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स्वर्ण परी हिमा दास

Publish Date: July 17 2018 01:06:46pm

मिलखा सिंह और पी.टी.उषा के बाद भारत को एथलेटिक क्षेत्र में असम की हिमा दास मिली है। 18 वर्षीय हिमा दास ने वल्र्ड अंडर 20 चैम्पियनशिप में 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर एक नया इतिहास रच दिया है। हिमा दास से पहले भारत के कोई भी पुरुष या महिला एथलीट ऐसा कारनामा नहीं कर पाए जिनमें मिलखा सिंह व पी.टी. उषा भी शामिल हैं, जिनका अपना नाम है और उन्होंने भी एक इतिहास रचा है जिसे देशवासी कभी भी भूल नहीं सकते।

आइएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर फाइनल रेस में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट हिमा दास का सफर अनूठा है। हिमा 16 सदस्यों के संयुक्त परिवार में रहती है और उनका परिवार बस किसी तरह खाने-पीने की व्यवस्था कर लेता है। उनका बचपन धान के खेतों में बीता लेकिन गुरुवार को फिनलैंड के टांपेरे शहर में उन्होंने भारत का परचम लहरा दिया। किसी अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स ट्रैक पर भारतीय एथलीट के हाथों में तिरंगा और चेहरे पर विजयी मुस्कान देखना अपने आप में गर्व की अनुभूति कराने वाला है। हिमा दास के पिता रंजीत दास ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हम बहुत खुश हैं कि हमारी बेटी ने देश के लिए सोना जीता। उसने बहुत मेहनत की थी। वह आगे और बेहतर प्रदर्शन करेगी। मात्र 18 साल की हिमा के पिता रंजीत दास धान की खेती करते हैं। हिमा के कोच निपुण दास के पास हिमा साल 2017 के जनवरी महीने में आईं। 

उन्होंने कहा कि असम के नौगांव जिले की रहने वाली हिमा गुवाहाटी में स्थानीय कैंप में हिस्सा लेने आई थीं। वह जिस तरह से ट्रैक पर दौड़ रही थी, मुझे लगा कि इस लड़की में आगे तक जाने की काबिलियत है। इसके बाद निपुण हिमा के गांव में उनके माता-पिता से मिलने गए और उनसे कहा कि वे हिमा को बेहतर कोचिंग के लिए गुवाहाटी भेज दें। हिमा के माता-पिता गुवाहाटी में उनके रहने का खर्च नहीं उठा सकते थे लेकिन बेटी को आगे बढ़ते हुए भी देखना चाहते थे। निपुण ने उनसे कहा कि मैं हिमा का खर्च उठाऊंगा। बस आप उसे बाहर आने की मंजूरी दें। शुरुआत में हिमा को फुटबॉल खेलने का शौक था। वह अपने गांव या जिले के आस पास छोटे-मोटे फुटबॉल मैच खेलकर 100-200 रुपये जीत लेती थी। फुटबॉल में खूब दौडऩा पड़ता था। इसी वजह से हिमा का स्टैमिना अच्छा रहा, जिस वजह से वह ट्रैक पर भी बेहतर करने में कामयाब रहीं। निपुण कहते हैं कि जब उन्होंने हिमा को फुटबॉल से एथलेटिक्स में आने के लिए तैयार किया तो शुरुआत में 200 मीटर की तैयारी करवाई, लेकिन बाद में उन्हें अहसास हुआ कि वह 400 मीटर में अधिक कामयाब रहेंगी। हिमा ने अप्रैल में गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ खेलों की 400 मीटर की स्पर्धा में छठा स्थान हासिल किया था। निपुण बताते हैं कि नौगांव में अक्सर बाढ़ के हालात बन जाते हैं, वह जगह बहुत अधिक विकसित नहीं है। जब हिमा गांव में रहती थी तो बाढ़ की वजह से कई-कई दिन तक अभ्यास नहीं कर पाती थी, क्योंकि जिस खेत या मैदान में वह दौड़ की तैयारी करती, बाढ़ में वह पानी से लबालब हो जाता। असम में मौजूद निपुण ने कहा कि मुझे यकीन था कि हिमा फिनलैंड में कुछ बड़ा करके आएगी, लेकिन वह स्वर्ण जीत लेगी इसका अंदाजा रेस शुरू होने से पहले तक नहीं था। हिमा ने 400 मीटर की दौड़ स्पर्धा में 51.46 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमा दास के पास दौडऩे के लिए एक समय अच्छे जूते भी नहीं थे और परिवार आर्थिक तंगी भी झेल रहा था। लेकिन इसके बावजूद हिमा ने वो कर दिखाया जिस पर आज देशवासी गर्व कर रहे हैं। हिमा दास आज देश में नई उडऩ परी के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुई है। उसकी सफलता पर देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से लेकर सभी वर्गों के लोगों ने बधाई दी है और कामना की है कि वह ओलम्पिक व अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करे।

