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कटघरे में नवजोत सिंह सिद्धू

Publish Date: August 23 2018 01:08:21pm

पाकिस्तान के नये बने प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ समारोह के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख से जिस जोश के साथ भारत के क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू मिले उस कारण वह आज कटघरे में खड़े दिखाई दे रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरेन्द्र सिंह ने सिद्धू का पाक सेना प्रमुख बाजवा से गले मिलने पर सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी भी जाहिर की और निंदा भी की। नवजोत सिंह सिद्धू की यात्रा बेशक एक निजी यात्रा थी और यही दलील देकर कांग्रेस पार्टी ने सिद्धू को ले देश भर में चले विवाद से अपने को दूर करने का प्रयास किया है। सिद्धू को अपनी गलती का एहसास तो शायद भारत लौटने से पहले ही हो गया था तभी इसे छिपाने के लिए उन्होंने सिख समाज की भावनाओं को ढाल बनाने की कोशिश की।

सिद्धू ने अपने बचाव में चंडीगढ़ में मीडिया से बातचीत के दौरान जो कहा उसका अंश आपके सम्मुख रख रहा हूं। स. सिद्धू ने कहा कि पाकिस्तान में आई इस राजनीतिक तबदीली से ऐसी आस रखी जा सकती है जो पिछले लम्बे समय से दोनों देशों में चले आ रहे तनाव को मुक्त करने में सहायक भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि अपने समय के क्रिकेट के खेल के साथी इमरान खान के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद शपथ समारोह के लिए मिले लिखित आमंत्रण पत्र के बाद इमरान खान द्वारा स्वयं फोन पर निमंत्रण देना मेरे लिए सम्मान वाली बात थी। नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा कि दोनों देशों में अमन और शांति के लिए गले लगाना और दोस्ती जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका पाकिस्तान के दौरे की आलोचना करने वालों की सोच बहुत छोटी है। उन्होंने कहा कि वह श्री वाजयेपी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध के पहले भी शांति प्रयास में श्री वाजपेयी 'कारवां-ए-अमन' बस लेकर लाहौर गए थे। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से मुलाकात की थी। यही नहीं श्री मोदी ने भी अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को न्यौता भेजा था और बिना किसी निमंत्रण के श्री शरीफ के पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए अफगानिस्तान से लौटते समय अचानक लाहौर चले गए थे। श्री सिद्धू ने कहा कि मेरी पाकिस्तान की संक्षिप्त यात्रा चर्चा में है। मेरी यात्रा किसी भी तरह से राजनीतिक नहीं थी। एक मित्र का स्नेहभरा निमंत्रण मिलने पर मैं वहां गया था। पाकिस्तानी सेना प्रमुख के साथ गले मिलने पर श्री सिद्धू ने कहा कि यह मुलाकात श्री खान के शपथ ग्रहण समारोह में हुई। शपथ ग्रहण समारोह में पहली पंक्ति में बैठे देखकर श्री बाजवा गर्मजोशी के साथ उनसे मिले। उन्होंने मुलाकात में कहा कि श्री गुरु नानक देव साहब के 550वें प्रकाश दिवस पर भारत के डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान से ढाई किलोमीटर दूर स्थित करतारपुर साहब के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं को बिना रोक-टोक दर्शन के अवसर प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं। श्री सिद्धू ने कहा कि श्री बाजवा ने कहा कि हम शांति चाहते हैं और उनकी यह बातें सुन वह भावुक हो गए थे। सिद्धू ने कहा कि बाजवा के यह कहने के बाद वह एक भावुक क्षण बन गया, जिसका नतीजा सभी ने देखा। सिद्धू ने कहा, खान के शपथ ग्रहण समारोह के बाद बाजवा से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई। वह चंद लम्हे थे, शायद एक मिनट हो। इसे लेकर मुझ पर कई आरोप लगे हैं और मुझे इस बात का खेद और दुख भी है।

