सैन्य अधिकारी को पकड़ लिया और उसे जान की मारने की तैयारी करने लगी। इसके बाद सेना को कार्रवाई करनी पड़ी। अपनी याचिका में करमवीर सिंह ने गत वर्ष भीड़ द्वारा डीएसपी मोहम्मद अयूब को मारने की घटना का भी जिक्र किया है। याचिका में कहा गया है कि राज्य में सेना प्रतिकूल माहौल में काम करती है। याचिका के मुताबिक, स्थानीय पुलिस ने सैन्य अफसर के खिलाफ एफआईआर तब दर्ज की है जबकि मेजर आदित्य केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वाह कर रहे थे। जिस अंदाज में एफआईआर दर्ज की गई और राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक अफसरों ने उन्हें सबके सामने पेश किया, उससे राज्य में हालात बहुत ही शत्रुतापूर्ण हो गए हैं। याचिका में सैनिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग है। साथ ही मामले में पर्याप्त मुआवजा राशि भी मांगी गई है। याचिका में उन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है जो आतंकी गतिविधियों में लिप्त होकर सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचा रहे थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के लिए जम्मू-कश्मीर समस्या एक चुनौती से कम नहीं है। तुष्टिकरण की नीति के कारण कश्मीर घाटी के लोगों की समय के साथ भटकन बढ़ती चली जा रही है। जम्मू और लद्दाख का क्षेत्र जितना शांतमय है घाटी उतनी अशांत है जबकि केंद्र सरकार से मिली आर्थिक सहायता का लाभ घाटी को ही मिलता है। जम्मू और लद्दाख के लोगों के साथ जम्मू-कश्मीर सरकार सौतेली मां जैसा व्यवहार ही करती चली आ रही है।

अशांत घाटी में दहशतगर्द और पाकिस्तान समर्थित वर्ग स्थिति को बद से बदतर बनाते चले जा रहा हंै। ऐसे हालात को काबू में रखने के लिए भारत सरकार घाटी में सेना की सहायता लेने को मजबूर हुई। अब सेना पर पथराव का सिलसिला जो पाकिस्तान समर्थित वर्ग कर रहा है उस पर काबू पाने तथा आत्मरक्षा के लिए सेना को गोलीबारी करने को मजबूर होना पड़ा जिसमें पत्थरबाजी करने वालों में से तीन की मौत हुई और उसी को आधार बना मेजर आदित्य पर स्थानीय पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली।

समय की मांग तो यह थी कि फौजियों विरुद्ध दर्ज एफआईआर को रक्षा मंत्रालय ही रद्द करवाता क्योंकि सेना घाटी में उसी के आदेश पर गई है और रक्षा मंत्रालय के आदेश अनुसार ही काम कर रही है और जम्मू-कश्मीर की बेहद हुई कठिन परिस्थितियों में कार्य कर रही है। सेना की पीठ थपथपाने की जगह उस विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना तो उसके मनोबल को गिराना है। दूसरी तरफ प्रदेश की सरकार ने सेना पर पत्थरबाजी करने वाले हजारों लोगों के विरुद्ध दर्ज मुकद्दमें रद्द कर उन्हें राहत दे दी है, उससे उनके हौंसले और बढ़ेंगे।

केंद्र सरकार को प्रदेश सरकार द्वारा अपनाई जा रही दोहरी नीति पर रोक लगानी चाहिए। सेना विरुद्ध दर्ज एफआईआर रद्द की जानी चाहिए ताकि सेना का मनोबल न गिरे। जैसे अन्य वर्गों के मानवाधिकार है उसी तरह सेना के अधिकारियों और जवानों के भी अधिकार हैं और उनकी सुरक्षा करना रक्षा मंत्रालय का कर्तव्य है। भारत सरकार को उपरोक्त मामले को गंभीरता से लेते हुए एफआईआर को रद्द कर मामला तत्काल समाप्त करना चाहिए। देशहित में उठाए इस कदम का भारत का प्रत्येक नागरिक स्वागत ही करेगा।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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