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जलियांवाला बाग से उठती बलिदानी आवाज को सुने

Publish Date: April 13 2018 01:35:32pm

13 अप्रैल 1919 बैसाखी, उस दिन फसल कटने को तैयार थी और देश के बेटे-बेटियां प्राण हथेली पर रखकर कफन सिर पर बांध कर भारत माता को बेडिय़ों से मुक्त करने के लिए सिर देेने को तैयार थे। वैसे तो 1917 के रॉलेट एक्ट के बाद ही क्रांति की ज्वाला अंदर ही अंदर भड़क रही थी, विस्फोट के लिए तैयार थी, पर अमृतसर में 8 अप्रैल से लेकर 13 तक जो कुछ हुआ उससे पूरा देश कुछ पलों के लिए सहमा, कंपायमान हुआ और उसके बाद बलिपथ पर बढऩे के लिए पूरे इरादे के साथ जाग पड़ा, आगे बढ़ा। इसका परिणाम हुआ भारत की स्वतंत्रता। यह ठीक है कि उस समय के कुछ नेताओं की अदूरदर्शिता अथवा  जिन्ना की धर्म आधारित अलग देश की मांग तथा कहीं कहीं आपसी भेदभाव भारत का विभाजन करवा गए, पर हम लाल किले पर तिरंगा फहरा सके। 
बत बैसाखी की है। अमृतसर के बाग जलियांवाला में शाम के समय हजारों लोग इकट्ठे थे। इसी दिन सुबह अमृतसर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी जनरल डायर अमृतसर की गलियों में बड़ी फोर्स के साथ घूमता रहा और यह ढिंढोरा पिटवाता रहा कि लोग घरों से बाहर न निकलें। उसका उद्देश्य था कि कोई भी हिंदुस्तानी अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आवाज न उठाए पर उसी दिन एक ऐसा किशोर बालक जिसका नाम कोई नहीं जानता वह इतिहास के किन पृष्ठों में खो गया, यह भी नहीं जानते पर एक टीन का बना कनस्तर, डंडे से बजाता, चैक चैराहों में यह कहता रहा कि सभी लोग पहुंचें, मीटिंग में पहुंचें, जलियांवाला बाग पहुंचें... लाहौर से प्रकाशित ''डंडा अखबार'' भी अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बना था। यह अखबार अंग्रेजों से खुली टक्कर लेने और देश हित प्राण देने का आह्वान करता था। ब्रिटिश साम्राज्य के सारे हथकंडों के बावजूद भी हजारों लोग जलियांवाला बाग पहुंचे। सभी भारत माता की जय, वंदेमातरम् के नारे लगा रहे थे। मंच से स्थानीय नेता भाषण दे रहे थे। किसी को भी यह आशंका न थी कि ब्रिटिश साम्राज्य कहर बरसाएगा, पर डायर के नेतृत्व में सैकड़ों पुलिस कर्मचारी तैयार जलियांवाला बाग पहुंचे और बिना कोई चेतावनी दिए गोलियां बरसा दीं।
जिस समय गोलियां चलीं उस समय इस जन आंदोलन के नेता दुर्गा दास भाषण दे रहे थे। उनसे पहले राय राम सिंह, दार सिंह, अब्दुल मजीद, बृजगोपाल नाथ, हंसराज और गुरबख्श राय भाषण दे चुके थे। देश भक्ति से भरी कविता श्री गोपीनाथ ने सुनाई और लोगों को उत्साहित किया। कविता की कुछ पंक्तियां यह थीं- अमृतसर-ए-आला ने हम को आज दी हंै धमकियां कि बाजू काट देंगे हम परो को नोच लेंगे हम। पर हर खिजां के बाद मौसमें बहार लाजमी है हजूर, खुदबखुद निकल आएंगे पर तब और गून्जे खिल उठेंगे। अब सवाल यह है कि डायर की गोलियों की चर्चा तो भाषणों में हो जाएगी, पर अमृतसर के जो कीमती बेटे इस सारे स्वातंत्र्य अभियान में जीवन दे गए, उनकी गाथा कोई नहीं सुनाता। प्रश्न यह है कि क्यों नहीं सुनाता? डॉ. सत्यपाल और सेफुद्दीन किचलू की तरह हजारों लोग ब्रिटिश हुकूमत से टकराए। डॉ. सत्यपाल और श्री किचलू को  डिप्टी कमिश्नर अमृतसर ने अपने बंगले में बुला कर गिरफ्तार कर धर्मशाला भेज दिया, पर इनके देशभक्त साथी डटे रहे, अंग्रेजों से टक्कर लेते रहे, गोलियां भी चलीं। भारत के बेटों ने भी अंग्रेजों से लोहा लिया। अमृतसर के तीन बड़े अंग्रेजी बैंकों को उनके प्रबंधकों समेत आग के हवाले कर दिया। लाशें बिछीं, अमृतसरवासी और इतिहासकार भी भूल गए कि 8 अप्रैल से 10 अप्रैल के बीच 11 लोग शहीद हुए थे और शहीदों के अंतिम संस्कार के रास्ते में भी अंग्रेजों ने