उपरोक्त ब्यान से जो बात स्पष्ट हो रही है वह यह कि सिद्धू इस भ्रम में है कि वह देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कद के नेता हैं जोकि वो नहीं है। जितनी जल्दी वे इस भ्रम से बाहर निकल आएं उतना राजनीतिक तौर पर उनको लाभ होगा। दूसरी बात यह है कि एक तरफ वह अपनी यात्रा को निजी कह रहे हैं, दूसरी तरफ राजनीतिक ब्यानबाजी कर रहे हैं। इस तरह के दोहरे मापदंड सिद्धू से आज की तिथि में भी कुछ लोग आशा नहीं रखते। पाकिस्तान सेना प्रमुख से पहली मुलाकात जो कुछ क्षणों की हुई इसमें इतनी महत्त्वपूर्ण बात कैसे संभव है,यही बात सिद्धू को कटघरे में खड़ा कर रही है।

लाहौर से वापस आने पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए नवजोत सिद्धू ने एक प्रसंग के माध्यम से कहा था कि सत्ता में रहने के लिए राजा को तीन बातें आवश्यक हैं पहला सेना का होना, दूसरा अन्न भण्डारन का होना और तीसरा विश्वास का होना। तीन में से अगर दो की कमी भी हो तो राजा के प्रति लोगों का विश्वास अवश्य बना रहना चाहिए। नवजोत सिंह सिद्धू आज स्वयं विश्वास खोते नजर आ रहे हैं।

नवजोत सिंह सिद्धू मुहावरों व प्रसंगों द्वारा ही अपनी बात को कहते हैं, आज प्रसंगों का सहारा ले सिद्धू को धरातल का सत्य कहना चाह रहा हूं। प्रसंग अनुसार व्यक्ति की छवि तीन बातों से बनती है, पहली उसकी शकल-सूरत व पहरावा, दूसरी उसकी वाक-वाणी और तीसरा उसका कर्म। शकल-सूरत व पहरावे और वाकवाणी में तो सिद्धू का कोई मुकाबला नहीं जहां तक कर्म का प्रश्न है तो कुछ राजनीतिक कर्मों को अपवाद के रूप में छोड़ दें तो बाकी सब ठीक है। लेकिन पाकिस्तान की फेरी के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा के प्रति उनके हाव-भाव और उत्साह को देख कहा जा सकता है कि उनकी साख और छवि को बड़ा झटका लगा है।

जीवन को एक यात्रा के रूप में ही देखा जाता है। इस जीवन रूपी यात्रा की हम पहाड़ पर चढऩे वाली यात्रा से तुलना कर सकते हैं। एक इंसान पहाड़ की चढ़ाई छोटे-छोटे कदमों के साथ बड़ी सतर्कता से शुरू कर ऊपर की ओर बढ़ता है लेकिन उसकी एक गलती से जब पांव फिसलता है तो वह शिखर से सीधे नीचे या खाई में गिरता है। नवजोत सिंह सिद्धू ने पाकिस्तान यात्रा से पहले की अपनी राजनीतिक यात्रा बड़ी सतर्कता के साथ की लेकिन उनकी एक राजनीतिक गलती ने शिखर से नीचे की ओर सिद्धू को धकेल दिया है।

धरातल के उपरोक्त सत्य को नवजोत सिद्धू जितनी जल्दी समझ कर भूल सुधार कर लें यही सिद्धू के लिए बेहतर रहेगा। सिद्धू को भारतवासियों ने जो दिया उसे हमेशा याद रख राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देते हुए कर्म करने की आवश्यकता है। अगर सत्य को नकारते हुए और भ्रम में सिद्धू आगे बढ़ते रहे तो फिर राजनीतिक खाई ही आगे है। ऐसी स्थिति न ही आये इसी में सिद्धू की बेहतरी है। इस बात का ध्यान सिद्धू को स्वयं ही रखना होगा।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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