Monday, July 16,2018     ई पेपर
ब्रेकिंग न्यूज़
राजनीति

आईएसआईएस की हैवानियत के शिकार बेकसूर हिन्दुस्तानी

Publish Date: April 07 2018 01:53:27pm

इस खबर ने हर भारतीय को भीतर तक झकझोर कर रख दिया है कि रोजी-रोटी की तलाश में इराक गये 39 भारतीय मारे जा चुके हैं। तीन साल से सरकार उनके जीवित होने का जिस तरह भरोसा दिला रही थी, अब उनके मरने के बयान पर परिजन और देशवासी सहज विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। 
विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने पिछले दिनों राज्यसभा में दिये बयान में बताया गया कि गहरे गड्ढे में दफन 38 भारतीय श्रमिकों के डीएनए परिवार के लोगों से मैच कर गये हैं। एक अभागे के माता-पिता न होने के कारण डीएनए नहीं मिला। पंजाब के लिए यह बड़ा सदमा है क्योंकि मारे गये 31 लोग पंजाब के थे और चार लोग हिमाचल के। शेष दो-दो बिहार व पश्चिम बंगाल के थे। सुषमा स्वराज के बयान के बाद से पूरे देश में गम की लहर दौड़ गई। वो अलग बात है कि विपक्ष इस अति संवदेनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आया। 
खाड़ी देशों के सफर में रोजगार की मंजिलों के खतरे सदा रहे हैं। हद तो यह कि ये भारतीय पिछले कुछ सालों से गुमशुदा होने की गुत्थी में तड़पते रहे और इधर देश के भीतर सरकार के पास खबर भी नहीं कि इस त्रसदी का यथार्थ क्या रहा। पिछले कई सालों से विदेश से आती मौत की वीभत्स खबरों ने हमें सतर्क किया लेकिन ये सबक व्यवस्थागत खामियों को नहीं भर पाए। यह दीगर है कि विदेशों में रोजगार की संभावनाओं का दोहन पूरे देश की क्षमता में अनहोनी घटना नहीं लेकिन पूरी कवायद को निरीक्षण-परीक्षण की कसौटी से गुजरना होगा। दर्द के अंतहीन सिलसिलों में रोजगार अगर इस तरह अभिशाप बनेगा, तो युवाओं की क्षमता व प्रतिभा को नए सिरे से समझना होगा। 
यह घटना कई सवालों को भी जन्म देती है। एक तो एजेंटों के माध्यम से सुनहरे भविष्य के सपनों को लेकर विदेश जाने वालों का ठीक-ठीक अनुमान लगाना सरकार के लिये कठिन होता है। यदि ये विधिवत तरीके से विदेश जायें तो सरकार ऐसे खतरनाक इलाकों में जाने की मनाही तो कर सकती है। मामले को लेकर राजनीतिक बयान भी आ रहे हैं मगर एक सत्य यह है कि हमारे सत्ताधीश देश में इन युवाओं को रोजगार देने में नाकाम रहे जिसके चलते उन्हें जान जोखिम में डालकर इराक जाने को बाध्य होना पड़ा। 
सवाल यह भी कि जो हरजीत मसीह, अली बनकर भाग निकला था, उसने तभी इन सबके मारे जाने की पुष्टि कर दी थी, उसकी बातों पर सरकार ने विश्वास क्यों नहीं किया? मोसूल को आईएसआईएस से आजाद हुए एक साल हो चुका है तो पुष्टि होने में इतनी देरी क्यों हुई? बताया जाता है कि इनका अपहरण 2०14 में हुआ था तो फिर विदेशमंत्री किस आधार पर इनके जीवित होने का दावा कर रही थीं? क्या यह हमारे खुफिया तंत्र की नाकामी है? 
जिन लोगों के परिजनों को आस बंधाई गई थी कि 39 भारतीय सुरक्षित हैं, उनको अचानक मरने की खबर देना एक वज्रपात जैसा है। आखिर सूचना देने में इतना विलंब क्यों? घटना के समय व नरसंहार कैसे हुआ, के बारे में सरकार ने प्रामाणिक जानकारी क्यों नहीं दी? सरकार जिन भरोसेमंद सूत्रों का दावा कर रही थी, उन सूत्रों का क्या हुआ? सरकार कह रही है कि ऐसा आईएसआईएस व इराक सरकार द्वारा पुष्टि न करने की वजह से हुआ।
आईएसआईएस आतंकी संगठन और सरगना बगदादी की इस दरिंदगी की पुष्टि अब हुई है, लिहाजा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद को अभी बताया है। इसे संसद और देश को गुमराह और भ्रमित करने की कोशिश नहीं कहा जा सकता। यह कोई राजनीतिक मुद्दा भी नहीं है। हमारे हिंदुस्तानियों का कत्ल किया गया है। आईएस ने पहली बार इतने भारतीयों पर हमला करके उन्हें मारा है। आईएस ने भारत पर भी अपने आतंकवाद की 'हत्यारी छाया' छोड़ी है। एक तरफ  मातम, पीड़ा, आंसू, गम और आक्रोश का माहौल है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को यह विमर्श करना चाहिए कि हम आईएस के कातिलों, राक्षसों का वजूद कैसे खत्म कर सकते हैं। क्या तेजस, सुखोई, राफेल विमानों के जरिए आईएस पर हमला किया जाए और राक्षसों को 'मिट्टी' बना दिया जाए लेकिन इस मुद्दे पर भी संसद में सियासत खेली गई। 
