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मुखौटा फर्में और बैंक

Publish Date: March 20 2018 01:32:13pm

मुखौटा कंपनियों की जांच पर सरकार की ओर से गठित कार्यबल ने सिफारिश की है कि प्रवर्तन एजेंसियां और नियामक उन भारतीय कंपनियों की चिह्नित कर जांच करें जिनकी सहायक इकाइयां कर के लिहाज से मुफीद देशों जैसे डेलवेर (अमेरिका), लक्जम्बर्ग, पनामा, मॉरीशस, आयरलैंड आदि में है। जुलाई 2017 में गठित कार्यबल से सरकार ने कहा था कि नीरव मोदी, मेहुल चोकसी मामले में जांच एजेंसियों द्वारा 2000 मुखौटा कंपिनयों का पता लगाने के बारे में भी जांच करें। इन मुखौटा कंपिनयों का इस्तेमाल पैसों के हेरफेर में किया गया है। कार्यबल ने संभावित मुखौटा कंपनियों की पहचान के लिए 14 मानदंड सूचीबद्ध किए हैं और उनके खिलाफ समुचित जांच करने का सुझाव दिया है। कार्यबल की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय कंपनियों की कर पनाहगार देशों में सहायक इकाइयां होना भारत में नियामकीय लिहाज से चिंताजनक है। कार्यबल ने जांच एजेंसियों को ऐसी फर्मों के गुण-दोष की सूची सौंपी है। इस समिति के मुताबिक मुखौटा फर्मों के पास बेहिसाब निवेश, कर्ज, अग्रिम या नकदी है। जांच एजेंसियों को ऐसी कंपनियों की जांच करनी चाहिए जिनके पास उनके सालाना कारोबार से पांच गुना अधिक अधिशेष हो या स्थिर संपत्तियां सालाना कारोबार के पांच गुना या उससे अधिक हो। अगर कंपनियों की नकदी, निवेश, कर्ज या कुल देनदारी उनके सालाना कारोबार के पांच गुना से अधिक हो, तो जांच एजेंसियों को खतरे की चेतावनी देनी चाहिए। इसके अलावा, सालाना रिटर्न के आधार पर अगर कंपनी के 75 फीसदी शेयर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के पास हो या उसने दो साल तक सालाना रिटर्न दाखिल नहीं किया हो तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। अगर एक ही कार्यालय के पते पर 10 से ज्यादा कंपनियां पंजीकृत हों और उनमें से कम से कम आधी कंपनियों के निदेशक समान हों तो उसकी जांच की जानी चाहिए। इसके साथ ही अगर कंपनी ने पिछले दो साल में अपने आधे निदेशकों को बदल दिया हो तब भी उसकी जांच होनी चाहिए। मुखौटा कंपनियों पर नकेल कसने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश के बाद इस कार्यबल का गठन किया गया था। इसमें राजस्व एवं कंपनी मामलों के मंत्रालय के सचिव इसके सह-चेयरमैन के साथ विभिन्न नियामकीय मंत्रालयों और प्रवर्तन एजेंसियों के सदस्य शामिल हैं। कार्यबल ने इसे भी रेखांकित किया कि कंपनियों ने नोटबंदी के बाद बेहिसाब नकदी को ठिकाने लगाने के लिए मुखौटा कंपनियों का दुरुपयोग किया। समिति ने कंपनी मामलों के मंत्रालय को ऐसी कंपनियों के वित्तीय खातों की विशेष तौर पर पड़ताल करने की सलाह दी है। सूत्रों ने कहा कि कार्यबल ने अपनी रिपोर्ट में मुखौटा कंपनियों से संबंधित प्रत्येक पहलुओं का समग्रता से परिभाषित किया है, जिसे इस माह के अंत तक सरकार को सौंपी जाएगी।

