Thursday, December 13,2018     ई पेपर
ब्रेकिंग न्यूज़
राजनीति

हिंसा अस्वीकार्य पर दोहरे मापदंड भी क्यों

Publish Date: August 04 2018 01:23:33pm

गत दिवस एक ही दिन दो घटनाएं हुई। झारखंड में स्वामी अग्निवेश और टीवी डिबेट में एक मौलाना द्वारा एक महिला से मारपीट। आश्चर्य कि स्वयं को बुद्धिजीवी बताने वाले लोगों की प्रतिक्रिया  दोनों घटनाओं पर अलग-अलग है। सब अपनी सुविधा अनुसार एक घटना को कोस रहे हैं। वे इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझते कि दूसरे पर आपकी चुप्पी क्यों? किसी घटना के उचित- अनुचित का निर्णय यदि आप झंडे का रंग देखकर तय करेंगे तो आपको अपने रंग के साथ होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए स्वयं को जिम्मेवार मानने से परहेज नहीं करना चाहिए। 
कानून को अपने हाथ में लेने का समर्थन नहीं किया जा सकता तो बहुुसंख्यक लोगों की धार्मिक भावनाओं के प्रति अनावश्यक कठोरता, कटुता को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। अनेक ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने मूर्तिपूजा को नकारा है लेकिन ऐसे विचारक भी हुए हैं जिन्होंने प्रतीक को एकाग्रता से जोड़ा। उनका मत है कि मूर्ति या चित्र प्रतीक हैं तो ताजिये और चर्च का क्रास भी उससे भिन्न नहीं। मंदिर प्रतीक है तो मस्जिद या चर्च उससे कैसे भिन्न? 
डेनमार्क में एक कार्टून छपने पर भारत सहित सारे विश्व में विरोध करने वाले विरोध के नाम पर प्रतीक को ही तो पुष्ट कर रहे थे। स्वयं अग्निवेश जी के एक विशेष रंग के वस्त्र और पगड़ी भी क्या प्रतीक नहीं हैं? अग्निवेश जी को इस बात का जवाब जरूर देना चाहिए कि स्वयं को आर्यसमाजी नेता बताने वाला सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबंध के लिए अदालत में क्यों गया? मिशनरी और गोमांस भक्षण का समर्थन क्यों? जिसके आचरण से आर्य सामाजियों का बहुमत ही असहमत हो, उसे दूसरों को कटुपूर्वक कुछ सिखाने से पहले अपने आचरण पर गंभीरता से विचार करते हुए करना चाहिए कि वे स्वयं अपने समाज और राष्ट्र के प्रति कितने उदार हैं।
मैं स्वयं ढोंग का विरोधी हूं लेकिन एकतरफा विरोध का भी विरोधी हूं। वैचारिक असहमति का सम्मान करें या न करें परंतु मतभिन्नता को नष्ट करने के विचार को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता लेकिन शब्द संयम और मर्यादा की सीमा निर्धारित होनी चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यदि कोई विचार राष्ट्रद्रोही है तो उन्हें कुचलने में देरी करने वाला शासक भी निश्चित रूप से अपराधी है।
जहां तक तलाक, हलाला पर चल रही बहस का प्रश्न है पिछले दिनों सामने आये ससुर से हलाला के समाचार ने मानवीय संबंधों की पवित्रता को कलंकित ही किया है। हर विवेकशील व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म अथवा संप्रदाय में विश्वास रखता हो, इसकी निंदा ही करनी चाहिए। निंदा के स्वर अलग होना का संकेत हैं कि कुछ लोग बदलते दौर में बदलने को तैयार नहीं हैं। आधुुनिकता का हर सुख, आनंद लेने वाले पाषाण कालीन कुरीति को छोडऩे के पक्ष में नहीं हैं। 
शायद ही किसी भी धर्म अथवा संप्रदाय में महिला पर हाथ उठाने को उचित माना जाता हो। विचारणीय है कि स्वयं को धार्मिक बताने वाला व्यक्ति लाखों लोगों द्वारा देखे जा रही टीवी डिबेट में ऐसा कृत्य कर सकता है, तो वह अकेले में किस सीमा तक जा सकता था। ऐसे मौलाना के कृत्य की न केवल कठोर भर्त्सना होनी चाहिए बल्कि मौका- बेमौका फतवा जारी करने वाले संप्रदाय के महानुभावों को विचार करना चाहिए कि जो संप्रदाय हलाला जैसी अमानवीय प्रथा का विरोध करने वाली पीडि़ता को संप्रदाय से निकाल सकता है उसके द्वारा वे ऐसे व्यक्ति को बिना देरी किये स्वयं अपने संप्रदाय से निकाल बाहर  न करने का अर्थ है कि वे भी ऐसे तत्वों और परिस्थितियों से निबटने की जिम्मेवारी शासन और कानून को सौंपना चाहते हैं। 