मान सकते हैं कि विदेश मंत्री से गलती हुई। वह संसद और देश को झूठा दिलासा देती रहीं और भ्रम में रखा। चलो, उसकी भी सजा तय कर लीजिए लेकिन सवाल यह है कि यदि विदेश मंत्री पहले ही लापता भारतीयों को 'मृत' घोषित कर देतीं और हरजीत की तरह कोई जिंदा लौट आता, तो उसकी सजा क्या होती? कौन भुगतता वह सजा..? कानून का उल्लंघन होता और संसद की अवमानना होती। मंत्री को इस्तीफा देना पड़ता। सरकार की छीछालेदार होती और दुनिया में भारत की थू-थू होती। 
दरअसल कानून में भी स्पष्ट प्रावधान है कि एक लापता व्यक्ति को 7 साल तक 'मृत' घोषित नहीं किया जा सकता, यानी लौटने की उम्मीद रहती है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उन 39 भारतीयों के परिजनों को यही ढाढस बंधाती रही होंगी लेकिन मौजूदा सवाल यह है कि भारत सरकार ने जो अनथक प्रयास किए, उन्हें किस श्रेणी में रखेंगे? विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह कई बार इराक गए। चूंकि वह पुराने फौजी जनरल हैं, लिहाजा उन भारतीयों की तलाश में लगातार कोशिशें कीं। आखिर राडार से देखा गया कि मोसुल की पहाडिय़ों पर कुछ कड़े गिरे हुए थे। उसी के जरिए भारतीयों की प्राथमिक पहचान हुई और पहाड़ी के नीचे लंबे बालों वाली लाशें मिलीं। वहां करीब 10,000 लाशों की कब्रगाह है। उनमें से 39 भारतीयों की पहचान की गई। कड़ों के अलावा, आईकार्ड से भी पहचान की गई और डीएनए टेस्ट भी किए गए। जब इन प्रक्रियाओं से गुजरते हुए भारतीयों की हत्या की पुष्टि हो गई तो विदेश मंत्री ने राज्यसभा को सूचना दी। सवाल यह भी है कि राज्यसभा में कांग्रेस ने मंत्री का बयान होने दिया। पूरा ब्यौरा संसद के रिकार्ड में दर्ज हो गया लेकिन लोकसभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस सांसदों ने हंगामा क्यों किया? स्पीकर सुमित्र महाजन को बार-बार यह क्यों कहना पड़ा कि इतने संवेदनहीन मत बनिए। ऐसी राजनीति मत करिए। क्या यह मुद्दा भी हंगामे का था?  मोसुल में आईएस के आतंकियों ने कुल 91 लोगों को अगवा किया था। उनमें 51 बांग्लादेशी थे। उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि वे मुसलमान थे। एक भारतीय हरजीत भी तभी बच पाया, जब उसने खुद का नाम 'अली' बताया, यानी आतंकवाद भी मजहब के आधार पर। हिंदू भारतीयों को मार दिया गया। भारत सरकार ने यमन, सूडान, पाकिस्तान में भी अभियान चलाकर न केवल भारतीयों को मुक्त कराया है बल्कि कई अन्य देशों के नागरिक भी छुड़ाए हैं। इस बार ऐसा नहीं हो सका क्योंकि आईएस ने बंधक बनाया था। समस्या यहीं तक ही सीमित नहीं है। भारत में भी आईएस के दल्ले, गिरोह और हमदर्द सक्रिय हैं। केरल से कश्मीर तक फैले इस 'बगदादी ब्रिगेड' का समूल नाश करना बहुत जरूरी है। नरमी या मानवता के मूल्यों को कुछ वक्त के लिए खूंटी पर टांग देना चाहिए।  सरकार ऐसी व्यवस्था करे कि रोजगार और कमाई के लिए विदेश का रूख करने वाले युवा अपने ही देश में सुख चैन की जिंदगी बसर कर सकें। सरकार को विदेश रोजी रोटी की तलाश में गये निवासियों की सुरक्षा के लिये हरसंभव प्रयास करना चाहिए क्योंकि देशवासी ही देश का मान-सम्मान होते हैं। 

संतोष कुमार भार्गव, लेखक (अदिति)
 

WhatsApp पर न्यूज़ Updates पाने के लिए हमारे नंबर 9814266688 को अपने Mobile में Save करके इस नंबर पर Missed Call करें ।


फाइनल मैच में दखलअंदाजी की पुसी रायट ने ली जिम्मेदारी

मॉस्को (उत्तम हिन्दू न्यूज): फीफा विश्व कप के फाइनल मैच के दौरान मैदान में घुस आए कुछ लोगो...

सरकार व पुलिस की आलोचना के आरोप में तमिल अभिनेत्री गिरफ्तार

चेन्नई (उत्तम हिन्दू न्यूज) : तूतीकोरिन हिंसा को लेकर तमिलनाड...

top