हिमा दास से उपरोक्त आशा होनी ही चाहिए, जीवन के जिस पड़ाव में है, उस से और कई उपलब्धियों की आशा रखना स्वाभाविक भी है। लेकिन तस्वीर का दूसरा जो कम•ाोर पहलू यह है कि हिमा दास को अगर उनका कोच निपुण दास प्राथमिक आर्थिक सहायता व ट्रेनिंग न देता तो शायद भारतवासी गौरवमय पलों का आनन्द न ले सकते थे। हिमा दास को सफलता मिलने के बाद असम सरकार ने हिमा को प्रदेश का ब्रांड अम्बेसडर बनाने की घोषणा अवश्य की है, लेकिन सरकारी व गैर सरकारी संगठनों व कारपोरेट सैक्टर से हिमा दास को तथा उसके परिवार को आर्थिक सहायता देने की अभी तक कोई घोषणा नहीं हुई। हिमा दास की सफलता में सिवा उसकी अपनी मेहनत व लग्न के या उसके परिवार व कोच के अलावा भी किसी ने कोई बड़ी मदद नहीं की लेकिन अब जब सारा देश उससे आशाएं लगा बैठा है तथा ओलिम्पक में उससे इसी तरह स्वर्ण की आशा रखता है तो उसे आर्थिक व नैतिक समर्थन देने की भी आवश्यकता है।

उडऩ सिख मिलखा सिंह ने उडऩ परी हिमा दास को सलाम करते हुए शुभ कामनाएं भी दी हैं कि वह भविष्य में भी एथलेटिक्स में अच्छा करे। मिलखा सिंह हो या पी.टी. उषा इन सबने अपनी मेहनत व लग्न से अपना नाम बनाया है। हिमा दास भी इसी श्रेणी में आती है, यही प्रश्न उठता है कि छुपी प्रतिभा को समय रहते क्यों नहीं पहचाना जाता और फिर संरक्षण व समर्थन भी नहीं मिलता। 

सरकार व समाज को चाहिए कि हिमा दास जैसी युवा खिलाड़ी व इसी आयु वर्ग के अन्य प्रतिभावान खिलाडिय़ों को आर्थिक संरक्षण देने के साथ-साथ उनका मार्ग दर्शन किया जाए ताकि वह देश व दुनिया में अपना तथा भारत का नाम रोशन कर पायें। भारत अगर विश्व स्तर के खेल मंच पर अपनी पहचान बनाना चाहता है तो उसे हिमा दास और अन्य प्रतिभावान खिलाडिय़ों को आर्थिक व नैतिक समर्थन व संरक्षण देना होगा। उडऩ व स्वर्ण परी हिमा दास को उसकी उपलब्धी पर बधाई व आशा करते हैं कि परमात्मा की अपार कृपा से वह भविष्य में भी अपना व देश का नाम रोशन करती रहेगी।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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