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जनप्रतिनिधि करें आत्मावलोकन

Publish Date: March 13 2018 03:13:20pm

उपराष्ट्रपति एम. वैंकेंया नायडू ने संसद के केंद्रीय कक्ष में विधायकों के सम्मेलन के समापन समारोह में बोलते हुए कहा कि न केवल संसद में बल्कि विधानसभाओं और विधानपरिषदों में भी हंगामे एवं शोरशराबे होते रहते हैं जिससे सदन में काम काज बाधित होता है। राज्यों में तो माइक तोडऩे, कागज फेंकने आदि की घटनाएं होती रहती हैं। पिछले दिनों राज्यसभा में पूरे एक सप्ताह काम काज ही नहीं हुआ। इसके लिए कौन दोषी है और इससे किसका नुकसान हुआ। इससे न सत्तापक्ष और न ही विपक्ष का नुकसान हुआ बल्कि पूरे देश का नुकसान हुआ। इसलिए सदन के भीतर हंगामा नहीं होना चाहिए। आपको नारेबाजी करनी है तो सदन के बाहर करें, आपको प्लेकार्ड दिखाना है तो बाहर दिखाएं। सदन के भीतर काम काज को बाधित न करें। उन्होंने कहा कि विपक्ष कहता है कि सदन चलाना सत्तापक्ष की जिम्मेदारी है और सत्तापक्ष विपक्ष पर आरोप लगाता है। लेकिन सदन चलाने की जिम्मेदारी सबकी है।

उपराष्ट्रपति ने विधायकों को संबोधित करते हुए जनप्रतिनिधियों का कमजोर पक्ष उजागर कर उन्हें अपनी जिम्मेवारी को ईमानदारी से निभाने के लिए ही झंझोड़ा है। सत्य यही है कि आज नगर निगम, विधानपालिका और संसद तक का बहुमूल्य समय शोर-शराबे में अधिक बर्बाद हो रहा है, जबकि जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य होता है जन से जुड़ी समस्याओं का समाधान ढूंढना और जन के विकास को सम्मुख रख नई योजनाओं को बनाना। आज जनप्रतिनिधि दूसरे पर आरोप लगाने या पार्टी हित को ही प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं। एक दूसरे को कटघरे में खड़ा करने वाले जनहित की योजनाओं पर तो एकजुट कम ही होते हैं। हां, जब स्वयं के वेतन व भत्तों को बढ़ाने की बात हो तो तब अपने मतभेदों को भूलकर एक स्वर में प्रस्ताव को पारित कर देते हैं। जन की भलाई के नाम पर स्वयं मलाई खाने की उनकी कमजोरी आज जगजाहिर हो चुकी है।

समय की मांग है कि उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू की आवाज को सुन जनप्रतिनिधि आत्मचिंतन करें। जनप्रतिनिधियों पर बढ़ते आपराधिक मामले भी उनकी छवि को खराब कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर केंद्र सरकार द्वारा दिए शपथ पत्र में कहा गया है कि 2014 से 2017 तक 1700 सांसदों व विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। इन जनप्रतिनिधियों पर 3186 मुकदमें दर्ज हुए जिनमें 3085 अभी शेष हैं। जनप्रतिनिधियों विरुद्ध हुए मुकदमों में उत्तर प्रदेश 248 मुकदमों के साथ सब से ऊपर है। इसके बाद 178 तमिलनाडू, 144 बिहार और 139 के साथ पं. बंगाल है।

जनप्रतिनिधियों विरुद्ध देश के करीब प्रत्येक प्रदेश में आपराधिक मामले दर्ज हैं। उपरोक्त तथ्य भी दर्शाते हैं कि जनप्रतिनिधियों की साख व छवि दोनों कमजोरहोते जा रहे हैं। ऐसे में उपराष्ट्रपति द्वारा कही बात का महत्व और बढ़ जाता है। जन साधारण का भी कर्तव्य है कि वह भी मतदान करते समय इस बात का ध्यान रखें कि वह किसी दागी उम्मीदवार को तो अपने प्रतिनिधि के रूप में नहीं चुन रहे।

न्यायपालिका को भी चाहिए कि जनप्रतिनिधियों पर हुए मुकदमों का फैसला एक समय सीमा के बीच हो जाएं ताकि लोगों के सामने सत्य आ जाए। न्यायपालिका में हो रही देरी का लाभ तो जनप्रतिनिधियों को मिल रहा है और जन न्याय से वंचित रह जाता है। उपरोक्त तथ्यों को सम्मुख रख जनप्रतिनिधियों को स्वयं अपनी आत्मा की आवाज सुनकर जनहित में निर्णय लेने का ही संकल्प लेना चाहिए। अगर समय रहते जनप्रतिनिधियों ने आत्मचिंतन कर अपनी कार्यशैली में परिवर्तन न किया तो उन पर जन का विश्वास उठ जाएगा, जो देश व जन दोनों के साथ उनके लिए भी घातक ही साबित होगा।    

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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