बड़ी रुकावटें खड़ी की थीं। आज का प्रश्न यह है कि क्या हम राजनीतिक भाषणों के साथ जलियांवाला बाग में दो फूल अर्पित करके या पुलिस की सलामी करवाकर चले जाएंगे? क्या जलियांवाला बाग की धरती को जिस पवित्र खून से सिंचित किया उसका इतिहास जानने का भी प्रयास करेंगे? अमृतसर के जो बेटे-बेटियां जन नेतृत्व करते हुए शहीद हुए अथवा उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सशक्त आंदोलन किया, क्या उनको जानेंगे। पूरे भारत भर के जनमानस से मेरा प्रश्न नहीं, पहले तो पंजाब से है। कितने लोग जानते हैं कि अंग्रेज चैधरी बुग्गा और रत्तो-रतन चंद के नाम से कांपते थे। इन दोनों को अंग्रेजों ने हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह करने के कारण फांसी की सजा दी, जिसे बाद में श्री मदन मोहन मालवीय जी ने अपने प्रयासों से उम्रकैद में बदलवाया और इन दोनों को काले पानी की जेल में भेज दिया, जहां इन्होंने अमानवीय यातनाएं सहन कीं और 17 वर्ष बाद रिहा हुए। ब्रिटिश शासकों के प्रतिनिधि महसूस करते थे कि जिस दिन कन्हैया लाल, चैधरी बुग्गा और रत्तो जनता को आवाज देते हैं उस दिन पूरा अमृतसर पीछे चलता है। आज जरूरत है बलिदान की धरती अमृतसर, अमृतसर के हाल बाजार, रेलवे लाइन पर बना ऊंचा पुल सीढिय़ों वाला पुल, रिगो ब्रिज आदि क्षेत्रों की मिट्टी से पूछें कि उसने किस-किस को कितनी शान से बलिपथ पर बढ़ते देखा।
 जो दुर्गा दास जलियांवाला बाग में डायर की गोलियों से पहले और गोलियों के दौरान भाषण दे रहे थे, कहां खो गए उनके द्वारा किए गए महान कार्य। क्या भारत सरकार ने आज तक कोई ऐसा प्रयास किया जिससे पूरे भारत के लोग इन बलिदानियों की अमर गाथा से परिचित हो सकें। एक अच्छा संकेत है कि पूरे भारत से आने वाले यात्री पूरी श्रद्धा के साथ जलियांवाला बाग पहुंचते हैं, पर खेद है कि यह केवल एक पर्यटन का स्थान बनकर रह गया। यद्यपि अभी वहां ऐसे चित्र प्रदर्शित किए जा रहे हैं जिनसे कुछ शहीदों का नाम लोग जान सकें, पर नाम के अलावा उनका काम क्या था, उनका परिवार कहां है, उनको भारत न सही पंजाब के इतिहास में भी कहां स्थान मिला, यह प्रश्न कोई पूछता नहीं और अगर कोई पूछ ले तो उत्तर भी नहीं मिलता। कैसा दुर्भाग्य है कि पंजाब के पिछली अकाली-भाजपा सरकार ने अमृतसर में जो जंग-ए-आजादी स्मारक बनाया उसमें अंग्रेजों के लिए लडऩे वाले ब्रिटिश सेना के पंजाबी सिपाहियों को गौरवान्वित कर दिया, जलियांवाला बाग को भूल गए। कितना अच्छा होता अगर वहां एक सुनहरी अक्षरों में सूची दर्शाई जाती, जिसमें जलियांवाला बाग और उससे जुड़े शहीदों के नाम दिए जाते।  13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में शहीदों की धरती अमृतसर में मेला तो लगता है, दूर-दूर से आने वाले आम जन अधिक जानते नहीं और उन्हें जानकारी देने का कोई प्रयास भी नहीं रहता, पर जो पक्ष और विपक्ष के राजनीतिक नेता मंचों पर आसीन होते हैं वे श्रद्धांजलि को भी राजनीति का पुट देकर चले जाते हैं। कितना अच्छा हो कि भारत सरकार, पंजाब सरकार और हर जागरूक नागरिक जलियांवाला बाग की मिट्टी से तिलक करता हुआ उस आवाज को सुने जिस आवाज ने भगत सिंह को शहीद भगत सिंह बनाया और ऊधम सिंह को डायर की शैतानी का बदला लेकर विश्व इतिहास में अद्वितीय स्थान दिया। भारत के जन-जन का कंठहार बना दिया। हमारा राष्ट्रीय दायित्व है कि उन सबको श्रद्धा सुमन अर्पित करें जिन्होंने अंग्रेज शासकों की क्रूरता का सामना सिर देकर किया। 

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(लक्ष्मीकांता चावला, लेखिका पंजाब की पूर्व मंत्री एवं भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं)

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