जहां तक दोहरे मापदंडों का प्रश्न है, हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए यह कोई नई बात नहीं है लेकिन देश का दुर्भाग्य यह कि सबके भले के नारे लगाकर चुनकर आये नेता भी अन्याय पर आधारित मापदंडों का पालन करते हैं वरना संविधान को नकारते हुए अपने लिए विशेष किताबी कानूनों की मांग करने वालों को शिक्षित करने की बजाय देश के संसाधनों पर उनका पहला अधिकार बताये जाने का औचित्य वोट बैंक की राजनीति के अतिरिक्त और क्या हो सकता हैं? आखिर उन्हें कब समझ में आयेगा कि कुछ को अपने धार्मिक ग्रन्थों की शिक्षा के अधिकार पर तुष्टिकरण करना और बहुसंख्यक समाज की शिक्षा में उसके धार्मिक विश्वासों। क्या, नैतिक शिक्षा पर भी रोक लगाना जानबूझकर समाज को बांटने की साजिश है जो किसी शासक के लिए कलंक होना चाहिए। 
संविधान में बिना किसी भेदभाव, बराबरी के प्रावधान को गर्व से अपनी उपलब्धि बताने वाले देश की सबसे बड़ी अदालत के तलाक के बाद गुजारा भत्ता वाले मानवीय फैसले को बदलने  का विचार तक मन में न लाते। उच्चतम न्यायालय द्वारा बार-बार समान नागरिक कानून बनाने के निर्देश का पालन कर अधिसंख्यक विवादों को समाप्त कर चुके होते। सेवा के नाम पर आस्थाओं का व्यापार करने और बच्चे बेचने वालों को देश निकाला दे दिया गया होता लेकिन वे मौन रहे क्योंकि उनके समर्थन में आवाज उठाने वाले भी बुद्धिजीवी है।
किसी भी सभ्य समाज में अनावश्यक विवादों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए। क्या यह उचित समय नहीं कि दोनों घटनाओं के दोषियों को समान रूप से दंडित करने की मांग करने के साथ-साथ हम देश के प्रत्येक नागरिक के लिए समान कानून की मांग भी करें। धर्म के आधार पर देश का विभाजन होने के बाद भी यदि हिन्दुस्तान हिन्दू राष्ट्र नहीं बना तो यह इस देश के बहुसंख्यक समाज की उदारता है।  इस उदारता को कदम-कदम पर अपमानित करने से बाज आना चाहिए। इस कड़ी में सर्वप्रथम दशकों  शीर्ष पद का सुख लेने के बाद शरिया अदालत की मांग करने वाले व्यक्ति के प्रति बुद्धिजीवियों को अपना नजरिया स्पष्ट करना चाहिए। 
अगर ऐसी मांग जायज है तो हिन्दुओं के देश में हिन्दू राष्ट्र की मांग को किस मुंह से गलत ठहरायेंगे? क्रिया की प्रतिक्रिया को एक सीमा के बाद रोका नहीं जा सकता। रोकने का एकमात्र तरीका जहां शासन को राग, द्वेष से मुक्त होकर कानून का पालन करना चाहिए वहीं धार्मिक और बौद्धिक नेतृत्व में रंग देखकर नहीं, पूरी ईमानदारी से गलत को गलत कहने का विवेक और साहस होना चाहिए। 
सभी धार्मिक विश्वासों का सम्मान होना चाहिए लेकिन समय, काल के अनुुसार यदि कोई प्रथा बदलने  या छोडऩे की जरूरत हो तो उसे बिना देरी किये स्वीकार करना होगा। राष्ट्र-धर्म को किसी भी व्यक्तिगत धर्म से कमतर नहीं माना जाना चाहिए। जब किसी धर्म का नियंत्रण अथवा वित्त पोषण बाहर से होगा तो स्वाभाविक है कि राष्ट्र दोयम स्थान से आगे बढ़ ही नहीं सकता। इस पर रोक जरूरी है।
संसद का वर्षाकालीन सत्र में आवश्यक के नाम पर अनावश्यक हंगामा कर बार-बार कार्यवाही स्थगित करने की बजाय पक्ष और विपक्ष को हंगामे को हमेशा के लिए समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए। सत्ता हथियाने अथवा बचाने की राजनीति हर क्षण जारी रहना घातक है। धर्म और जाति की आत्मघाती राजनीति को अलविदा कहने में अब विलम्ब नहीं होना चाहिए। तथाकथित बुद्धिजीवी  बेशक न समझे, देश का सामान्यजन मानता है कि धर्मान्तरण पर प्रतिबंध  और समान नागरिक कानून ही अब शांति का एकमात्र रास्ता है।

लेखक विनोद बब्बर (युवराज)
 

WhatsApp पर न्यूज़ Updates पाने के लिए हमारे नंबर 7400063000 को अपने Mobile में Save करके इस नंबर पर Missed Call करें। फेसबुक-टिवटर पर हमसे जुड़ने के लिए www.fb.com/uttamhindu/ आैर www.twitter.com/DailyUttamHindu पर क्लिक करें आैर पेज को लाइक करें।


IND vs AUS: पर्थ टेस्ट के लिए 13 सदस्यीय भारतीय टीम का ऐलान, अश्विन और रोहित बाहर

पर्थ (उत्तम हिन्दू न्यूज): भारत के स्टार ऑफ स्पिन गेंदबाज रविचंद्रन अश्विन और बल्लेबाज रोह...

ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार हुई अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा, हेडफोन की जगह निकला नट-बोल्ट

मुंबई(उत्तम हिन्दू न्यूज)- बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री सोनाक्ष...

top