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राजनीति

इराक त्रासदी

Publish Date: March 23 2018 12:13:58pm

इराक के शहर मोसुल में आईएसआईएस आतंकियों द्वारा मारे गए 39 भारतीयों में चार हिमाचल प्रदेश के थे। उन चारों को प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 4-4 लाख रुपए की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने जो कदम उठाया है उसे उचित दिशा में उठा कदम कहा जाएगा। अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को जिनके नागरिक आतंकियों हाथों मारे गए उनको भी पीडि़त परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता देने की घोषणा करनी चाहिए।

इराक में मारे गए लोग अपने पेट व परिवार के लिए वहां गये थे। प्रदेश की सरकार व देश की सरकार को प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता तत्काल देनी चाहिए क्योंकि परिवार जिनसे आशा लगाए बैठे थे वह आज इस दुनिया में नहीं हैं। इन परिवारों ने अपनी जमीन-जायदाद बेचकर या उधार लेकर ही अपने जिगर के टुकड़ों को खतरे को भांपते हुए भी वहां भेजा था कि वहां जाकर मेहनत कर यह लोग अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकेंगे लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। परिवार वालों की जमीन जायदाद भी गई और वह कर्ज में भी डूब गए और जिन पर धन कमाने की उम्मीद थी उन्हें आतंकियों ने मार डाला।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इराक के शहर मोसुल में तीन वर्ष पहले लापता 39 भारतीयों की मृत्यु होने का समाचार जब दिया उसी क्षण से विपक्षी दल इस दर्दभरी घटना का भी राजनीतिकरण करने लगे और सरकार पर आरोप लगाने लगे हैं कि उसने सभी को अंधेरे में रखा। विरोध के लिए विरोध करने वाले क्या यह नहीं जानते कि बिना किसी सबूत के सरकार लापता लोगों को मृत घोषित नहीं कर सकती। सरकार ने इराक सरकार पर दबाव बनाया, इराक सरकार के कब्जे में जब मोसुल का क्षेत्र वापस आया तो उसने छानबीन कर भारतीयों के शवों को ढूंढा और डीएनए कराकर भारत को सूचित किया।

2014 में आतंकियों के चुंगल से बचकर आये पंजाब के हरजीत मसीह ने अवश्य आते ही कह दिया था कि उसके सामने ही 39 भारतीयों को गोलियों से उड़ा दिया गया था। लेकिन जिम्मेवार सरकार उपरोक्त ब्यान को आधार बनाकर लापता व्यक्तियों को मृत घोषित नहीं कर सकती थी। अभी डीएनए के मिलान के बाद भी एक व्यक्ति ने दावा किया है कि वह जिन्दा है, जबकि उसका नाम सरकार द्वारा जारी मृतकों की सूची में है।

उपरोक्त एक घटना से ही स्पष्ट हो जाता है कि बिना किसी सबूत के सरकार मृतकों को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा कर ही नहीं सकती थी। इराक सरकार द्वारा किए डीएनए के मिलान के बाद ही भारत सरकार ने लापता व्यक्तियों को मृत घोषित किया और यह ही उचित ढंग है।

जिन परिवारों के सदस्य आईएसआईएस आतंकियों के हाथों मारे गए हैं उनका दु:ख समझा तो जा सकता है लेकिन शब्दों में उसका ब्यां करना मुश्किल है। पक्ष और विपक्ष को चाहिए तो यह था कि प्रभावित परिवारों से सम्पर्क कर उनकी नैतिक व आर्थिक स्तर पर सहायता कर उनका दु:ख बांटते और आईएसआईएस संगठन की विश्व स्तर पर निंदा करते तथा उनके अमानवीय चेहरे को बेपर्दा करते। आतंकियों की निंदा करने की बजाए विपक्ष सरकार की निंदा करने लगा और सरकार अपना बचाव करने लगी। पीडि़त परिवारों की भावनाओं का सहारा लेकर राजनीति करना किसी प्रकार भी उचित करार नहीं दिया जा सकता। ऐसी हरकत तो जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी ही है। विपक्ष को अपनी जिम्मेवारी समझते हुए शवों पर राजनीति करने का खेल बंद करना चाहिए।

उपरोक्त मामले में अगर कटघरे में किसी को खड़ा करना और सजा ही देनी है तो वह आईएसआईएस ही है। अपने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर आईएसआईएस का एकजुट होकर विरोध करना ही समय की मांग है और प्रभावित परिवारों को हर स्तर पर सहायता करने की आवश्यकता है। जो राह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने दिखाई है उसी राह पर चलकर ही प्रभावित परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाई जा सकती है।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू। 

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