दूसरी ओर बैंकों ने भी बढ़ते बैंक घोटालों को रोकने हेतु पिछले दिनों हुई बैठक में कुछ प्रस्ताव पारित किए हैं। जिन्हें संबंधित बैंकों के निर्देशक मंडल ने मंजूरी देनी है। पारित प्रस्तावों अनुसार 250 करोड़ रुपए से अधिक के कर्ज वाली कंपनियों को नया कर्ज बैंकों के कंसोर्टियम के माध्यम से मिलेगा और मौजूदा ऋण भी कंसोर्टियम के तहत चला जाएगा। कंपनियों का आमतौर पर विभिन्न बैंकों के साथ अलग-अलग उधारी सीमा होती है। हालांकि उधारी सीमा समान रहेगी। लेकिन ऋणदाताओं के कंसोर्टियम होने से उसकी निगरानी और नियंत्रण सही तरीके से किया जा सकेगा। गौरतलब है कि कई बैंकों से कर्ज की सुविधा होने से बैंकों को ऋणदाता और कर्जदार के बीच होने वाले लेनदेन के बारे में जानकारी नहीं होती है। लेकिन कंसोर्टियम से इसकी निगरानी बेहतर होगी। सभी ऋण को कंसोर्टियम के तहत लाया जाएगा। वाजिब कर्जदार को इससे कोई समस्या नहीं होगी। कंसोर्टियम के तहत कर्ज देने के लिए समान दस्तावेज, समान जमानत और ज्यादा वित्तीय नियंत्रण होगा। मानक नियमपत्रों के साथ एक साझा ऋण दस्तावेज होगा जिसका पालन कंसोर्टियम के तहत केवल एक ही बैंक को नकद प्रबंधन सुविधा की जिम्मेदारी दी जाएगी। इससे पहले इसी वर्ष सरकार ने कहा था कि बैंकों के बीच बेहतर तालमेल के लिए कंसोर्टियम के तहत बैंकों की संख्या में उल्लेखनीय कमी की जाएगी। इसे 20-22 से घटाकर अधिकतम 10 किया जाएगा। सार्वजनिक बैंकों ने कंपनियों के लिए ऋण देने की प्रक्रिया को और सख्त बनाने का फैसला किया है। इसके तहत प्रवर्तकों को अग्रिम इक्विटी देने को कहा जाएगा और कंपनियों की घाटे को सहने की क्षमता का सत्यापन करके इक्विटी की गुणवत्ता का आकलन किया जाएगा। साथ ही बैंक निर्माण अवधि में ब्याज को वित्तपोषित करने से भी परहेज करेंगे। रिजर्व बैंक ने बैंकों को ऐसी परियोजनाओं को फंड देने की अनुमति दे रखी है जिनकी लागत बढ़ गई है। वे ऐसी कर्ज को पुनर्गठित परिसम्पत्ति माने बिना ऐसा कर सकते हैं।
पहले नोटबंदी फिर जीएसटी और उसके बाद बैंकों में हुए अरबों रुपए के घोटालों को लेकर भारत का जन साधारण आर्थिक चक्रव्यूह में फंसा दिखाई दे रहा है। छोटे और मध्यम श्रेणी के उद्योगों की समस्याओं का समाधान फर्जी कंपनियों और घोटालेबाजों पर काबू किए बिना नहीं हो सकता। अपने उपरोक्त लक्ष्य की पूर्ति हेतु सरकार प्रत्येक स्तर पर कदम तो उठा रही है लेकिन धरातल पर अभी उठाए कदमों का लाभ दिखाई नहीं दे रहा। फर्जी फर्मों विरुद्ध अभी कोई ठोस कार्रवाई के परिणाम जन के सामने नहीं आए। घोटालेबाज भगौड़े हो गए हैं। समय की मांग है कि उठाए गए कदमों का लाभ धरातल स्तर पर नजर आये, जब तक ऐसा नहीं होता तब तक सरकार पर दबाव बना ही रहेगा।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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