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राजनीति

मातृभाषा और संघ

Publish Date: March 17 2018 12:46:07pm

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पंजाब प्रांत के संघचालक बृजभूषण बेदी ने गत दिनों जालंधर में संघ कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि 'भाषा संस्कृति का मूल आधार है। अगर किसी वर्ग संस्कृति को खत्म करना हो तो उसकी भाषा को लुप्त करने की कोशिश की जाती है। आज देश की प्रादेशिक भाषाओं के साथ ऐसा ही हो रहा है, इसे रोकना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इसी विषय पर आर.एस.एस. की तरफ से 9 से 11 मार्च तक अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के तत्वाधान में नागपुर में सभा का आयोजन हुआ था, जिसमें मातृभाषा की रक्षा को लेकर चिंतन किया गया। उन्होंने कहा कि प्राइमरी एजेकुशन से ही मातृ भाषा से दूर होना गंभीर विषय है। यह वह समय होता है जब बच्चे और परिवार के बीच संवाद होता है। मातृभाषा में हुआ संवाद परिवार मिलन को बढ़ाता है। मगर अपनी मातृभाषा के बदले दूसरी भाषाओं का ज्ञान घातक है इसके लिए संघ की तरफ से जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।'

गौरतलब है कि संघ के राष्ट्रीय मुख्यालय नागपुर में हुई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने मत पारित कर कहा था कि 'भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है। देश में प्रचलित विविध भाषाएं व बोलियां हमारी संस्कृति, उदात्त पंरपराओं, उत्कृष्ट ज्ञान एवं विपुल साहित्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के साथ ही वैचारिक नवसृजन हेतु भी परम आवश्यक है। विविध भाषाओं में उपलब्ध लिखित साहित्य की अपेक्षा कई गुना अधिक ज्ञान गीतों, लोकोत्तियों तथा लोक कथाओं आदि की मौखिक परंपरा के रूप में होता है। आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन तथा विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गंभीर चुनौती बन कर उभर रहा है। आज अनेक भाषाएं एवं बोलियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई अन्य का अस्तित्व संकट में है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का यह मानना है कि देश की विविध भाषाओं तथा बोलियों के संरक्षण और संवद्र्धन के लिए सरकारों, अन्य नीति निर्धारकों और स्वैच्छिक संगठनों सहित समस्त समाज को सभी सम्भव प्रयास करने चाहिए। इस हेतु निम्नांकित प्रयास विशेष रूप से अनुकरणीय है:-  देश भर में प्राथमिक शिक्षण मातृभाषा या अन्य किसी भारतीय भाषा में ही होना चाहिए। इस हेतु अभिभावक अपना मानस बनायें तथा सरकारें इस दिशा में उचित नीतियों का निर्माण कर आवश्यक प्रावधान करें। द्य तकनीकी और आयुर्विज्ञान सहित उच्च शिक्षा के स्तर पर सभी संकायों में शिक्षण, पाठ्य सामग्री तथा परीक्षा का विकल्प भारतीय भाषाओं में भी सुलभ कराया जाना आवश्यक है। द्य राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (नीट) एवं संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाएं भारतीय भाषाओं में भी लेनी प्रारम्भ की गयी हैं, यह पहल स्वागत योग्य है। इसके साथ ही अन्य प्रदेश एवं प्रतियोगी परीक्षाएं, जो अभी भारतीय भाषाओं में आयोजित नहीं की जा रही हैं, उनमें भी यह विकल्प सुलभ कराया जाना चाहिए। द्य सभी शासकीय तथा न्यायिक कार्यों में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही शासकीय व निजी क्षेत्रों में नियुक्तियों, पदोन्नतियों तथा सभी प्रकार के कामकाज में अंग्रेजी भाषा की प्राथमिकता न रखते हुए भारतीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। द्य स्वयंसेवकों सहित समस्त समाज को अपने पारिवारिक जीवन में वार्तालाप तथा दैनन्दिन व्यवहार में मातृभाषा को प्राथमिकता देनी चाहिए। इन भाषाओं तथा बोलियों के साहित्य-संग्रह व पठन-पाठन की परम्परा का विकास होना चाहिए। साथ ही इनके नाटकों, संगीत, लोक कलाओं आदि को भी प्रोत्साहन देना चाहिए। द्य पारम्परकि रूप से भारत में भाषाएं समाज को जोडऩे का साधन रही हैं। अत: सभी को अपनी मातृभाषा का स्वाभिमान रखते हुए अन्य सभी भाषाओं के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए।  केंद्र व राज्य सरकारों को सभी भारतीय भाषाओं, बोलियों तथा लिपियों के संरक्षण और संवद्र्धन हेतु प्रभावी प्रयास करने चाहिए। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बहुविध ज्ञान को अर्जित करने हेतु विश्व की विभिन्न भाषाओं को सीखने की समर्थक है। लेकिन, प्रतिनिधि सभा भारत जैसे बहुभाषी देश में हमारी संस्कृति की संवाहक सभी भाषाओं के संरक्षण एवं संवद्र्धन को परम आवश्यक मानती है। प्रतिनिधि सभा सरकारों, स्वैच्छिक संगठनों, जनसंचार, माध्यमों, पंथ-संप्रदायों के संगठनों, शिक्षण संस्थाओं तथा प्रबुद्धवर्ग सहित संपूर्ण समाज से आवाहन करती है कि हमारे दैनन्दिन जीवन में भारतीय भाषाओं के उपयोग एवं उनके व्याकरण, शब्द चयन और लिपि में परिशुद्धता सुनिश्चित करते हुए उनके संवद्र्धन का हर सम्भव प्रयास करें।'

भाषा के आधार पर जब 1950 के दशक में देश में राज्यों का पुनर्गठन हुआ था तब संघ ने सभी पंजाबियों को अपनी मातृभाषा पंजाबी लिखने को कहा था। संघ एक बार फिर मातृभाषा तथा देश के विभिन्न प्रदेशों की भाषाओं के महत्व को समझते हुए समाज व सरकार को उनके संरक्षण और संवर्धन की ओर ध्यान दिला अपना कर्तव्य पूर्ण कर रहा है, जिसके लिए संघ बधाई का पात्र है।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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