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त्रिपुरा में कांग्रेस की जमीन पर भाजपा की फसल

Publish Date: February 13 2018 01:02:16pm

पूर्वोत्तर के राज्यों में से त्रिपुरा का विशेष महत्त्व है। यहां विगत लगभग चार दशकों से त्रिपुरा में वाममोर्चा की सरकार है। विगत दिनों चुनाव आयोग ने त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव की घोषणा की। त्रिपुरा विधानसभा का चुनाव 18 फरवरी को कराए जाएंगे। मार्च में त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है, इसलिए फरवरी में चुनाव होना जरूरी था। चुनावी घोषणा के साथ ही त्रिपुरा की राजनीति में गरमाहट देखने को मिल रही है। 
अभी त्रिपुरा में माणिक सरकार के नेतृत्व वाली वाममोर्चे की सरकार है। पहले त्रिपुरा में वाम मोर्चा के प्रतिपक्ष में कांग्रेस हुआ करती थी। पीछे 2०13 के विधानसभा चुनाव में भी वाममोर्चा के खिलाफ मुख्य टक्कर कांग्रेस के साथ ही थी। कांग्रेस ने इस चुनाव में 1० सीटें भी जीती लेकिन हाल में कांग्रेस के पास जो जमीन थी वह खिसकती हुई दिख रही है। पीछे जो विधायक कांग्रेस के जीते थे उसमें से ०6 विधायक पहले तृणमूल कांग्रेस में और बाद में भाजपा के साथ चले गए। यही नहीं, त्रिपुरा में बड़ी तेजी से कांग्रेस की लोकप्रियता का ग्राफ कम हो रहा है। वहीं दूसरी ओर भाजपा का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। भाजपा का वोटबैंक ०2 प्रतिशत से बढ़कर ०6 प्रतिशत हो गया है। वहीं कांग्रेस का वोट प्रतिशत 37 से घटकर 15 पर आ गया है। यह आंकड़ा साबित करता है कि प्रदेश में कांग्रेस की जमीन खिसक रही है और भाजपा का ग्राफ बढ़ रहा है।  
पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। लेफ्ट के दुर्ग की सियासी जंग को भारतीय जनता पार्टी हर हाल में जीतने की कवायद में है। इसी मद्देनजर किताब को भी वो एक सियासी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। किताब के जरिए सीएम माणिक सरकार पर भाजपा सीधे हमला कर रही है। भाजपा को पूरी उम्मीद है कि इस किताब वाले हथियार से वह सत्ता तक पहुंच सकती है। 
किताब मूल रूप से मराठी में लिखी गयी है लेकिन उसका हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है। इस किताब पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा है कि इस किताब के जरिए त्रिपुरा की सच्चाई देश के सामने आएगी। उन्होंने कहा कि माणिक सरकार की जो छवि बनाई गई है, वो सिर्फ छलावा है हालांकि इस किताब पर विवाद खड़े करने वाले यह भी कह रहे हैे कि इस किताब की मूल प्रति मराठी भाषा में लिखी गयी है जो खुद इस किताब की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा कर रहा है। 
भाजपा के रणनीतिकार इस किताब को माणिक सरकार की इमेज पर हमला करने के लिए सबसे बड़ा हथियार मान कर चल रहे हैं। उन्हें लगता है कि इस किताब के जरिए लेफ्ट के दुर्ग में सेंधमारी की जा सकती है। 
किताब त्रिपुरा की राज्य व्यवस्था पर लिखी गई है। इसमें माणिक सरकार पर सवाल खड़े किए गए हैं। इसमें कानून व्यवस्था से लेकर चुनाव में बूथ कैप्चरिंग का आरोप लगाए गए हैं। ऐसे में भाजपा इस किताब की बातों का राज्य के चुनाव में जिक्र करेगी हालांकि भाजपा के द्वारा जिन स्थानीय दलों से गठबंधन किया गया है, उन पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सत्तारूढ़ साम्यवादियों ने भाजपा को पृथकतावादियों के साथ समझौता करने का आरोप लगाया है। 
गौरतलब है कि 1978 के बाद से वाम मोर्चा सिर्फ एक बार 1988-93 के दौरान राज्य के सत्ता से दूर रहा था। बाकी सभी विधानसभा चुनाव में लेफ्ट का कब्जा रहा है। 1998  से लगातार त्रिपुरा में ०3 बार से सीपीएम के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के सामने इस बार बीजेपी एक बड़ी चुनौती बनी है। 
राज्य में कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है। वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने पूर्वोत्तर के क्षेत्रों पर फोकस किया है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में सक्रिय है।
बता दें कि त्रिपुरा के 2०13 विधानसभा चुनाव में राज्य की कुल 6० सीटों में से वाममोर्चा ने 5० सीटें जीती थी जिनमें से माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 49 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को ०1 सीट मिली थी। इस चुनाव में कांग्रेस को 1० सीटों के साथ संतोष करना पड़ा था लेकिन तीन साल के बाद 2०16 में कांग्रेस के ०6 विधायक ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में चले गए।  ये विधायक वहां भी नहीं टिके और वे सभी विधायक तृणमूल छोड़कर अगस्त 2०17 में भाजपा में चले गए।
त्रिपुरा में ०3 बार के सीपीएम मुख्यमंत्री माणिक सरकार को चुनौती मिलना मुश्किल ही लगता है। भाजपा ने 2०13 के चुनावों के ०2 फीसदी वोट शेयर को बढ़ाकर 2०14 में ०6 फीसदी कर लिया था। इसी दौरान कांग्रेस 37 से घटकर 15 फीसदी पर पहुंच गई। त्रिपुरा विधानसभा की 6० सीटों में से 2० सीटें अनुसूचित जनजाति और 1० सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं।
1978 के बाद वाम मोर्चा ने सबसे बेहतर जीत हासिल की थी। राज्य की 6० सीटों में से 56 पर जीत हासिल की थी। राज्य में 1978 जैसा करिश्माई परिणाम लेफ्ट दोबारा नहीं दोहरा सकी है। माणिक सरकार ईमानदारी के बल पर 2०13 के विधानसभा चुनाव में उतरे और उन्होंने 2००8 की तुलना में एक सीट ज्यादा दर्ज करते हुए 5० सीटों का आंकड़ा छुआ 
था।
इधर भारतीय जनता पार्टी ने कई स्थानीय दलों के साथ समझौता किया है। इस समझौते को लेकर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि भाजपा खुद राष्ट्रवाद के खिलाफ जाकर  पृथकतावादी शक्तियों के साथ समझौता कर रही है। पूर्वोत्तर के राज्यों में आतंकवाद की ताकत किसी से छुपी नहीं है। ऐसी परिस्थिति में यदि सीपीएम के आरोप में दम है तो इसके बड़े गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसकी गंभीरता को समझना चाहिए।     
गौतम चौधरी, लेखक (अदिति)

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