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नूरपुर सड़क हादसा

Publish Date: April 11 2018 01:19:46pm

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शहर नूरपुर में एक निजी स्कूल की बस के खाई में गिरने से 26 बच्चों सहित 30 के मरने के समाचार ने एक बार फिर दिल दहलाकर रख दिया है। आये दिन सड़क हादसों में कभी एक परिवार के लोगों की या कुछ युवा मित्रों के मरने का समाचार दिल को दहला देता है। नूरपुर शांत व प्रकृति की गोद में बसा एक छोटा सा शहर है। उस छोटे से शहर में शहर के नन्हें-मुन्नों की मौत के समाचार के बाद शहर के लोगों की व प्रभावित परिवारों की क्या हालत होगी यह सोचकर ही दिल दहल जाता है।

प्राप्त सूचना अनुसार निजी स्कूल के खुलने का यह पहला दिन था और कई बच्चे तो पहले दिन ही स्कूल गये थे और वहां से जीवित घर वापस न आ सके। सभी बच्चे लगभग 12 वर्ष की आयु के थे। मरने वालों में बस ड्राइवर व एक अध्यापक और एक अन्य स्कूल कर्मचारी था। एक मोटरसाइकिल को रास्ता देने के चक्कर में यह हादसा हुआ। बस में 20 बच्चों के बैठने की क्षमता थी लेकिन बच्चे थे 37। इससे स्पष्ट है कि जो हिदायतें सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूल की बसों के लिए दी थीं उन का पालन नहीं किया जा रहा था। यही बात बस की गति पर भी लागू होती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्कूल बस की गति 40 कि.मी. प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए। बस के बाहर स्कूल का नाम लिखा होना चाहिए। ड्राइवर का नाम व टेलीफोन नम्बर इत्यादि ऐसी कई हिदायतें स्कूल बसों के लिए दी गई हैं। लेकिन हिदायतों पर कुछ एक स्कूल ही अमल करते हैं, अधिकतर तो इनकी अनदेखी कर देते हैं। शिक्षा विभाग व स्थानीय प्रशासन भी उपरोक्त मामले में आंखें बंद करके ही रखता है।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने प्रभावित परिवारों को राहत राशि देने की घोषणा की है और परिवारों से हमदर्दी भी जताई है। मानवीय दृष्टि से तो तत्काल रूप में यही कुछ किया जा सकता है लेकिन भविष्य में ऐसे हादसे न हो इसके लिए आवश्यक है कि सरकार निजी स्कूलों से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों को सख्ती से लागू करवाए। सड़क नियमों को लागू करवाने के साथ-साथ सड़कें की खस्ता हालत पर भी ध्यान दे। बढ़ते शहरीकरण के कारण जहां वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है वहीं सड़कों पर दबाव भी बढ़ रहा है। तकनीकी रूप से बेहतर वाहनों की गति भी अधिक है और चलाने वाले अधिकतर युवा वर्ग से होते हैं, उन्हें तेज गति में अधिक आनन्द आता है।

ट्रकों और बसों के साथ-साथ ट्रैक्टर ट्रालियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनको चलाने वाले यह क्षमता रखते हैं कि नहीं इस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। शराब के नशे और ऊंचे-ऊंचे गाने लगाकर जब ड्राइवर ट्रक या बस चलाता है तो एक पल ऐसा आता है जब क्षणभर के लिए चालक से गलती होती है और फिर अन्य को इस गलती का परिणाम झेलना पड़ता है। पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश में ही एक बस उस समय खाई में गिर गई थी जब उसका ड्राइवर बिना गति धीमी किए मोबाइल फोन सुनने लगा था। सड़क हादसे को लेकर पिछले समय में आई एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत हादसे मानवीय भूलों के कारण ही होते हैं, चालक की लापरवाही ही मुख्य कारण होता है।

रोजी-रोटी की तलाश में निकले लोगों का दबाव शहरों पर बढ़ता चला जा रहा है। सार्वजनिक बस सेवा कमजोर होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति निजी वाहन को प्राथमिकता दे रहा है यह स्कूटर से लेकर कार तक हो सकते हैं। निजी वाहनों की बढ़ती संख्या पर काबू तभी पाया जा सकता है, अगर सार्वजनिक क्षेत्र में यातायात व्यवस्था मजबूत होगी। आज हिमाचल प्रदेश में ही नहीं देश के अधिकतर प्रदेशों में सरकारी बस सेवा खटारा हालत में ही है। जीवन की बढ़ती गति के साथ मेल नहीं खाती, इसलिए दिन-ब-दिन पिछड़ती जाती है। नूरपुर बस हादसा हमें यही नसीहत देता है कि यातायात नियमों का पालन करें तथा सड़कों पर बढ़ते दबाव पर किस तरह काबू रखा जा सकता है इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार कर उस योजना पर अमल करें। जिन परिवारों के नन्हें फूल अपनी महक बिखेरने से पहले मुरझा गए हैं उन परिवारों के दु:ख भरे पलों में उत्तम हिन्दू परिवार उनके साथ है और दिवगंत आत्माओं के लिए भगवान से शांति की प्रार्थना तथा परिवारों को दु:ख झेलने की शक्ति दें इसकी कामना करता है।    


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।
 

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