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भाजपा के लिए खतरे की घंटी

Publish Date: February 12 2018 12:34:15pm

पश्चिम बंगाल में दूसरा कार्यकाल पूरा करने जा रही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जलवा बरकरार है, लेकिन राजस्थान की महारानी वसुंधरा राजे अलोकप्रियता की ओर बढ़ गर्इं है। दोनों राज्यों में हुए उपचुनावों में बीजेपी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। खासतौर से उस राजस्थान में जहां कांग्रेस को नया जीवन मिला है और जहां इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा के लिए यह एक बड़ा झटका है। पिछले 30 सालों में राजस्थान में यह पहली बार हुआ है जब उपचुनाव में विपक्षी उम्मीदवार चुनाव जीते हैं और सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा है। राजस्थान की दो लोकसभा सीटों अजमेर व अलवर और विधानसभा सीट मांडलगढ़ में उपचुनाव हुआ था। अजमेर लोकसभा सीट से कांग्रेस के रघु शर्मा, अलवर सीट से कांग्रेस के करण सिंह यादव और मांडलगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस के विवेक धाकड़ ने भारी मतों से जीत हासिल की। लेकिन ऐसा हुआ क्या कि देश के सबसे अधिक कार्यकर्ताओं की फौज और सबसे अधिक संगठनों के समर्थन वाली पार्टी को उप चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा, जबकि एक राज्य तक सीमित सिर्फ अपने बूते चुनाव लडऩे वाली ममता बनर्जी अब भी लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनी हुई हैं।

 जहां तक रोजगार, महंगाई आदि के मुद्दों की बात है, दोनों राज्यों में एक समान है। फिर वे क्या मुद्दे रहे जिनके कारण राजस्थान में बीजेपी हारी। दरअसल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जिस शैली में काम करती हैं, उससे न सिर्फ जनता, बल्कि पार्टी के नेता-कार्यकर्ता भी खुश नहीं हैं। इससे पहले भी वे जब मुख्यमंत्री बनी थीं, पार्टी में कलह देखने को मिली थी। इस बार भी प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी को तो उनकी कार्यशैली से खफा होकर बड़ा मोर्चा तक खोलने को मजबूर होना पड़ा। यही मामले कांग्रेस में जान फूंकने के काम आए। दूसरी ओर भाजपा के जिन विधायकों और सरकार के मंत्रियों को इन चुनावों में जीत की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे इसमें नाकाम रहे। राजस्थान के लिए उपचुनाव एक तरह से सेमीफाइनल ही हैं। इससे जहां कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी की उम्मीद बंधी है तो भाजपा के लिए खतरे की घंटी भी बजी है। नतीजों से साफ है कि जनता को काम करने वाली सरकार ही चाहिए। विकास और सरकार काम कर रही है, यह दिखाने के लिए खुली-खुलाई दुकान का फिर से उद्घाटन करने की राजनीतिक कला जनता को पसंद नहीं आती। उन्माद का शोर चाहे जितना सुनाई दे, लेकिन बेवजह के हंगामे को लोग पसंद नहीं करते। 

लेखक गणेश शंकर भगवती

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