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भीड़तंत्र बर्दाश्त नहीं

Publish Date: July 19 2018 12:21:10pm

सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला और महात्मा गांधी के परपौत्र तुषार गांधी की जनहित याचिकाओं पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक और ऐतिहासिक फैसला दिया है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भीड़तंत्र को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों को अलग अपराध की श्रेणी में रखने की बात कहते हुए अदालत ने सरकार व संसद से कहा कि इनकी रोकथाम के लिए कठोर सजा वाला नया कानून बनाने पर विचार किया जाये। 

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने कहा, 'नागरिक कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते। वे अपने-आप में कानून नहीं बन सकते। भीड़तंत्र की इन भयावह गतिविधियों को नया चलन नहीं बनने दिया जा सकता।' इन घटनाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को जवाबदेह ठहराते हुए पीठ ने कहा कि राज्य ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते। विधि सम्मत शासन सुनिश्चित करते हुए समाज में कानून-व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकारों का काम है। अदालत ने सरकार से सोशल मीडिया पर गैरकानूनी और भड़काऊ संदेशों के प्रचार-प्रसार को रोकने के लिए कदम उठाने का भी निर्देश दिया। भीड़ की हिंसा से निबटने के उपायों के तौर पर अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को कई निर्देश जारी किये हैं। छ्वराज्य सरकारें हर जिले में पुलिस अधीक्षक स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को नोडल अधिकारी मनोनीत करें। उनकी मदद के लिए उपाधीक्षक रैंक का एक अधिकारी रहना चाहिए। वे एक विशेष कार्य बल बनाएंगे, ताकि नफरत फैलाने वाले भाषण, भड़काने वाले बयान और फर्जी खबरों में लिप्त लोगों के बारे में गुप्तचर सूचनाएं प्राप्त की जा सकें। छ्व राज्य सरकारें 3 हफ्तों में ऐसे जिलों, उपमंडलों और गांवों की पहचान करें, जहां पिछले कम से कम 5 साल में पीट-पीटकर हत्या और भीड़ की हिंसा की घटनाएं हुई हैं। छ्व संबंधित राज्यों के गृह विभाग के सचिव संबंधित जिलों के नोडल अधिकारियों के लिए निर्देश और परामर्श जारी करके यह सुनिश्चित करेंगे कि पहचाने गये इलाकों के थानों के प्रभारी अतिरिक्त सावधानी बरतें। छ्व नोडल अधिकारी सभी थाना प्रभारियों और जिले की स्थानीय खुफिया इकाई के साथ महीने में कम से कम एक बार बैठक करें। छ्व पुलिस महानिदेशक पिछली घटनाओं के मद्देनजर संवेदनशील इलाकों में पुलिस की गश्त और महानिदेशक कार्यालय को मिली गोपनीय जानकारियों के बारे में पुलिस अधीक्षकों को निर्देश जारी करें। छ्वसरकारें विभिन्न माध्यमों से लोगों को जागरूक करें।

सर्वोच्च न्यायालय इधर आदेश सुना रहा था कि झारखंड में बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। जब वह पहडिया समुदाय के लोगों के अधिकारों बारे लिट्टीपड़ा जा रहे थे। इस तरह की अनेक घटनाएं कभी धर्म के नाम पर, कभी क्षेत्र के नाम पर और कभी अंध विश्वास के कारण अतीत में एक बार नहीं अनेक बार सामने आ चुकी हैं। गौ रक्षा के नाम पर, अंध विश्वास के कारण तो पंजाब में धर्म के नाम पर कई बार भीड़तंत्र सरकारी व प्रशासकीय तंत्र पर हावी हुआ है। भीड़ की तो बात छोडिय़े विधानसभाओं और लोकसभा तथा राज्यसभा में भी भीड़तंत्र की झलक उस समय देखने को मिलती है जब हमारे प्रतिनिधि एक-दूसरे पर कुर्सियां उछालते व एक-दूसरे को घूसे मारते और गाली-गलोच करते देखे जाते हैं और सभा अध्यक्ष को उपरोक्त बातें कटवानी पड़ती हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों का मतभेद होना स्वाभाविक है। समस्या उस समय पैदा होती है जब हम भावना में बहकर या फिर अहम से प्रभावित हो दूसरे के विचार सुनने को ही तैयार नहीं होते। बात यही नहीं खत्म होती बात एक-दूसरे के विरोध तक सीमित न रहकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक पहुंच जाती है। मतभेद से शुरू हुई बात जब मनभेद तक पहुंच जाती है तभी मतदाता स्तर पर भीड़तंत्र खुद बन फैसले लेने लगता है, क्योंकि उसको लगता है कि तत्काल सजा देना ही मसले का हल है। इस विचार को कई जनप्रतिनिधि भी समर्थन करते दिखाई देते हैं। जबकि लोकतंत्र में इसका का कोई स्थान नहीं है। लोकतंत्र तो वह बगीचा है जिसमें विचार के प्रत्येक फूल को खिलने व महकने का हक है। विभिन्न प्रकार के फूलों की महक ही तो लोकतंत्र नुमा गुलदस्ते की आत्मा होती है, लेकिन केवल मात्र जब मत पाने व मतदाता को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी समझकर नेता लोग उसका इस्तेमाल करते हैं तो वही से भीड़तंत्र का बीज पौधा बन सामने आ जाता है। राजनीतिज्ञों के समर्थन व संरक्षण से यह भीड़तंत्र लोकतंत्र पर हावी होने की कोशिश करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने देश के वर्तमान और भविष्य को देखते हुए जो निर्देश राज्य सरकारों व केंद्र सरकार को दिए हैं अगर प्रदेशों और देश की सरकार उन निर्देशों पर ईमानदारी से अमल करती है तो अगली पीढ़ी का भारत अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाने में अवश्य सफल होगा।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

 

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